श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – कश्मीर यात्रा – जन्नत की सैर – भाग-१७ ☆ श्री सुरेश पटवा
जम्मू-कश्मीर अपने अंदर अद्भुत खूबसूरती समेटे हुए है। यहां की अनोखी खूबसूरती के कारण ही कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। कश्मीर की प्राकृतिक वादियां, झरने, नदियां, बर्फ से ढके पहाड़ और घने जंगल यहां की खूबसूरती को इस कदर बढ़ाते हैं कि हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक जम्मू कश्मीर की ओर खिंचे चले आते हैं।
06 जुलाई 2022 को सुबह चार बजे उठकर छै बजकर पचपन मिनट की फ़्लाइट पकड़ने पाँच बजे लेह की होटल से रवाना हुए। होटल ने नाश्ते के लिए सैंडविच और फ़्रूट जूस पैकेज रख दिए हैं। लेह हवाईअड्डा पर बहुत अफ़रातफ़री का माहौल था। पहले तो अंदर घुसने की लम्बी क़तार, फिर चेक-इन काउंटर पर भारी भीड़ और काउंटर बदलने की क़वायद ने सब का मूड पूरी तरह ख़राब कर दिया। उस पर चिड़चिड़ाते यात्रियों के झगड़ों ने बचीखुची कसर निकाल दी। तीन काउंटर बदलने के बाद चेक-इन हुआ तो काउंटर पर कार्यरत कर्मचारी बोर्डिंग पास दिए बग़ैर काउंटर बंद करके चलती बनी। हम गो-फ़र्स्ट एयरलाईन कम्पनी के स्टाफ़ के पीछे बोर्डिंग पास के लिए भटकते रहे। यह तो अच्छा था कि सौम्या ने ई-वेब चेक-इन करके बोर्डिंग पास डाउनलोड कर रखे थे। उसमें भी एक नई समस्या आ खड़ी हुई। सौम्या का बोर्डिंग पास मोबाईल में नहीं खुल रहा था। गेट पर, फिर विमान में चढ़ने पर अनेक दिक़्क़त का सामना किया। अंत समय में चेकिंग कर्मचारी से हॉटस्पॉट लेकर बोर्डिंग पास दिखा कर विमान में सवार हुए। विमान में भी अव्यवस्था ने पीछा नहीं छोड़ा। वह विमान लेह से श्रीनगर होकर मुंबई जा रहा था। हमारी कुर्सियाँ अंत में 28-F, 29-F और 30-F थीं। ऊपर के सामान रखने की जगह बिल्कुल भी ख़ाली नहीं थी। यात्रियों की बहस से माहौल गर्माया हुआ था। आख़िर में यात्रियों ने घुटनों पर हैंडबैग रखकर बैठना ठीक समझा। विमान ने उड़ान भरी।
नीचे सिंधु नदी की घाटी में धीर-गम्भीर सिंधु नदी का नजारा दिखने लगा। हल्के बादलों से विमान ऊपर उठकर श्रीनगर की तरफ़ उड़ चला। हम थोड़ी सी देर में ही हिमशिखरों के ऊपर उड़ान भर रहे हैं। जँसकार घाटी से निकलती छोटी नदियों का बहाव सिंधु तरफ़ जा रहा हैं। कारगिल के नज़दीक द्रास दर्रा जैसे ही निकला सूखे पहाड़ हरेभरे पर्वतों में बदलने लगे। कल लद्दाख़ के ड्राइवर ने पूछा था कि साहब कल कहाँ जा रहे हैं। जब हमने उसे कश्मीर बताया तो वह बोला-कश्मीर में हरियाली के अलावा कुछ नहीं है। कश्मीरी टैक्सी चालक ने पूछा कि साहब कहाँ से आ रहे हैं। हमने लद्दाख़ बताया तो वह बोला- वहाँ सूखे पहाड़ों के अलावा कुछ नहीं है। सबको अपना स्थान प्यारा होता है। होटल में पोहा-चाय का नाश्ता किया। ग्यारह बजे श्रीनगर घूमने निकले।
श्रीनगर (Srinagar) भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य का सबसे बड़ा शहर और ग्रीष्मकालीन राजधानी है। यह कश्मीर घाटी में झेलम नदी के किनारे बसा हुआ है, जो सिन्धु नदी की प्रमुख उपनदी है। प्रसिद्ध डल झील और आंचार झील भी श्रीनगर का महत्वपूर्ण भाग हैं। कश्मीर घाटी के मध्य में बसा दस लाख से अधिक जनसंख्या वाला यह नगर भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। श्रीनगर अपने उद्यानों व प्राकृतिक वातावरण के लिए जाना जाता है और यहाँ के कश्मीर शॉल, सेव व मेवा देशभर में प्रसिद्ध है।
श्रीनगर विभिन्न मंदिरों व मस्जिदों के लिए भी प्रसिद्ध है। समुद्रतल से 1700 मीटर ऊंचाई पर बसा श्रीनगर विशेष रूप से झीलों और हाऊसबोट के लिए जाना जाता है। इसके अलावा श्रीनगर परम्परागत कश्मीरी हस्तशिल्प और सूखे मेवों के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। श्रीनगर का इतिहास काफी पुराना है। माना जाता है कि सम्राट अशोक मौर्य ने इस नगर को बसाया था। इस जिले के चारों ओर पांच अन्य जिले स्थित है। श्रीनगर जिला कारगिल के दक्षिण में, बुदग़म के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। ये शहर और उसके आस-पार के क्षेत्र एक ज़माने में दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल माने जाते थे — जैसे डल झील, शालीमार और निशात बाग़, गुलमर्ग, पहलगाम, चश्माशाही, आदि। यहाँ हिन्दी सिनेमा की कई फ़िल्मों की शूटिंग हुआ करती थी। माना जाता है कि श्रीनगर की हज़रतबल मस्जिद में हजरत मुहम्मद की दाढ़ी का एक बाल रखा है। डल झील और झेलम नदी (संस्कृत : वितस्ता, कश्मीरी : व्यथ) में आवागमन, घूमने और बाज़ार और ख़रीददारी का ज़रिया ख़ास तौर पर शिकारा नाम की नावें हैं। कमल के फूलों से सजी रहने वाली डल झील पर कई ख़ूबसूरत नावों पर तैरते घर भी हैं जिनको हाउसबोट कहा जाता है।
पांच मील लम्बी और ढाई मील चौड़ी डल झील श्रीनगर की ही नहीं बल्कि पूरे भारत की सबसे खूबसूरत झीलों में से है। दुनिया भर में यह झील विशेष रूप से शिकारों या हाऊस बोट के लिए जानी जाती है। जिसके चारों तरफ़ बीस किलोमीटर सड़क का घेरा है। डल झील के आस-पास की प्राकृतिक सुंदरता लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। डल झील चार भागों गगरीबल, लोकुट डल, बोड डल और नागिन में बंटी हुई है। इसके अलावा यहां स्थित दो द्वीप सोना लेंक और रूपा लेंक झील की खूबसूरती को ओर अधिक बढ़ाते हैं।
श्रीनगर का सबसे बडा आकर्षण यहां की डल झील है। जहां सुबह से शाम तक रौनक नजर आती है। सैलानी घंटों इसके किनारे घूमते रहते हैं या शिकारे में बैठ नौका विहार का लुत्फ उठाते हैं। दिन के हर प्रहर में इस झील की खूबसूरती का अलग रंग दिखाई देता है। देखा जाए तो डल झील अपने आपमें एक तैरते नगर के समान है। तैरते आवास यानी हाउसबोट, तैरते बाजार और तैरते वेजीटेबल गार्डन इसकी खासियत हैं। कई लोग तो डल झील के तैरते घरों यानी हाउसबोट में रहने का लुत्फ लेने के लिए ही यहां आते हैं। झील के मध्य एक छोटे से टापू पर नेहरू पार्क है। वहां से भी झील का रूप कुछ अलग नजर आता है। दूर सडक के पास लगे सरपत के ऊंचे झाडों की कतार, उनके आगे चलता ऊंचा फव्वारा बडा मनोहारी मंजर पेश करता है। झील के आसपास पैदल घूमना भी सुखद लगता है। शाम होने पर भी यह झील जीवंत नजर आती है। सूर्यास्त के समय आकाश का नारंगी रंग झील को अपने रंग में रंग लेता है, तो सूर्यास्त के बाद हाउसबोट की जगमगाती रोशनियों का प्रतिबिंब झील के सौंदर्य को दुगना कर देता है। शाम के समय यहां खासी भीड नजर आती है।
मुगल बादशाहों को वादी-ए-कश्मीर ने सबसे अधिक प्रभावित किया था। यहां के मुगल गार्डन इस बात के प्रमाण हैं। ये उद्यान इतने बेहतरीन और नियोजित ढंग से बने हैं कि मुगलों का उद्यान-प्रेम इनकी खूबसूरती के रूप में यहां आज भी झलकता है। मुगल उद्यानों को देखे बिना श्रीनगर की यात्रा अधूरी-सी लगती है। अलग-अलग खासियत लिए ये उद्यान किसी शाही प्रणय स्थल जैसे नजर आते हैं। शाहजहां द्वारा बनवाया गया चश्म-ए-शाही इनमें सबसे छोटा है। यहां एक चश्मे के आसपास हरा-भरा बगीचा है। इससे कुछ ही दूर दारा शिकोह द्वारा बनवाया गया परी महल भी दर्शनीय है। निशात बाग 1633 में नूरजहां के भाई द्वारा बनवाया गया था। ऊंचाई की ओर बढते इस उद्यान में 12 सोपान हैं। टिकट लेकर प्रवेश किया। चश्मे के किनारे से आगे बढ़ते गए। साथ में सैलानियों की भी भीड़ बढ़ती जा रही थी। फ़ोटो खींचने की जुगत में लोग पसीना-पसीना होकर उलझ रहे थे। हमें पता नहीं था कि एक महिला सैलानी अपने खाबिंद की तस्वीर खींच रही थी। हम बीच में आ गए। वह मोहतरमा बोलीं- कैसा पागल है? हमने कहा मेडम, हमें नहीं पता था कि आप तस्वीर खींच रहीं हैं। फिर आपने अपनी पागलपन की पदवी हमें क्यों दे दी। यह सार्वजनिक स्थल है आपके घर की बैठक नहीं जो आप मुफ़्त में अपनी ख़ानदानी पदवी हमें अता करें। वह महिला ग़ुस्से में लाल हो गई। उनके साथियों ने हमसे माफ़ी माँगते हुए कहा- माफ़ करें साहब, थोड़ी पागल है।
उसके बाद शालीमार बाग पहुँचे, जिसे जहांगीर ने अपनी बेगम नूरजहां के लिए बनवाया था। वे गर्मियाँ श्रीनगर के इसी बाग में बिताते थे। इस बाग में कुछ कक्ष बने हैं। अंतिम कक्ष शाही परिवार की स्त्रियों के लिए था। इसके सामने दोनों ओर सुंदर झरने बने हैं। मुगल उद्यानों के पीछे की ओर जावरान पहाडियां हैं, तो सामने डल झील का विस्तार नजर आता है। इन उद्यानों में चिनार के पेडों के अलावा और भी छायादार वृक्ष हैं। इनमें रंग-बिरंगे फूलों की भरमार है। इन उद्यानों के मध्य बनाए गए झरनों से बहता पानी भी सैलानियों को मुग्ध कर देता है। ये सभी बाग वास्तव में शाही आरामगाह के उत्कृष्ट नमूने हैं। वहाँ झरनों और सरोवरों में बच्चे कूद कर नहा रहे थे, और भी अनुशासनहीनता देखने को मिलीं। एक माली सा दिखता आदमी एक गुलाब का फूल देकर कहने लगा कि कुछ ईनाम मिल जाये। पैसे नहीं देने पर बदतमीज़ी करने लगा। उसे डाँटकर भगाया। श्रीनगर में कहीं भी भिखारी परेशान करने लगते हैं।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





