श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “गोवर्धन पूजा 🌻”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ ☆
🌻लघु कथा🌻 गोवर्धन पूजा 🌻
भगवान गोवर्धन की पूजा, गाय गोबर को प्रतीक बनाकर, उसे गोवर्धन गिरिराज मान पूजा करना सनातनी धर्म रीति रिवाज प्रथा चली आ रही है।
अरे मंजू कल याद से गाय का गोबर ले आना।
जी दीदी ले आऊंगी। दूसरे दिन विधि विधान से पूजन 56 प्रकार के व्यंजनों से गिरिराज जी को भोग।
अन्न कूट का प्रसाद देते मेम साहब बोली – – देख कितना सुन्दर सजाया हमने जो तुम गोबर लाई थीं।
मंजू ने कहा–जी दीदी हम तो सिर्फ गोबर लाये थे। गोवर्धन तो आपके घर बना। हमारे यहाँ तो आँगन लीपापोती।
गोबर धन आप सभी के यहाँ बनता है। हमारे यहाँ तो लीपापोती।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





