श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – शंकरचार्य पहाड़ी – भाग-१८ ☆ श्री सुरेश पटवा
शंकरचार्य पहाड़ी
मुग़ल बाग़ घूमने के बाद होटल मुग़ल दरबार में लंच हेतु गये। कश्मीरी पुलाव ने कम लगी भूख को कुछ अधिक ही बुझाया। उसके बाद डल झील को निहारते हुए शंकरचार्य पहाड़ी पर गये। श्रीनगर में ही शंकराचार्य पर्वत है जहाँ विख्यात हिन्दू धर्मसुधारक और अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादक आदि शंकराचार्य सर्वज्ञानपीठ के आसन पर विराजमान हुए थे। यह मंदिर शंकराचार्य पर्वत पर स्थित है। शंकराचार्य मंदिर समुद्र तल से 1100 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसे तख्त-ए-सुलेमन के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर कश्मीर स्थित सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण राजा गोपादित्य ने 371 ईसा पूर्व शिव मंदिर के रूप में करवाया था। डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह ने मंदिर तक पंहुचने के लिए सीढ़िया बनवाई थी। इसके अलावा मंदिर की वास्तुकला भी काफी खूबसूरत है। क़रीब पाँच किलोमीटर वाहन से चलने के पश्चात 270 सीढ़ियों को हाँफते हुए चढ़कर शिव लिंग के दर्शन करने के उपरांत वह गुफा देखी जिसमें कभी आदि शंकराचार्य ने डेरा डाला, शास्त्रार्थ किया और तपस्या की थी।
भारतीय सभ्यता की शुरुआत से कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग रहा है। नीलमत पुराण, शिव पुराण और अनेकों धार्मिक साहित्य में कश्मीर भारत का हिस्सा प्रतिपादित होता है। विभाजन के समय भारत ने धर्म के आधार पर कभी भी न तो लोगों का बँटवारा माना और न ही दो राष्ट्रों के सिद्धांत को मान्यता दी इसलिए अलगाववादियों द्वारा “आज़ादी-आज़ादी” का राग अलापना तर्क सम्मत नहीं है। कश्मीर कभी भी भारत से पृथक नहीं रहा। उन्हें आज़ादी की घुटी शेख़ अब्दुल्ला ने आज़ाद मुस्लिम रियासत के नाम पर पिलाई थी। जिसे एक कश्मीरी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सही नहीं माना। कुछ लोग कहते हैं कि शेख़ अब्दुल्ला ने नेहरू का उपयोग किया था जबकि असलियत यह है कि नेहरू ने मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर को भारत में मिलाने और बनाए रखने में शेख़ अब्दुल्ला का उपयोग किया और वक्त आने पर उन्हें जेल के सीखचों में भी रखा।
जब आदि शंकराचार्य काशी के पंडितों से शास्त्रार्थ कर चुके तब उनको यह बात बताई गई कि कश्मीर के श्रीनगर में शारदा पीठ है वहाँ दर्शन शास्त्र के प्रकांड़ विद्वान हैं, जब तक उनसे शास्त्रार्थ न होगा उनकी विद्वाता सिद्ध न मानी जाएगी। वे श्रीनगर पहुँचे जिस स्थान पर शास्त्रार्थ किया वह पहाड़ी आज भी शंकराचार्य हिल के नाम से जानी जाती है।
07 जुलाई 2022 को सुबह सोकर तो पाँच बजे उठ गए परंतु चाय के इंतज़ार में छै बजे तक आलस्य से पड़े रहे। सात बजे निकलना हुआ। अमरनाथ यात्रा के कारण तीन बजे के पूर्व सोनमर्ग पहुँच कर वापस निकलना होगा। इसलिए जल्दी निकले। सोनमर्ग का अर्थ सोने से बना घास का मैदान होता है। सोन का अर्थ सोना और मर्ग का मतलब वादी होता है। सुबह जब सूर्य की किरण हिमशिखरों पर पड़ती हैं तब एक सुनहरी रोशनी सम्पूर्ण वादी पर छा जाती है। इसलिए उसे सोनमर्ग कहते हैं। यह जगह श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 87 किलोमीटर दूर है। सोनमर्ग पर स्थित घाटी कश्मीर की सबसे बड़ी घाटी है। यह घाटी करीबन साठ मील लम्बी है। यहीं से कारगिल और द्रास होकर लेह की सड़क निकलती गई।
सोनमर्ग कश्मीर की एक निराली सैरगाह है। समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह एक रमणीक स्थल है। सिंध नदी के दोनों और फैले यहां के मर्ग सोने से सुंदर दिखाई देते हैं। इसीलिए इसे सोनमर्ग अर्थात सोने का मैदान कहा गया। सोनमर्ग से घुडसवारी करके थाजिवास ग्लेशियर भी देखने जा सकते हैं। वहां ग्लेशियर पर घूमने का आनंद भी लिया जा सकता है। अनंत हिमनदों के सामने खडे होकर प्रकृति की विशालता का एहसास मन में रोमांच उत्पन्न कर देता है। प्रतिवर्ष होने वाली अमरनाथ यात्रा का एक मार्ग सोनमर्ग से बालटाल होकर भी जाता है।
हमारी यात्रा के समय अमरनाथ यात्रा भी चालू है। पूरी कश्मीर घाटी के चप्पे-चप्पे पर सेना का क़ब्ज़ा है। हरेक गली, नुक्कड़, सड़क के किनारे हथियार बंद सैनिक मुस्तैद खड़े चौकसी कर रहे हैं। ज़रा सी हरकत पर सीटियों की आवाज़ें गूँजने लगती हैं। अमरनाथ यात्रा की गाड़ियाँ निकल रही हैं। गंदेरबल, लहार, कांगम पार करके मामर में आठ बजे एक पंजाब गार्डन होटल में नाश्ता करने रुके। सोनमर्ग से एक रास्ता बालटाल निकलता है जो कि सीधा अमरनाथ गुफा तक जाता है। अमरनाथ यात्रा के यात्री जम्मू तक ट्रेन या बस से पहुँचे हैं। वहाँ से कश्मीर के वाहनों में बैठकर सोनमर्ग होकर बालटाल जा रहे हैं। मामर से घाट शुरू हो गये है। पहाड़ों से बातें करते बादल मन मोह रहे हैं। हरीगलीवान, गुंड के बाद सोनमर्ग पहुँच गये। वहाँ से डोमरी और संगम होकर अमरनाथ गुफा पहुँचा जा सकता है। यह रास्ता जोजिला दर्रा से होकर गुजरता है। अमरनाथ यात्रियों ने बताया कि यह रास्ता खड़ा और थकाऊ है। इसलिए पहलगाम से गुफा पहुँचने और गुफा से बालटाल होकर श्रीनगर लौटने का रास्ता अपनाना श्रेयस्कर होता है।
टैक्सी ने हमें सोनमर्ग में छोड़ दिया। वहाँ से पहाड़ों पर चढ़ने वाली फ़ोर व्हील ड्राइव एक अन्य टैक्सी किराए पर ली। शौकत वालिद ज़लील गुंड वाले की गाड़ी JK 01L-6290 पर बैठ कर फ़िश पोईंट, बालटाल, हेलिपैड, सरबल, बालटाल घाटी, जोजिला दर्रा, इंडिया गेट, ज़ीरो पोईंट तक गये। ड्राइवर अच्छे स्वभाव का लड़का है। जोजिला दर्रा के ज़ीरो पोईंट पर बर्फ़ गिरने लगी। ठंड बहुत बढ़ गई इसलिए बर्फीले पहाड़ से तुरंत नीचे उतरना पड़ा। यहाँ से द्रास 35 किलोमीटर रह जाता है। हमने एक पिघलते ग्लेशियर पर जाकर फ़ोटो खींचे। वहीं पर अस्सी रुपयों में प्लेट गरम मैगी मिल रही थी। ठंड भी खूब लग रही थी। सुबह के नाश्ते से बचाकर रखे ठंडे पराँठे निकाले और गरमागर्म मैगी के साथ खाये।
श्रीनगर लौटते समय खीर भवानी दर्शन हेतु रुके। खीर भवानी, क्षीर भवानी या राज्ञा देवी मंदिर भवानी देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। जम्मू और कश्मीर के गान्दरबल ज़िले में तुलमुल गाँव में एक पवित्र पानी के चश्मे के ऊपर स्थित है। यह श्रीनगर से 25 किलोमीटर दूर है। पारंपरिक रूप से वसंत ऋतु में मंदिर में खीर चढ़ाया जाता था इसलिए नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा। उन्हें महारज्ञा देवी के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि किसी प्राकृतिक आपदा के आने से पहले मंदिर के कुण्ड का पानी काला पड़ जाता है। जम्मू और कश्मीर के महाराजा प्रताप सिंह और महाराजा हरि सिंह ने मंदिर के निर्माण और जीर्णोद्धार में योगदान दिया है।
यह मंदिर माता रंगने देवी को समर्पित है। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि अमरनाथ यात्रियों को रुकने की व्यवस्था में मंदिर तीन बजे बंद हो चुका है। इसलिए दर्शन नहीं हो सके। प्रत्येक वर्ष जेष्ठ अष्टमी (मई-जून) के अवसर पर मंदिर में वार्षिक उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर काफी संख्या में लोग देवी के दर्शन के लिए विशेष रूप से आते हैं।
चट्टी पदशाही कश्मीर के प्रमुख सिख गुरूद्वारों में से एक है। सिखों के छठें गुरू कश्मीर आए थे, उस समय वह यहां कुछ समय के लिए ठहरें थे। यह गुरूद्वारा हरी पर्वत किले से बस कुछ ही दूरी पर स्थित है। उसे आज देखा। उसके बाद हज़रतबल पहुँचे। चार दिन बाद ईद का त्योहार होने से दुकानें सज रही थीं। जूते वाहन में उतारकर कर पैदल अंदर गए। यहाँ भिखारियों की भीड़ ने घेरा। किसी तरह बचते-बचाते अंदर पहुँचे।
हजरतबल जिसे लोकप्रिय रूप से दरगाह शरीफ कहा जाता है, कश्मीर में श्रीनगर के हजरतबल इलाके में स्थित है। इसमें एक अवशेष, मोई-ए- मुक़द्दस शामिल है, जिसे व्यापक रूप से इस्लामी पैगंबर मुहम्मद का बाल माना जाता है। यह श्रीनगर में डल झील के उत्तरी तट पर स्थित है, और इसे कश्मीर का सबसे पवित्र मुस्लिम तीर्थ माना जाता है।
इस दरगाह में कई मुसलमानों द्वारा इस्लामिक पैगंबर मुहम्मद के बाल होने का विश्वास किया जाता है। अवशेष को पहली बार मुहम्मद के एक कथित वंशज सैयद अब्दुल्ला मदनी ने मदीना से 1635 में लाकर दक्षिण भारतीय शहर बीजापुर में बस गए। अब्दुल्ला की मृत्यु के बाद, उनके बेटे सैयद हमीद को वह अवशेष विरासत में मिला। कुछ ही समय बाद इस क्षेत्र पर मुगलों ने कब्जा कर लिया और हमीद से उसकी पारिवारिक संपत्ति छीनी जाने लगी। खुद को अवशेष की देखभाल करने में असमर्थ पाते हुए, उन्होंने इसे एक अमीर कश्मीरी व्यापारी ख्वाजा नूर-उद-दीन ईशाई को दे दिया।
हजरतबल तीर्थ की स्थापना शुरू में ख्वाजा नूर-उद-दीन ईशाई की बेटी इनायत बेगम द्वारा की गई थी। इमारत का पहला निर्माण 17वीं शताब्दी में मुगल सूबेदार सादिक खान ने बादशाह शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान किया था। इसे शुरू में इशरत जहां कहा जाता था। 1634 में शाहजहाँ ने इमारत को एक प्रार्थना कक्ष में बदलने का आदेश दिया था।
जब मुगल सम्राट औरंगजेब को पवित्र अवशेष के अस्तित्व और हस्तांतरण के बारे में सूचित किया गया था, तो उन्होंने इसे जब्त कर लिया और अजमेर में सूफी फकीर मुइन अल-दीन चिश्ती की दरगाह में भेज दिया, और ईशाई को दिल्ली में कैद कर लिया।
किंवदंती है कि नौ दिनों के बाद औरंगजेब ने चार खलीफाओं अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली के साथ मुहम्मद का सपना देखा। सपने में, मुहम्मद ने उसे अजमेर से मोई-ए-मुक़द्दस को कश्मीर भेजने का आदेश दिया। तब औरंगजेब ने पवित्र अवशेष ईशाई को लौटाने और उसे कश्मीर ले जाने की अनुमति दी। हालांकि, जेल में रहते हुए ईशाई की पहले ही मौत हो चुकी थी। 1700 में अवशेष को ईशाई की बेटी इनायत बेगम के साथ कश्मीर ले जाया गया था। उसने वहां अवशेष की रखवाली कर हजरतबल तीर्थ की स्थापना की। तब से, उसके पुरुष वंशज मस्जिद में अवशेष की रखवाली कर रहे हैं। बेगम के पुरुष वंशज बंदे परिवार के नाम से जाने जाते हैं। 2019 तक, तीन मुख्य सदस्य पवित्र अवशेष की देखभाल करते हैं: मंजूर अहमद बंदे, इशाक बंदे और मोहिउद्दीन बंदे। अवशेष केवल विशेष इस्लामी अवसरों जैसे मुहम्मद और उनके चार मुख्य साथियों के जन्मदिन, पर सार्वजनिक दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है,
मोई-ए-मुक़क़दस, मुसलमानों द्वारा व्यापक रूप से मुहम्मद के बाल माने जाने वाला एक अवशेष, 27 दिसंबर 1963 को दरगाह से गायब होने की सूचना मिली थी। इसके लापता होने के बाद, सैकड़ों लोगों के साथ पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। 31 दिसंबर को, भारतीय प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पवित्र मुस्लिम अवशेष के गायब होने पर राष्ट्र को सम्बोधित किया, और संदिग्ध चोरी की जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो से एक टीम को जम्मू और कश्मीर भेजा।
इस घटना के कारण भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में सांप्रदायिक तनाव और दंगे हुए, जिसके कारण भारत ने दिसंबर 1963 और फरवरी 1964 के बीच लगभग 200,000 लोगों को शरणार्थी शरण दी। अवशेष 4 जनवरी 1964 को भारतीय अधिकारियों द्वारा बरामद किया गया था। मांग की गई थी कि इसे आधिकारिक तौर पर बड़ों द्वारा पहचाना जाए। यह आरोप लगाया गया था कि राजनीतिक आकाओं ने बाल चुराया था ताकि वे बाद में इसे बहाल करने का श्रेय लेकर सत्ता में आ सकें। वर्तमान संरचना 1968 में शुरू होकर 11 साल बाद यह 1979 में बनकर तैयार हुई। इस मस्जिद को कई अन्य नामों जैसे हजरतबल, अस्सार-ए-शरीफ, मादिनात-ऊस-सेनी, दरगाह शरीफ और दरगाह आदि के नाम से भी जाना जाता है। इस मस्जिद के समीप ही एक खूबसूरत बगीचा और इश्रत महल है।
आज दोपहर सोनमर्ग से वापिस लौटते वक़्त जामा मस्जिद देखी, जो कश्मीर की सबसे पुरानी और बड़ी मस्जिदों में से है। मस्जिद की वास्तुकला काफी अद्भुत है। माना जाता है कि जामा मस्जिद की नींव सुल्तान सिकंदर ने 1398 ई. में रखी थी। इस मस्जिद की लंबाई 384 फीट और चौड़ाई 38 फीट है। इस मस्जिद में तीस हजार लोग एक-साथ नमाज अदा कर सकते हैं। पुराने शहर के मध्य नौहट्टा में स्थित, जामा मस्जिद को सुल्तान सिकंदर ने 1394 ई. में बनवाया था और 1402 ई. कश्मीर में सबसे महत्वपूर्ण मस्जिदों में से एक थी। श्रीनगर में धार्मिक-राजनीतिक जीवन का एक केंद्रीय क्षेत्र है। हर शुक्रवार को मुसलमानों की भीड़ उमड़ती है, यह श्रीनगर के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक है।
दिन का अंतिम पड़ाव चश्मा शाही बगीचा था। चश्मे शाही या चश्मा शाही या (शाही वसंत), जिसे चश्मा शाही भी कहा जाता है, मुगल सम्राट शाहजहां के गवर्नर अली मर्दन खान द्वारा एक झरने के आसपास 1632 ईस्वी में निर्मित मुगल उद्यानों में से एक है। सम्राट के आदेशानुसार अपने ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार दारा शिकोह के लिए उपहार स्वरूप बनाया गया था। यह उद्यान भारत के श्रीनगर में डल झील के सामने राजभवन (गवर्नर हाउस) स्थित है।
चश्मे शाही मूल रूप से वसंत से अपना नाम प्राप्त करता है जिसे कश्मीर की महान महिला संत रूपा भवानी द्वारा खोजा गया था, जो कश्मीरी पंडितों के साहिब वंश से थी। रूपा भवानी का पारिवारिक नाम ‘साहिब’ था और वसंत को मूल रूप से ‘चश्मे साहिबी’ कहा जाता था। वर्षों से यह नाम भ्रष्ट हो गया और आज इस स्थान को चश्मे शाही (रॉयल स्प्रिंग) के नाम से जाना जाता है।
चश्मा शाही के पूर्व में परी महल (फेयरी पैलेस) स्थित है जहाँ दारा शिकोह ज्योतिष सीखते थे और जहाँ बाद में उनके भाई औरंगजेब ने उनकी हत्या कर दी थी। यह उद्यान 108 मीटर लंबा और 38 मीटर चौड़ा है और एक एकड़ भूमि में फैला हुआ है। यह श्रीनगर के तीन मुगल उद्यानों में सबसे छोटा उद्यान है; शालीमार उद्यान सबसे बड़ा और निशात उद्यान दूसरा सबसे बड़ा उद्यान है। तीनों उद्यान डल झील के दाहिने किनारे पर बनाए गए थे, जिसकी पृष्ठभूमि में ज़बरवान रेंज है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





