डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “नवजात“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # १२ ?

? लघुकथा – नवजात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

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कन्या नवजात को कूड़े के ढेर पर या सड़क किनारे की झाड़ियों में फेक देने या छोड़ देने की बढ़ती घटना से द्रवित हो, एक अनाथालय-प्रबंधन ने एक नव प्रयोग कियाl

अनाथ आश्रम के मुख्य द्वार पर एक झूला बाँध दिया गया, वहाँ एक सूचना लगा दी गई कि, “यदि किसी ने बच्चा त्यागने का अमानवीय निर्णय लिया ले ही लिया है, तो उस त्याज्य नवजात को इस झूले पर डाल जाए l”

 ****

एक अत्यंत ग़रीब व्यक्ति, जिसकी पहले से ही दो बेटियाँ थीं, अब उसके घर तीसरी बच्ची ने जन्म लियाl इस तृतीय बच्ची के जन्मते ही घर में मातम-सा छा गयाl सास-श्वसुर के तानों और कड़वी बोली से बहू तंग आ चुकी थी —

“कलमुँही! वंश डुबाने आई यहाँ! जब से तुझे ब्याहकर लाये हैं, तब से किस्मत में अपशगुन ही देखना-सुनना बदा है! “

अब तो मानो कोई आसमानी आफ़त टूट पड़ी..l इस कोहराम ने तमिया को अंदर से झिझोड़ कर रख दियाl

वह अपने पति फग्गू से बोली –“ज़िंदगी की मार ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा…! भगवान हमें दौड़ा-दौड़ाकर मार रहा! “

फग्गू फूट पड़ा –“अब तीन-तीन बच्ची को पालना मेरे वश में नहीं, तम्मी! “

बहुत सोच-विचार के बाद दम्पति ने नवजात को तज देने का कठोर निर्णय लियाl पत्नी की सहमति से फग्गू ने नवजात को गोद में लिया और बड़ी तथा मँझली बेटी को बे-मन से साथ ले, आँसू बहाता हुआ अनाथालय की ओर चल पड़ा।

साथ चलती बड़ी बेटी, रास्ते में बार-बार पूछ रही थी — “बाबजी, हम कहाँ जा रहे हैं?”

पिता का हाथ थामे साथ-साथ चल रही मँझली बिटिया की बाल जिज्ञासा चिहुँक उठी — ” बाबजी! अपन नई गुड़िया के लिये खिलौने लेने जा रहे हैं?”

पिता ने नज़रें चुरा लीं। जवाब देना मुश्किल था।

अनाथालय के फाटक तक पहुँचकर उसने धीरे से नवजात बच्ची को गोद से उतारकर वहाँ के झूले में डालना चाहाl इस हेतु उसने अपनी मँझली बेटी का हाथ छोड़ दियाl

मँझली बेटी सहमकर बोली —

“बाबजी! … मैंने ऐसा क्या किया, जो मेरा हाथ छोड़ दिया?”

उस प्रश्न ने उसके भीतर की दीवारें तोड़ दीं।

उसे लगा, जैसे वह आवाज़ मँझली बेटी की नहीं, अपितु उस नवजात के होंठों से निकली हो —

“बाबजी! मैंने ऐसा क्या किया…?” ….. उसका अन्तः करण दहल गयाl मानो पलभर को समय ठहर गया। उसकी आँखें डबडबा आईं, हाथ काँपने लगे।

उसने बच्ची को फिर से गोद में उठाया, दोनों बेटियों को बाँहों में समेटा रूँधे गले से कहा, “चलो-चलोl घर चलो मम्मी के पासl ”

मन-ही-मन वह फ़िर बुदबुदाया —“बेटा-बेटी में फर्क करने वाला मैं होता कौन हूँ?…मेरा घर तो इनसे ही घर है।”

वह वापस लौट पड़ा।

अनाथालय के फाटक के बाहर ज़िंदगी पहली बार उसके साथ चल रही थी, तीन छोटी हथेलियों का हाथ थामे हुए…. l

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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