श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१२ ☆ श्री सुरेश पटवा
दर्रों की लुकाछिपी
01 जुलाई 2022 को सुबह सात बजे भोपाल से दिल्ली उड़ान पकड़ने राजा भोज विमान तल रवाना होना था। पर्यटन की शुरुआत करने के उत्साह में सुबह की ताजी हवा और भी सुहानी लग रही थी। लगे भी क्यों न, आख़िर हवा बदलने के लिए दुनिया के सबसे ऊँचे स्थान पर स्थित लेह हवाई अड्डे पर उतरने वाले थे। वहाँ की ज़मीन कुछ-कुछ चाँद सी वीरान दिखती है। शायरी में चौदहवीं का चाँद लाजवाब होता है। लेकिन अपोलो-११ के अंतरिक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रोंग ने सचमुच के चाँद को बहुत खुरदुरा बताया है। वहाँ पीने को पानी नहीं है और साँस लेना दूभर है। घर के चाँद के सानिध्य में तो साँस कतिपय कारणों से अक्सर तेज हो जाती है। लद्दाख़ में आक्सीजन कम होने से साँस धीमी होने लगती है।
पिछले पंद्रह दिन से इस यात्रा की तैयारी कर रहे थे। चाहे कितनी भी तैयारी कर लो लेकिन अंतिम समय की अफ़रातफ़री से बचा नहीं जा सकता। महिलाओं की तैयारी का आलम बिल्कुल अलहदा होता है। कपड़े-ज़ेवर-जूते-चप्पल और खाने पीने की सामग्री सब गड्डमड्ड हो जाते हैं। लद्दाख़ में समुद्र तल से 14,000 से 18,000 फुट ऊपर अजीबोग़रीब मौसम होता है। वहाँ हरियाली रहित सूखे नंगे पहाड़ हैं जिनके शिखरों पर जमी बर्फ़ पर तेज धूप से दिन में 37-38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान रहता है परंतु शाम घिर आते ही तापमान एकदम से गिर कर 4-8 डिग्री तक पहुँच जाता है।
आख़िर वह क्षण आ ही गया जब टैक्सी दरवाज़े पर आ खड़ी हुई, और गरम कपड़ों को रखने की अफ़रातफ़री ने माहौल बिगाड़ दिया। भारतीय घरों में अक्सर तनावग्रस्त वातावरण में पर्यटन यात्रा की शुरुआत होती है। आपको तनाव झेलने और उससे निजात पाने की आदत डालना ही होती है। फिर भी कुछ न कुछ सामान छूट ही जाता है। जैसे साबुन, दवाइयाँ, दंतमंजन ट्यूब और ब्रश वग़ैरह। इन चीजों का एक अतिरिक्त पैकेट पहले से ही बैग में रख लेना चाहिए। फिर भी महिलाओं के रबर बैंड, सुई-धागा, अतिरिक्त नाड़ा और सिंदूर डिबिया छूटते-छूटते बचीं। टैक्सी में बैठते ही विमान में अनुमत सामान और हैंडबेग हेतु नियत क्रमशः पंद्रह और दस किलो वजन निर्धारित होने लगा। थोड़ा-थोड़ा करते सामान अधिक हो ही जाता है। फिर कम करते-करते बहुत कम हो जाता है। ख़ैर गहरी साँस लेकर मन के विमान को संतुलित किया। इतने में हवाई अड्डा आ गया। सुरक्षाकर्मी को टिकिट और पहचान के साक्ष्य दिखाकर अंदर घुसे। बोर्डिंग पास के बाद सुरक्षा जाँच में सामान की बिदाई के समय महिलाएँ कुछ इस तरह द्रवित हो रही थीं, मानो बेटी की बिदाई हो रही हो।
सात बजे विमान में बैठने के लिए गेट नम्बर 4 की तरफ़ प्रस्थान किया। सौम्या ने वेब चेक-इन करके सभी की कुर्सियाँ खिड़की की तरफ़ ले ली थीं। तक़रीबन एक घंटा इंतज़ार करते बैठे रहे। विमान में चढ़ने कि घोषणा होने पर विमान में प्रवेश किया। चार उड़नपरियों का समूह विमान के प्रवेश द्वार पर नमस्कार की मुद्रा में कुछ बोलता सा नज़र आ रहा था लेकिन उनके शब्द सुनाई नहीं दे रहे थे। उनसे नज़र मिलाकर धन्यवाद कह आगे बढ़ गये। हमारी सीट 16-A खिड़की किनारे पर थी। नज़दीक जाकर खड़े हुए तो वहाँ एक जोड़ा बैठा था। उन्होंने हमें मूर्ख समझ 16-C की तरफ़ बैठने का इशारा किया लेकिन हम जन्म से ही मूर्ख नहीं हैं। हमने प्रत्युत्तर में आँखों से 16-A की तरफ़ इशारा किया। उन्होंने हमारी बुद्धिमानी से चकित हो खड़े होकर हमें अपनी कुर्सी तक जाने दिया। फिर वे तोता-मैना की तरह चौंच लड़ाने में और हम लद्दाख़ की घाटियों के विचार में खोए यात्रा वृतांत लिखने में व्यस्त हो गये।
विमान ने नियत समय 7:45 पर उड़ान भरी। विमान रनवे याने उड़ान भरने के लम्बे रास्ते पर पहुँचा। कैप्टन के कुछ बुदबुदाने के बाद विमान दौड़ाना शुरू किया। विमान ने पल भर में गति पकड़ ठीक तीस सेकंड में ज़मीन छोड़ दी। उड़ान भरते ही भोपाल का बड़ा तालाब और ताज़ुल मसाज़िद दिखने लगी। अब हम सही के आसमान में उड़ रहे थे। वो वाला नहीं, जिसे लोग कहते हैं “साला आसमान में उड़ रहा है।” ख़्याल आया, ज़मीन पर थे तो आसमान मुट्ठी में नहीं था, आसमान में पहुँचे तो ज़मीन छूट गई। निदा फ़ाज़ली ने क्या ख़ूब कहा है।
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं जमीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता।
बग़ल वाला तोता-मैना जोड़ा ग़ैरज़रूरी बातें करके हाथों में हाथ डालकर सो गया। थोड़ी देर बाद हाथ से हाथ छूटे तो मैना का सिर तोता के कंधे पर था। किरदार तो नींद में थे परंतु उनकी बाहों और कलाइयों पर छपे टैटू आपस में जो बयाँ रहे थे। उसे देख हम निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल गुनगुनाने लगे-
जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है,
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबाँ नहीं मिलता।
थोड़ी देर में उनकी साँसों से बिना धुएँ के शोले उठने लगे।
बुझा सका है भला कौन वक़्त (इश्क़) के शोले,
ये ऐसी आग है जिसमे धुआँ नहीं मिलता।
उन्हें देखकर लगा कि इनकी ज़िंदगी का यह रूमानी वक्त गुज़रने के बाद सब लोगों की तरह ये लोग गुनगुनाएँगे।
तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,
जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता।
आसमान में उमड़ते-घुमड़ते सफ़ेद बादलों से बातें करते सोचते रहे कि इस घूमती फ़ानी दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है- मुहब्बत भी। इतने में नाश्ता परोसने वाली परिचारिका आ गई। जब से मास्क चलन में आया है, उनकी नक़ली ख़ुशी बिखेरती मुस्कान दिखती नहीं है। वह काली घटाओं को गोल माथे पर से खींच पीछे कसकर जूड़ा बाँधे सिर्फ़ आँखों से बात कर रही थी। नाश्ता भुगतान पर उपलब्ध था। मतलब 295.00 रुपए की सैंडविच, जिसमें 29.00 रुपए से अधिक लागत नहीं लगी थी, GST सहित 307.00 रुपयों में मिल रही थी। सैंडविच की विमान सी ऊँची क़ीमत सुनकर हमें चक्कर आने लगा। ऐसा लगा क़ीमत सुनकर आक्सीजन कम हो रही है। इसीलिए शायद उड़ान के पहले ही विमान में आक्सीजन लेने की विधि से परिचय करा दिया जाता है। विमान हसीना से एक गिलास पानी लेकर गले में उँडेला और दिल्ली पहुँचने लग गए।
तोता-मैना जोड़ा गहन निद्रा में था। शायद कई दिनों से सोया नहीं था। बाहर निकलने के लिए आख़िर उनकी नींद में ख़लल डालना पड़ा। वे चौंक कर उठे। अस्तव्यस्त परिधानों को व्यवस्थित करने लगे। विमान रुका नहीं कि यात्री तुरंत खड़े हो गये। जबकि उतरने की सीढ़ी विमान के दरवाज़े पर लगाने में पंद्रह-बीस मिनट का समय तो लगता ही है। तब तक अपन आराम से बैठे रहे। जब स्थिति धक्कामुक्की से सामान्य हुई तब विमान से उतरना शुरू किया। विमान के दरवाज़े पर पहुँचे तब सीढ़ियाँ ख़ाली थीं। दरवाज़े पर थोड़ा रुककर किसी राष्ट्राध्यक्ष सी धीमी चाल से चारों तरफ़ देखते हुए उतरे। अरे भाई! फोकट में इतराना भी तो एक अदा है। जब कोई न देख रहा हो तो थोड़ा इतराने में क्या हर्ज है। ख़ैर आसमान में उड़कर ज़मीन पर आ गये। कितना भी ऊँचा उड़ लो आख़िर ज़मीन पर तो आना ही पड़ता है।
ज़मीं की गोद में इतना सुकून है ’आतिश’
जो उतरा वो सफ़र की थकान भूल गया।
हमें दिल्ली से लेह की उड़ान पकड़नी थी। दिल्ली विमानतल पर प्रस्थान से बाहर निकल पुनः आगमन द्वार से सुरक्षा जाँच उपरांत मालूम पड़ा कि लेह की उड़ान गेट नम्बर 32 से प्रस्थान करेगी। क्रेडिट कार्ड संस्कृति के कुछ फ़िज़ूल खर्ची नुक़सान हैं तो कुछ फ़ायदे भी मिलते हैं। ये किसी-किसी विमानतल पर इग्ज़ेक्युटिव लाउंज में मुफ़्तखोरी करवाते हैं। इत्तफ़ाक़न इग्ज़ेक्युटिव लाउंज गेट नम्बर 32 के बिल्कुल बग़ल में था। थोड़ी लम्बी क़तार थी। क्रेडिट कार्ड की दो रुपया पकड़ जुगाड़ से दस मिनट में लाउंज के अंदर थे। अमेरिकन नाश्ता और हिंदुस्तानी नाश्ता का विकल्प था। हिंदुस्तानी इडली साम्भर चटनी उपमा उदरस्त किया और साथ में काप्पीछिनों काफ़ी का कड़क ज़ायक़ा गले में उतारा। इतनी देर में बोर्डिंग की घोषणा हुई और विमान में चढ़कर खिड़की वाली 18-A कुर्सी पर आसान जमाया।
विमान कप्तान ने बताया लेह का तापमान 32 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक होने के कारण बर्फ़ पर सूर्य रश्मियाँ चकाचौंध पैदा करती हैं। जिससे विमान उतारने में दिक़्क़त हो सकती है। इसलिए 11:45 के तय समय से पूर्व ही 11:30 को उड़ान भरना पड़ेगी। विमान के उड़ान भरते ही गुड़गाँव का कांक्रीट जंगल दिखने लगा। दस मिनट के बाद हम बादलों से बातें कर रहे थे। उसके बाद शिवालिक पहाड़ियाँ, पीर पंचाल पर्वत शिखर दिखने लगे।
शिवालिक पहाड़ियाँ मुख्य हिमालय से उतार की बाह्य हिमालयी पर्वतमाला है, जो भारतीय महाद्वीप के उत्तरी भाग में पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक लगभग 2,400 किलोमीटर तक पसरी है। यह लगभग 10–50 किमी चौड़ी है और इसके शिखरों की औसत ऊँचाई 1,500–2,000 मीटर (4,900–6,600 फुट) है। असम में तीस्ता और रायडक नदी के बीच लगभग 90 किलोमीटर (56 मील) का गलियारा है, जहाँ शिखर कम ऊँचाई के हैं। वहीं से अरुणाचल का रास्ता है। यह हिमायल पर्वत प्रणाली के दक्षिणतम और भूगर्भ शास्त्रीय दृष्टि से, कनिष्ठतम पर्वतमाला कड़ी है। इसकी औसत ऊंचाई 850-1200 मीटर है और इसकी कई उपश्रेणियां भी हैं। यह 1600 कि॰मी॰ तक पूर्व में तीस्ता नदी सिक्किम से पश्चिमवर्त नेपाल और उत्तराखंड से कश्मीर होते हुए उत्तरी पाकिस्तान तक जाते हैं। बीच में शाकंभरी देवी की पहाडियों से सहारनपुर, देहरादून मसूरी के पर्वतों में जाने हेतु मोहन दर्रा प्रधान मार्ग है। “शिवालिक” का अर्थ “शिव की जटाएँ” है। शिवालिक से उत्तर में ऊँची हिमालय पर्वत माला है, जो मध्य हिमालय भी कहलाती है। एक पौराणिक मिथक के अनुसार रघु कुल के भागीरथी प्रयासों से गंगा स्वर्ग से धरा पर आने की सहमत हुईं लेकिन उनके तीव्र वेग को पृथ्वी पर झेलना मुश्किल था। शिव अपनी जटाएँ फैलाकर कैलाश पर्वत पर विराजमान हुए, तब उनकी जटाएँ हिमालय की तराई तक फैल गईं, वे ही शिवालिक पहाड़ियाँ कहलाती हैं।
लेह में चटक तेज धूप की अल्ट्रा वायोलेट किरण बर्फीले पहाड़ों पर पड़कर गर्मी बढ़ा देती है। सूर्य रश्मियों की तेज़ी नज़र को दृश्यों पर थमने नहीं दे रही थी। आसमान में मानसूनी बादलों का दूल्हा बिना बूँदों की बारात नृत्य कर रहा था। विमान को बादलों से ऊपर उठाने के प्रयास में विमान बुरी तरह हिलने लगा। कुछ लोग घबराहट में एक दूसरे को देखने लगे। वैसे भी विमान में सिवाय उड़नपरियों को देखने के अलावा और कुछ था भी नहीं। कुछेक को उल्टियाँ होने लगीं। थोड़ी देर में भोजन परोसने की घोषणा हुई। सवारियाँ चौकन्नी हो गईं। उनकी जीभें लपलपाने लगीं। यह जानकारी मिलते ही कि भोजन भुगतान पर उपलब्ध है, सुनते ही सबने अपनी जीभें समेट लीं। हमारी टिकट कारपोरेट बुकिंग में होने से मुफ़्त नाश्ते में सजीधजी सैंडविच एक गिलास पानी के साथ परोसी गई।
विमान आधा घंटे बाद 18000 फुट की ऊँचाई पर था। बादल नदारत और उनकी जगह धूप में झुलसते हिम शिखरों ने ले ली। हिमालय का अर्थ ही हिम का आलय याने बर्फ़ का भंडार होता है जैसे पुस्तकों का भंडार पुस्तकालय होता है। पायलट ने सूचना दी कि सब हम लेह पहुँचने वाले हैं। सभी यात्री कुर्सी सीधी करके बेल्ट कस लें। विमान सुविधाजनक तरीक़े से नीचे पहुँचने लगा। फ़ौज की छावनी दिख रही थी। उसके ठीक बाजू की हवाई पट्टी पर विमान उतरा। लेह की हवाई पट्टी फ़ौजी है। उसे नागरिक विमान उतरने की अनुमति है। सामान समेटकर बाहर निकले। एक टैक्सी चालक हमारे नाम की तख़्ती लिए खड़ा था। सवार होकर लेह शहर के बीच में स्थित मानसरोवर होटल पहुँच गये।
लेह की मानसरोवर होटल में पहले माले पर कमरा मिला। कमरे में पंखा या एसी होने को कोई प्रश्न नहीं है। दिन में यद्यपि 38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान है परंतु रात ढलते ही सात डिग्री पर खिसक जाएगा। रूम हीटर चलाना पड़ता है। स्वागत पेय के रूप में बढ़िया गाढ़े लीकर की चाय पीकर मज़ा आ गया। स्थानीय नियमों के अनुसार शरीर के थर्मोस्टेट को सेट करने और कोविड नियमावली पालन हेतु एक दिन का आराम आवश्यक है। चार बजे पैदल घूमने निकले तो घरों में सेवफल से लदे पेड़ दिखे। बाक़ी दिन आराम किया। मुफ़्त के खाने का भी एक अलग मज़ा होता है। होटल की तरफ़ से सौजन्य रात्रिभोज करके जल्दी सोने चले गये।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




