श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६६ ☆ हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व

आज के डिजिटल युग में मनुष्य अपनी ही बनाई दौड़ में थककर गिर रहा है, तब प्रकृति हमें एक शांत, स्थिर और सुकून भरी पुकार देती है—

“रुक जाओ… मेरी गोद में आओ… मैं तुम्हें फिर से जीवन दूँगी।”

हरियाली केवल पेड़–पौधों का रंग नहीं है, यह जीवन का मूल भाव है। जिस दिन मनुष्य से पेड़ छिन जाते हैं, उसी दिन उसकी साँस, उसकी शांति, उसका अस्तित्व भी खोने लगता है। इसीलिए कहा जाता है—

“धरती हर बार देती है… बस लेने वाले हाथ हरे होने चाहिए।”

आज पर्यावरण संकट दुनिया की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है। प्रदूषण बढ़ रहा है, वर्षा घट रही है, तापमान असंतुलित हो रहा है, और धरती अपनी थकान का इजहार कर रही है। किंतु इससे बाहर निकलने का सबसे सुंदर, सरल और प्रभावी उपाय भी वही है—

प्रकृति।

एक पौधा लगाना किसी दान से कम नहीं। यह ऐसा पुण्य है जिसकी छाया हम नहीं, आने वाली पीढ़ियाँ पाती हैं।

जब हम बीज बोते हैं, तो सिर्फ एक बीज नहीं डालते…

हम धरती की धड़कन में एक नई धुन जोड़ते हैं।

बुज़ुर्ग कहते थे—

“पेड़ हमारी छाया नहीं, हमारी शिक्षा हैं।

सिखाते हैं—स्थिर रहो, देते रहो, और किसी से बदले में कुछ मत माँगो।”

हमारे गाँवों और कस्बों की पहचान कभी उनके बरगद, नीम, पीपल और आम के पेड़ों से होती थी। बच्चे पेड़ों पर खेलते थे, रास्ते में यात्री छाया पाते थे, और घरों में हवा ठंडी बहती थी। पर आज इन पेड़ों की कमी ने हमारे जीवन से ठंडक, ताज़गी और अपनापन छीन लिया है।

समय आ गया है कि हम फिर से प्रकृति को उसके सम्मान की जगह दें।

ग्रीन मोटिवेशन का अर्थ सिर्फ पौधा लगाना नहीं, बल्कि अपनी सोच को हरियाली से भरना है।

घर की छत पर दो गमले लगाना—छोटी शुरुआत भी बड़ा बदलाव लाती है।

बच्चों को पौधों की देखभाल सिखाना—यह उनके चरित्र में संवेदनशीलता बोता है।

प्लास्टिक कम करना और मिट्टी को जगह देना—यही धरती की असली पूजा है।

हर त्यौहार, हर शुभ काम पर एक पौधा समर्पित करना—यह संस्कृति को हरियाली से जोड़ देता है।

हरियाली कोई विकल्प नहीं… यह जीवन का आधार है।

अगर आज पेड़ बचे रहेंगे, तो कल हमारी पृथ्वी सांस ले सकेगी।

अगर आज हम पौधे लगाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें धन्यवाद देंगी।

आइए मिलकर एक संकल्प लें—

“जहाँ हम खड़े हों, वहाँ जीवन उगे।”

प्रकृति हमें कभी खाली हाथ नहीं लौटाती।

बस हमें उसके साथ चलने की जरूरत है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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