श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-११ ☆ श्री सुरेश पटवा
विपश्यना
विपश्यना एक प्राचीन और अद्भुत ध्यान पद्धति है। इसका शाब्दिक अर्थ है, देखकर लौटना। मतलब आओ, देखो, अनुभव करो और लौट जाओ, रुको मत। यह “पशयन्ति” धातु से बना शब्द है। पशयन्ति याने देखना, विपशयन्ति याने विशेष देखना। विशेष के मायने चार आर्य सत्यों- दुख, दुख का कारण तृष्णा, दुख निरोध और आष्टांग मार्ग सहित सुख दुख की क्षणिक वेदना को तटस्थ भाव से देखना। विपश्यना आत्मनिरीक्षण की एक प्रभावकारी विधि है। यह प्राणायाम और साक्षीभाव का मिला-जुला रूप है। दरअसल, यह साक्षीभाव का ही हिस्सा है। साक्षी भाव मतलब जो कुछ घटित हो रहा है, आप उसके साक्षी हैं, न अतीत में हैं और न भविष्य में, सिर्फ़ उसी क्षण में हैं जिसमें hगुजर रहे हैं। चिरंतन काल से ऋषि-मुनि इस ध्यान विधि को करते आए हैं। भगवान बुद्ध ने इसको सरलतम बनाया। इस विधि के अनुसार अपनी श्वास को देखना और उसके प्रति सजग रहना होता है। देखने का अर्थ उसके आवागमन को महसूस करना। उन्होंने इसका अभ्यास लोगों से भी करवाया था।
विपश्यना बड़ा सीधा-सरल प्रयोग है। अपनी आती-जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव। प्रारंभिक अभ्यास में उठते-बैठते, सोते-जागते, बात करते या मौन रहते किसी भी स्थिति में बस श्वास के आने-जाने को नाक के छिद्रों में महसूस करें। अब तक आप अपनी श्वासों पर ध्यान नहीं देते थे लेकिन अब स्वाभाविक रूप से उसके आवागमन को साक्षी भाव से देखें या महसूस करें कि ये श्वास छोड़ी और ये ली। श्वास लेने और छोड़ने के बीच जो अंतर है, उस पर भी सहजता से ध्यान दें। जबरन यह कार्य नहीं करना है। बस, जब भी ध्यान आ जाए तो सब कुछ बंद करके इसी पर ध्यान देना ही विपश्यना है।
आप दूसरे चरण में बीच-बीच में यह भी देखें कि एक विचार आया और गया, दूसरा आया और गया…… यह क्रोध आया और गया….. आशा आई और गई…… निराशा आई और गई। किसी भी चीज से किसी भी स्थिति पर जुड़ना नहीं होना है। बस चुपचाप तटस्थ भाव से देखना है कि आपके मन, मस्तिष्क और शरीर में किस तरह की क्रिया और प्रतिक्रियाएं होती रहती है। देह और अनुभूतियों से विलग हो उन्हें देखना भर है।
विपश्यना को करने के लिए किसी भी प्रकार के तामझाम की या एकांत में रहने की जरूरत नहीं। इसका अभ्यास भीड़ और शोरगुल में रहकर भी किया जा सकता है। बाइक चलाते हुए, बस में बैठे, ट्रेन में सफर करते, कार में यात्रा करते, राह के किनारे, दुकान पर, ऑफिस में, बाजार में, घर में और बिस्तर पर लेटे हुए कहीं भी इस विधि को करते रहो और किसी को पता भी नहीं चलेगा कि आप ध्यान कर रहे हैं।
शरीर और जीव के बीच श्वास ही एक ऐसा सेतु है, जो हमारे विचार और भावों को ही संचालित नहीं करता है बल्कि हमारे शरीर को भी जिंदा बनाए रखता है। श्वास जीवन है। बुद्ध कहते हैं कि यदि तुम श्वास को ठीक से देखते रहो, तो अनिवार्य रूपेण, अपरिहार्य रूप से, तुम शरीर से भिन्न अपने को जानने लगोगे। जो श्वास को देखेगा, वह श्वास से भिन्न हो गया, और जो श्वास से भिन्न हो गया वह शरीर से तो भिन्न हो ही गया। शरीर से छूटो, श्वास से छूटो, तो शाश्वत अनुभूति का अहसास होता है। उस दर्शन में ही उड़ान है, ऊंचाई है, उसकी ही गहराई है। बाकी न तो कोई ऊंचाइयां हैं जगत में, न कोई गहराइयां हैं जगत में। बाकी तो व्यर्थ की आपाधापी है।
इससे तनाव हट जाता है। नकारात्मक और व्यर्थ के विचार नहीं आते। मन में हमेशा शांति बनी रहती है। मन और मस्तिष्क के स्वस्थ रहने से इसका असर शरीर पर भी पड़ता है। शरीर के सारे संताप मिट जाते हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह कि यदि आप इसे निरंतर करते रहे तो स्वयं से साक्षात्कार होने लगता है और मोह कटने लगता है।
उपेक्षा-अपेक्षा
गौतम बुद्ध अधिक व्यावहारिक थे। घायल हंस की कथा आती है, जिसके संदर्भ में वे कहते हैं कि जरूरी यह नहीं है कि जिस तीर से हंस घायल हुआ, वह तीर कहां से आया, तीर चलाने वाला कौन था, उसने किस उद्देश्य से तीर चलाया? इन प्रश्नों के उत्तर ढूढऩे की अपेक्षा जरूरी है हंस को घाव से निजात दिलाने का प्रयत्न करना। ऐसे या वैसे लोग संसार में है या नहीं, संसार क्षणिक है या अनन्त, आत्मा और शरीर एक है या भिन्न-भिन्न, आत्मा है या नहीं, पुनर्जन्म है या नहीं। इन प्रश्नों को पाली साहित्य में अव्यक्तानि कहा गया है। इनके बारे में कुछ कहना ठीक नहीं, अत: ऐसे प्रश्नों पर भगवान बुद्ध मौन रह जाते थे। जिनका बोध यही था कि व्यक्ति ऐसे प्रश्नों में उलझकर विवाद को जन्म न दें। बल्कि अपना कर्तव्य आसानी से करता रहे। इन प्रश्नों की उपेक्षा करते हुए तटस्थ भाव से जीवन यापन करते किसी से कोई अपेक्षा न करे। अपेक्षा से ही तृष्णा जागती है।
बोधि
गौतम बुद्ध ने जिस ज्ञान की प्राप्ति की थी उसे ‘बोधि’ कहते हैं। माना जाता है कि बोधि पाने के बाद ही संसार से छुटकारा पाया जा सकता है। सारी पारमिताओं (पूर्णताओं) की निष्पत्ति, चार आर्य सत्यों की पूरी समझ और कर्म के निरोध से ही बोधि पाई जा सकती है। बोधि प्राप्ति से लोभ, दोष, मोह, अविद्या, तृष्णा और कथित आत्मा में विश्वास सब गायब हो जाते हैं।
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गोरखपुर
21 जून 2022 को गोरखपुर से भोपाल के लिए ट्रेन पकड़ने हेतु लुम्बिनी से गोरखपुर पहुँचना है। जिसके लिए पहले टैक्सी से 30 किलोमीटर सुनौली बॉर्डर जाना होगा। वहाँ से 95 किलोमीटर गोरखपुर है। गोरखपुर से शाम छै बजे भोपाल के लिए ट्रेन पकड़ना है।
भैरहवा भारतीय सीमा पर नेपाल का आख़िरी बस्ती है। बॉर्डर पार करके भारत की सीमा में पहली बसावट सोनौली शहर है। बॉर्डर के नज़दीक पहुँचते ही गोरखपुर ले जाने वाले टैक्सी ड्राइवर पीछे पड़ने लगे। हमारे मास्टर नेगोशीएटर जवाहर जी ने एक-दो को हड़का कर तीसरे ड्राइवर को कोने में ले जाकर गोरखपुर पहुँचाने हेतु दो हज़ार माँगने वले टैक्सी ड्राइवर से गोरखनाथ मंदिर दर्शन कराकर स्टेशन छोड़ने का सौदा सत्रह सौ में पटा लिया। टैक्सी में सामान रखकर बॉर्डर पर पहुँचे। भारतीय सिपाही ने पूछा कहाँ जा रहे हैं। हमारे भोपाल बताने पर उसने हमारे एक सदस्य को टेंट में बैठे एक पुलिसकर्मी के पास विवरण लिखने को भेजा। पाँच मिनट में काम निपट गया।
दो दिन से खांसी परेशान कर रही थी। वहीं एक दवाई की दुकान दिख गयी। केमिस्ट को कहा- कॉफ़ सिरप दे दो। उसने पूछा कौन सा?, हमने कहा डॉक्टर जो सिरप मरीज़ों सबसे ज़्यादा लिख रहे हैं, वही दे दो। उसने मुस्कुरा कर सिप्ला कम्पनी की rexcof 116.00 मूल्य छपी शीशी 100.00 में पकड़ा दी। दो ढक्कन उँडेला तो अंदर से बाहर खुलने वाला खांसी ढक्कन बंद होने लगा। रास्ते में दशहरी आम की बहार आई थी। सड़क किनारे से डाल के पके साठ रुपए किलो के हिसाब से पाँच किलो आम ख़रीद कार की डिक्की को मालामाल कर दिया। अगला पड़ाव प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर था। साढ़े दस बजे हम गोरखनाथ मंदिर में थे।
गोरखपुर
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर में स्थित बाबा गोरखनाथ मंदिर के नाम पर इस जिले का नाम गोरखपुर पड़ा है। गोरखनाथ मन्दिर के वर्तमान महन्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी है। एक साधु से दिखते विद्वान व्यक्ति मिले। हमने नाथ सम्प्रदाय के बारे में पूछा। उन्होंने विस्तार पूर्वक पूरी कहानी सुना दी। हिन्दू धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना के अंतर्गत विभिन्न संप्रदायों और मत-मतांतरों में ‘नाथ संप्रदाय’ का प्रमुख स्थान है। संपूर्ण देश में फैले नाथ संप्रदाय के विभिन्न मंदिरों तथा मठों की देख रेख यहीं गोरखपुर से होती है। नाथ सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार सच्चिदानंद शिव के साक्षात् स्वरूप ‘श्री गोरक्षनाथ जी’ सतयुग में पेशावर, त्रेतायुग में गोरखपुर, द्वापर युग में द्वारिका के पास हरमुज, तथा कलियुग में गोरखमधी, सौराष्ट्र में आविर्भूत हुए थे।
उन्होंने चारों युगों में विद्यमान एक अयोनिज अमर महायोगी, सिद्ध महापुरुष के रूप में एशिया के विशाल भूखंड तिब्बत, मंगोलिया, कंधार, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, सिंघल तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपने योग से मानवता को कृतार्थ किया था।
यहां यह भी स्मरणीय है कि महान बालसंत ज्ञानेश्वर महाराज, जिन्होंने भगवद्गीता पर सुप्रसिद्ध ग्रंथ “ज्ञानेश्वरी” लिखा,भी नाथपंथ से दीक्षित थे,तथा उनके सद्गुरु भी उनके सगे सहोदर भ्राता निवृत्तिनाथजी भी नाथपंथ से शिक्षित-दीक्षित थे।निवृत्तिनाथजी की समाधि भी नासिक ज्योतिर्लिंग से मात्र लगभग आधा पौन किलोमीटर नासिक नगर में ही में मुख्य बाजार की मेनरोड़ पर ही है।
नाथपंथी या नाथवंशी यह मूल रूप से नाथ समाज में श्रेष्ठ जोगी समाज से होते हैं! या यूँ कह सकते हैं कि वे शिव के वंशज होते है जो शिव शैवनाथ ब्राह्मण के नाम से भी जाने जाते हैं। एशिया के देशों नेपाल में 20%, भारत में 13 .5%, भूटान में 3% नाथ लोग मिलते हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, तिब्बत, बांग्लादेश और रंगून में नाथवंशियो के अनुयायी को मानने वाले लोग होते हैं।
गोरक्षनाथ मंदिर गोरखपुर में अनवरत योग साधना का क्रम प्राचीन काल से चलता रहा है। ज्वालादेवी के स्थान से परिभ्रमण करते हुए ‘गोरक्षनाथ जी’ ने भगवती राप्ती के तटवर्ती क्षेत्र में आकर तपस्या की थी और उसी स्थान पर अपनी दिव्य समाधि लगाई थी, जहाँ वर्तमान में ‘श्री गोरखनाथ मंदिर (श्री गोरक्षनाथ मंदिर)’ स्थित है। उज्जैन के भर्तृहरि का भी नाथ सम्प्रदाय से सम्बंध था। नाथ योगी सम्प्रदाय के महान प्रवर्तक ने अपनी अलौकिक आध्यात्मिक गरिमा से इस स्थान को पवित्र किया था, अतः योगेश्वर गोरखनाथ के पुण्य स्थल के कारण इस स्थान का नाम ‘गोरखपुर’ पड़ा। महायोगी गुरु गोरखनाथ की यह तपस्याभूमि प्रारंभ में एक तपोवन के रूप में रही होगी और जनशून्य शांत तपोवन में योगियों के निवास के लिए कुछ छोटे- छोटे मठ रहे, मंदिर का निर्माण बाद में हुआ। आज हम जिस विशाल और भव्य मंदिर का दर्शन कर हर्ष और शांति का अनुभव करते हैं, वह ब्रह्मलीन महंत श्री दिग्विजयनाथ जी महाराज जी की ही कृपा से अस्तित्वमान हुआ है। वर्तमान पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ जी महाराज के संरक्षण में श्री गोरखनाथ मंदिर विशाल आकार-प्रकार, प्रांगण की भव्यता तथा पवित्र रमणीयता को प्राप्त हो रहा है। पुराना मंदिर नव निर्माण की विशालता और व्यापकता में समाहित हो गया है। हमारे पहुँचने के दिन योग दिवस होने से सुबह ही योग दिवस कार्यक्रम हुआ था। पहले हमने मंदिर में योगियों की मूर्तियों के दर्शन किए। उसके बाद प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण करके चार बजे गोरखपुर रेल्वे स्टेशन पहुँच गये।
ट्रेन रवानगी का समय छै बजे का था। हमारी बहुत दिनों से गीता प्रेस जाने की उच्चतम इच्छा थी लेकिन अवसर नहीं बन पा रहा था। जवाहर जी ने गीता प्रेस का प्रस्ताव रखा। जवाहर जी के साथ विश्व प्रसिद्ध गीता प्रेस भ्रमण को गये। जवाहर जी ने गेट पर पहुँच कर इंटर्काम से मैनेजर साहिब से बात की तो उन्होंने सलाह दी कि हम लोग चित्र दीर्घा और पुस्तक भंडार देखकर उनके कार्यालय आ जायें।
हम गीता प्रेस के प्रबंधक लालमणि तिवारी से बात करके दंग रह गये। उन्होंने बताया अभी कुछ दिन पहले ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी का गीता प्रेस आना हुआ था। उन्होंने संस्था के प्रन्यासियों सहित उन्हें 24 जून 2022 राष्ट्रपति भवन आमंत्रित किया है कि विदेशों में दूतावासों के माध्यम से गीता प्रेस की किताबों को वहाँ के समाज में पहुँचाया जाये। उसी तारतम्य में तैयारी चल रही है। उन्होंने बताया कि रामचरितमानस और हनुमान चालीसा की माँग इतनी अधिक है कि कई कोशिशों के बावजूद पूरा नहीं किया जा सकता है। कोविड के बाद माँग में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। रामचरितमानस की एक साल में एक करोड़ प्रतियाँ बिक जाती हैं।
हमने पूछा गीता प्रेस की किताबें बाज़ार से कम मूल्य पर कैसे मिलती हैं। उनका कहना था कि किसी भी किताब पर लाभ नहीं कमाया जाता। क़ीमत में स्थायी लागत (fixed cost) को भी शामिल नहीं किया जाता। चल लागत ही विक्रय मूल्य होता है। ट्रस्टी एक भी पैसा नहीं लेते और न किसी सुविधा का लाभ उठाते हैं। यहाँ तक कि अभी राष्ट्रपति भवन जाना है तो ट्रस्टी खुद के ख़र्चों पर जाएँगे। किसी प्रकार का कोई सरकारी या ग़ैर-सरकारी दान भी नहीं लिया जाता है।
गीता प्रेस भ्रमण से हमारी एक बहुत पुरानी इच्छा पूरी हुई। हमारी इच्छा गीता प्रेस से छै खंडों में प्रकाशित 2700/- मूल्य की टीका सहित मूल महाभारत ख़रीदने की थी। बेचवाल किताबों का सेट निकलवा कर बिल काटने ही वाले थे, तभी पुस्तकों का बड़ा वज़नी पैकेट आ गया। जिसे ले जाने में दिक़्क़त हो सकती थी। उसमें 450/- भिजवाने का खर्चा जुड़वा कर 3150/- भुगतान करके इच्छापूर्ति सम्भव हुई। अब हम अपने घर पर “महाभारत पाठक मंच” बनाकर अध्ययन करने की दिशा में एक कदम बढ़ा चुके हैं।
इति वृतांत
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




