श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१९ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

08 जुलाई 2022 को हम श्रीनगर से पहलगाम जा रहे हैं। पहलगाम का रास्ता भी सैलानियों को बहुत प्रभावित करता है। मार्ग में पाम्पोर में केसर के खेत दिखाई देते हैं। जगह-जगह क्रिकेट के बैट रखे नजर आते हैं। यहां विलो-ट्री की लकडी से बैट बनते हैं। रास्ते पर सबसे पहले पम्पोर आया। जिसे पम्पर या पानपर के नाम से भी जाना जाता है। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग झेलम नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित कश्मीर का एक ऐतिहासिक शहर है। प्राचीन काल में इसे पदमपुर के नाम से जाना जाता था। यह अपने केसर के लिए प्रसिद्ध है। पम्पोर दुनिया के उन कुछ स्थानों में से एक है जहां दुनिया का सबसे महंगा केसर उगाया जाता है। पम्पोर केसर के लिए जगप्रसिद्ध है जिसका पाँच साला पौधा छै पत्तियाँ धारण करता है। अक्टूबर में फसल आती है। तीन पत्तियाँ लाल और तीन पत्तियाँ हरे रंग की होती हैं। लाल रंग की पत्तियाँ असली केसर होता है। जो बहुत महँगा मिलता है। हरे रंग की पत्तियों का औद्योगिक उपयोग पान और सब्ज़ी में मसालों के तौर पर होता है। यह क्षेत्र श्रीनगर शहर के केंद्र लाल चौक से लगभग 11 किलोमीटर दूर है। पम्पोर के क्षेत्र में स्थानों के नाम आम तौर पर -बल प्रत्यय के रूप में होते है, जैसे नामलाबल, कदलाबल, द्रंगबल, फ़्रेस्टबल और लेट्राबल के इलाके। पम्पोर में तीन झीलें भी हैं, झीलों में से एक सरबल झील के नाम से जानी जाती है। सरबल झील, तुलबाग से वुयान के रास्ते में चटलम के पास केसर के खेतों से होते हुए जाती है। चटलाम के निकट स्थित होने के कारण इसे चटलाम आर्द्रभूमि भी कहा जाता है।

उसके बाद अवंतिपुर या अवंतीपोरा आया, जिसे वूंटपोर के नाम से जाना जाता है। शहर का नाम अवंतिपुर कश्मीरी राजा अवंतिवर्मन के नाम पर रखा गया था और इसमें उनके द्वारा निर्मित 9वीं शताब्दी के दो हिंदू मंदिरों के खंडहर हैं। इस शहर की स्थापना अवंतिवर्मन ने की थी जो उत्पल वंश के पहले राजा थे और उन्होंने 855 से 883 ईस्वी तक कश्मीर पर शासन किया था। अवंतिवर्मन ने राजा बनने से पहले अवंतीपोरा में विष्णु को समर्पित एक हिंदू मंदिर का निर्माण किया, जिसे “अवंतिसवामिन” कहा जाता है। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने शिव को समर्पित “अवंतीश्वर” नामक एक दूसरा हिंदू मंदिर बनाया। दोनों मंदिर विशाल आयताकार पक्के आंगनों में बनाए गए थे। वे मध्य युग में नष्ट हो गए। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में पुरातत्वविद् दया राम साहनी द्वारा उनकी खुदाई की गई थी। भारतीय राज्यों में सिर्फ़ कश्मीर एक ऐसा प्रदेश है जिसका प्रामाणिक इतिहास कल्हण नामक विद्वान द्वारा राज़तरंगिणी नाम से अवंतीपुर में ही लिखा गया था।

भारत के हिमालयी क्षेत्र सभी एक जैसे ही हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र के इलाकों में चश्मों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कश्मीर में नाग, सिक्किम में धारा, तो उत्तराखण्ड में जलस्रोत, बावली, तो हिमाचल में नौले, खात्री या छुरुहरा और मेघालय में जलकुण्ड। श्रीनगर से 53 किलोमीटर की दूरी पर अनंतनाग है। यह श्रीनगर और जम्मू के बाद जम्मू और कश्मीर का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। इस शहर को इस्लामाबाद और अनंतनाग दोनों नामों से पुकारा जाता है।

शहर का संस्कृत नाम अनंतनाग नीलमात पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित है। कश्मीर और लद्दाख के राजपत्र के अनुसार, इसका नाम विष्णु के महान नाग और अनंत काल के प्रतीक अनंत के नाम पर रखा गया है। माना जाता है कि इस्लामाबाद नाम एक मुगल गवर्नर इस्लाम खान के नाम से लिया गया है, जिन्होंने इस क्षेत्र में एक बगीचा लगवाया था।

डोगरा शासन के दौरान, अनंतनाग/इस्लामाबाद कश्मीर घाटी के तीन जिलों में से एक का मुख्यालय था, जिसे “अनंतनाग वज़रात” कहा जाता था। मार्तंड सूर्य मंदिर कश्मीर के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है, जिसे लगभग 500 ईस्वी में बनाया गया था। यह मंदिर अनंतनाग से 9 किमी पूर्व-उत्तर-पूर्व और मट्टन के दक्षिण में केहरीबल में स्थित है। इस प्रसिद्ध सूर्य मंदिर को शासक सिकंदर बुतशिकन ने नष्ट कर दिया था। अनंतनाग में एक रेस्टोरेंट में नाश्ता और काफ़ी पीकर चल दिए।

अमरनाथ यात्रा के कारण कई जगह जाम लग रहा था इसलिए क़ाफ़िला घिसटते हुए चल रहा था। हम लिद्दर नदी की कलकल के सरगम में ठंडी हवाओं के साथ चिनार और पाइन पेड़ों से बात करते आगे बढ़ते रहे। लिद्दर नदी पहले कभी लम्बोदरी नदी कहलाती थी। पेड़ों पर आशियाना जमाये पक्षी दिख जाते और हमें देखकर फुदक लेते। एक बंदरिया बच्चों को समेटने में परेशान थी। पाइन के पेड़ पर सुबह के नाश्ते के बाद की ऊधम उसकी परेशानी का सबब थी। उसके बच्चे पेड़ की डाल से लटक कर नीचे आ जाते। बंदरिया उन्हें पेड़ पर चढ़ने को हड़काने के लिए नीचे उतरती तो बच्चे ऊपर चढ़ जाते। ट्राफ़िक जाम में बंदरों की मटरगस्ती और लिद्दर नदी के बहाव के साथ एक कौए की काँव-काँव सुनकर चीड़-चिनार-देवदार वृक्षों की तरफ़ ध्यान गया। जिनके साये में ट्राफ़िक जाम का वक़्त गुज़ारा। ख़्याल आया कि इस सुंदर वातावरण में कोयल कूकनी चाहिए। परंतु कोयल कश्मीर में नहीं कूकती। उसे कूकने के लिए सतपुड़ा वाले आम के पेड़ चाहिए।    

इनके अलावा अवंतिपुर में 9वीं शताब्दी में बने दो मंदिरों के भग्नावशेष तथा मार्तड का सूर्य मंदिर भी आकर्षक हैं। सागरतल से 2130 मीटर की ऊंचाई पर बसा पहलगाम कभी चरवाहों का छोटा सा गांव था। किंतु यहां बिखरी नैसर्गिक छटा ने इसे खुशनुमा सैरगाह बना दिया। लिद्दर नदी इसकी छटा को और बढाती है। नदी पर कई जगह बने लकडी के पुल और दूर दिखते हिमशिखर पिक्चर पोस्टकार्ड से दृश्य प्रस्तुत करते हैं। देवदार के जंगल, झरने और फूलों के मैदान तो जगह-जगह नजर आएंगे। बैसरन के मर्ग, आडु, चंदनवाडी जैसे स्थान घोडों पर बैठकर घूमे जा सकते हैं। साहसी पर्यटक पहलगाम से तरसर, मरसर झीलें, दुधसर झील और कोलहाई ग्लेशियर जैसे ट्रेकिंग रूटों पर निकल सकते हैं। अमरनाथ यात्रा का मुख्य मार्ग पहलगाम से चंदनवाडी, शेषनाग, महागुनस, पंचतरणी, संगम होते हुए अमरनाथ गुफा जाता है।

हमारा क़ाफ़िला ग्यारह बजे पहलगाम पहुँचा। पहलगाम शाब्दिक अर्थ = चरवाहों का गाँव है। जम्मू और कश्मीर के अनन्तनाग जिले का एक लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल है। साथ ही अमरनाथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है। विश्व भर से हजारों पर्यटक प्रति वर्ष यहाँ आते हैं। यह अनन्तनाग से 45 किमी की दूरी पर लिद्दर नदी के किनारे स्थित है। पहलगाम, अननतनाग ज़िले की पाँच तहसीलों में से एक तहसील है। अनंतनाग से पहलगाँव की तरफ़ रास्ता मुड़ते ही लिद्दर नदी आपका स्वागत करती है। लिद्दर नदी किसी समय लम्बोदरी नाम से जानी जाती थी।

लिद्दर घाटी की पश्चिमी सीमा कश्मीर घाटी से लगी है और उत्तरी सीमा सिंधु घाटी के लगती है। घाटी की कुल लंबाई  40 किलोमीटर है। इसकी अधिकतम चौड़ाई पांच किमी है। लिद्दर बेसिन, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में पीर पंजाल रेंज, उत्तर में सिंधु घाटी और पूर्वोत्तर में जांस्कर श्रेणी द्वारा परिसीमित है।  लिद्दर जल निकासी बेसिन का कुल  क्षेत्र 1,134 किमी है। यह घाटी लिद्दर नदी द्वारा निर्मित है जो अंग्रेजी के वाई (Y) अक्षर के आकार में है। पहलगाम के ऊपर नदी दो धाराओं, पूरबी लिद्दर और पच्छिमी लिद्दर के रूप में बहती है। इन दो धाराओं में से पूर्वी लिद्दर नदी ऊपर की ओर चन्दनवाड़ी से होकर गुजरती है और इसका स्रोत शेषनाग झील और शीशराम ग्लेशियर है। पश्चिम लिद्दर नदी कोल होई ग्लेशियर से निकलती है और अपने रास्ते में कई हरे शंकुधारी जंगलों और अल्पाइन घास की उपत्यकाओं से गुजरती है। लिद्दर घाटी अन्य ज़िलों के लिये स्वच्छ जलापूर्ति का स्रोत है और साथ ही कृषि हेतु सिंचाई का साधन भी।  लिद्दर नदी अपने मार्ग में कई उल्लेखनीय प्राकृतिक स्थलों और पर्यटन स्थलों, उदाहरणार्थ, अरु, पहलगाम, बेताब घाटी, और अकद से होकर गुजरती है। इस घाटी में अवस्थित मुख्य कस्बों में मंडलान, लारिपोरा, फ्रास्लन, अशमुकाम और सीर हमदान हैं।

पहलगाम में घुड़सवारी का भय मिश्रित मज़ा लिया। तीन घंटे घुड़सवारी का एक स्पॉट मिनी-स्विट्ज़रलैंड है। जिसका रेट 2,500.00 रुपए प्रति सवार है। सौदेबाज़ी के बाद 2000.00 प्रति सवार तय हो गया। घोड़े पर बैठ कर सीधे पहाड़ चढ़ना सचमुच दिलेरी का काम है। पत्थर, कीचड़, पेड़, पौधे, अन्य घुड़सवार के बीच शुरू में घबराहट हुई। परंतु घोड़े पर बैठने की तकनीक समझने पर सहजता आ गई। सीधी चढ़ाई चढ़ने में अधिक पता नहीं चला लेकिन उतरने में सामने खाई दिखने से भय लगता रहा। घोड़े भी आपस में टकराते रहे। घोड़ा एक पेड़ के किनारे चला तो दाहिनी घुटना पेड़ से टकरा गया। एक कराह के साथ मुँह से गाली निकल गई।

एक फ़ोटोग्राफ़र प्रति फ़ोटो प्रिंट का 100.00 माँग रहा था, और उसकी फ़ोटो मोबाईल में देने का 20.00 प्रतिफ़ोटो। सौदेबाज़ी उपरांत क्रमशः 50.00 और 10.00 रुपए तय हुआ। उसने 128 फ़ोटो निकाल लिए। फ़ोटो प्रिंट में समय अधिक लगना था इसलिए मोबाईल में फ़ोटो लेने की सौदेबाज़ी शुरू हुई। उससे सारी फ़ोटो 1000.00 रुपए में ले लीं। वहीं पराठा खाया और घोड़े पर सवार होकर वापिस चल दिए।

अनंतनाग-पहलगाम सड़क पर ग्रीनहाइट होटल में रुके। एक बहुत ही शानदार और खूबसूरत लोकेशन पर आरामदायक होटल की बालकनी से लिद्दर नदी पर राफ़्टिंग के नज़ारे लुभावने थे। हमसे रहा नहीं गया। बालकनी में कुर्सी रखकर अड्डा जमाया। कमरे की बालकनी से सामने लिद्दर नदी के पार पहाड़ियों की एक के बाद एक चार क़तार दिख रही हैं। उनके पीछे सूर्य अस्ताचलगामी हो रहा है। नदी के दोनों तरफ़ होटलों का अम्बार है। दाहिनी तरफ़ पहाड़ों की आठ-दस क़तारें और उनके ऊपर बादलों की अठखेलियाँ आकर्षित कर रही हैं। लिद्दर नदी की ध्वनि सुनते बहुत देर तक बालकनी में बैठे रहे।

सैलानियों को आकर्षित करने वाले अन्य स्थानों में कोकरनाग 2012 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान औषधीय गुणों वाले प्राकृतिक चश्मों के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीरी भाषा में नाग का अर्थ चश्मा भी होता है। वेरीनाग में भी कुछ प्राकृतिक चश्में हैं। यहां बादशाह जहांगीर ने चश्मों का जल एक ताल में एकत्र कर उसके आसपास एक उद्यान बनवाया था। 80 मीटर के दायरे में फैले आठ कोणों वाले इस ताल एवं उद्यान में चिनार के वृक्षों की कतारें सैलानियों का मन मोह लेती है। चार बजे के लगभग आधा घंटा वहाँ बिताया।

09 जुलाई 2022 को सुबह छै बजे पहलगाम से गुलमर्ग के लिए रवाना होना था लेकिन दो साथियों की तबियत ठीक न होने की वजह से नौ बजे के बाद रवाना हो सके। कश्मीर घाटी में श्रीनगर से किसी भी दिशा में निकल जाएं तो प्रकृति के इतने रूप देखने को मिलते हैं कि लगता है जैसे प्रकृति ने अपना खजाना यहीं छुपा रखा है। गुल का मतलब फूल और मर्ग याने वादी, गुलमर्ग का अर्थ हुआ फूलों की वादी। लिद्दर नदी में कल साफ़ कंचन पानी प्रवाहित हो रहा था। विगत रात अमरनाथ गुफा पर बादल फटने से आज सुबह लिद्दर नदी का पानी मटमैला हो गया है। अमरनाथ गुफा के एकतरफ से झेलम और सिंधु नदियों की सहायक नदियों का प्रवाह है।

अमरनाथ गुफा के पास बादल फटा है। सैलाब आया, कई लोग मारे गए, कई लापता हैं। इसे प्राकृतिक आपदा कहकर बात खत्म नहीं की जा सकती। प्रकृति ने नदी के रास्ते में तंबू लगाने के लिए नहीं कहा था। कोई तो ऑथोरिटी होगी, जिसकी देख रेख में अमरनाथ यात्रा चल रही है। क्या श्राइन बोर्ड इस आपदा के लिए ज़िम्मेदार नहीं? साफ दिख रहा है कि नदी के बीच में तंबू लगे हैं। पहाड़ों में मौसम की अनिश्चितता के चलते अतिरिक्त सावधानी की ज़रूरत थी। पहाड़ों को जिस क्रूरता के साथ काटा जा रहा, जंगल काटे जा रहे हैं, उससे पहाड़ कमज़ोर हुए हैं। बुलडोजरों से पहाड़ भी आतंकित हैं।

गुलमर्ग जाने के लिए अनंतनाग, अवंतिपुर के बाद नारबल से बाईं तरफ़ कट गया। कश्मीर में कौए और कुत्ते खूब हैं और खूब तंदुरुस्त भी हैं। सर्वत्र मांसाहार होने से बचा-खुचा खाना और कचरा उनका खाना ख़ज़ाना होता है। यदि ये दोनो यहाँ न हों तो धरती का स्वर्ग जानवरों हड्डियों और पक्षियों के पंखों से भर जायेगा। यह भी कश्मीरियत है। सुबह पैदल घूमने निकले तो फ़ौजियों से मेल-मुलाक़ात हुई। वे बनारस, नागालैंड और उत्तराखंड से आकर यहाँ ड्यूटी निभा रहे हैं। उन्हें स्टेट बैंक का अफ़सर होना बताया तो उन्होंने खुश होकर जयहिंद कहा। कुछ देर उनके निजी जीवन पर चर्चा हुई। उन्होंने हमसे पूछा कि सेवानिवृत्त जीवन कैसा चल रहा है। हमने जो बात कही वह उनके दिल को छू गई- हमने कहा- हर छै माह में लम्बा निकल लेते हैं। पैसा छोड़ कर जाएँगे, लड़का है तो बहु उड़ाएगी और बेटी है तो दामाद उड़ाएगा, इससे कहीं ठीक है कि आधा ख़ुद उड़ा कर जाओ। आधा छोड़ जाओ। वे हँस दिए, हम चल दिये।

कल बक़रीद है। कल से तीन दिन सब बंद रहेगा। लोग ईद की ख़रीदी में भारी संख्या में बाज़ारों में पहुँच रहे हैं। जम्मू कश्मीर पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस भारी संख्या में सड़क पर उतरी है। हर एक किलोमीटर के फ़ासले पर एक सुरक्षित वाहन कश्मीर पुलिस का और दूसरा रिज़र्व पुलिस का मुस्तैद है। हालाँकि दंगा उपद्रव की कोई सम्भावना नहीं है। ताली दो हाथ से बजती है और यहाँ दूसरा हाथ नदारत है। और अभी चुनाव भी नहीं हो रहा है। अचानक ट्रेन का फाटक आ गया। बारामूला से बनिहाल ट्रेन चलने लगी है। वह निकलने वाली है। हम रुके हैं।

जम्मू-बारामूला लाइन को जम्मू और कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए बिछाया जा रहा है। 356 किलोमीटर लंबा रेलवे ट्रैक जम्मू से शुरू होकर बारामूला पर खत्म होगा। यह भारतीय रेलवे के उत्तरी क्षेत्र के फिरोजपुर रेलवे डिवीजन के अधिकार क्षेत्र में आता है। 359 मीटर (1,178 फीट) लंबा चिनाब ब्रिज इस लाइन पर बना है। मार्ग के निर्माण में प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा जिसमें प्रमुख भूकंप क्षेत्र और दुर्गम इलाके शामिल हैं। यह रेल अभी बनिहाल से बारामूला तक चल रही है। सरकार ने अगस्त 2022 तक कटरा-बनिहाल खंड को पूरा करने के लिए समय-सीमा तय की है, लेकिन कटरा-बनिहाल खंड को तय समय सीमा में पूरा करना मुश्किल लगता है।

बहुत देर होती देख सड़क पर उतर गये। एक कश्मीरी सज्जन से बातचीत होने लगी। उन्होंने बताया कश्मीर में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती है। सरकारी स्कूलों में उर्दू माध्यम से पढ़ाई होती है। कॉन्वेंट स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम है परंतु हिंदी नहीं बल्कि उर्दू एक वैकल्पिक भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है। सभी हिंदी बोलते और समझते हैं लेकिन लिखना पढ़ना नहीं आता है। यहाँ सम्पर्क भाषा को हम हिंदी के बजाय हिंदुस्तानी कह सकते हैं। जम्मू-श्रीनगर रोड पर पुलिसिया हुक्म से रुके हैं। उन्होंने सामने से बालटाल से लौटने वाला अमरनाथ यात्रा कारवाँ छोड़ा है। बस, मिनी बस, कार, ट्रैव्लर्ज़ सरपट दौड़ रहे हैं। हमारी कार के सामने मुस्तैद सिपाही खड़ा है। हम संतरे की गोली चूस रहे हैं। उनका दाहिना हाथ बट पर और बायाँ हाथ बैरल पर है। ज़रा सी भी ग़ैर-बाजिब हरकत पर आप गोलियों के हमदम हो सकते हैं।

पर्यटन के दौरान सैलानी अक्सर खाने पीने में गलती करते हैं। पैकेज में ब्रेकफ़ास्ट और डिनर शामिल होता है। लोग क्या खाना है, निश्चित नहीं करते। वे वहाँ क्या परोसा गया है और लोगों की प्लेट में क्या खाया जा रहा है। ख़ुद की ज़रूरत और पचाने की क़ाबिलियत को अनदेखा कर गफ़लत में ठूँस कर नाश्ता कर लेते हैं। अपच के शिकार होते हैं। फिर कम खाना लेने से और खूब चलने से कमजोर होकर इन्फ़ेक्शन पकड़ लेते हैं। सैलानी को पाचन क्षमता और घूमने में मेहनत के हिसाब से खुद की प्लेट तय करनी चाहिए। 

असल में पर्यटन आसान काम नहीं है। लोग या तो ज़रूरत से अधिक खाकर पेट ख़राब कर लेते हैं या सही समय पर सही खाना नहीं खाने और अधिक मेहनत से कमजोरी के कारण इन्फ़ेक्शन के शिकार हो जाते हैं। सही समय पर सही भोजन और आराम से सेहत दुरुस्त रहती है। साथ में मानसिक और भावनात्मक मज़बूती भी पर्यटन में ज़रूरी है। अन्यथा आप घूमने का आनंद लेना तो दूर की बात है, चिड़चिड़े होकर सम्बन्धों को ख़राब कर सकते हैं। 

दो सदस्यों की तबियत ख़राब हो गई है। एक को ठंड लगने से टॉन्सिल में इन्फ़ेक्शन हो गया है। दूसरी सदस्य को सर्दी जुकाम हुआ था तब से पेट साफ़ नहीं हो रहा है। पम्पोर लेठपोरा में शाश्वत और प्रतिभा को अमरनाथ यात्रा हेतु तैनात स्वास्थ्य शिविर में दिखाया। वहीं एक केसर की दुकान पर्ल ओफ़ कश्मीर से 250.00 में गोरे और चमकदार होने के लिए एक ग्राम केसर और दिल की माली हालत सुधारने के लिए 400.00 में कहवा का एक डिब्बा यह सोच कर ख़रीदा कि अब फिरसे जवाँदिल और गोरे होकर कश्मीर आयेंगे। सौदेबाज़ी के बाद 650.00 की जगह 550.00 ही भुगतान किए।

नारबल से गुलमर्ग के लिए मुड़े। यहाँ से बारामूला 37 किलोमीटर और उरी 86 किलोमीटर दूर है। उसके उस तरफ़ मुज़फ़राबाद बॉर्डर है। जहाँ से भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार होता है। आगे मागम से निकले। ईद की ख़रीददारी शबाब पर दिखी। पापलर पेड़ की क़तारें शुरू हो गईं। जो कि गुलमर्ग की पहचान हैं। कुंजर और टंगमर्ग के बाद हम गुलमर्ग पहुँच गये। हम गुलमर्ग रिज़ॉर्ट में रुके। पुराना होटल हट टाइप बना है। केबल कार में बैठकर आसमान नापने की क़वायद में एक एजेंट को बुलाकर पता किया तो उसने कहा-कल ईद होने के कारण सभी स्टाफ़ चला गया है, और उसकी बुकिंग ऑनलाइन होती है। वह भी बंद हो चुकी है। इसलिए घोड़ों से या बड़ी गाड़ी से घूमने का विकल्प है।

राजमार्गो पर लगे दिशा-निर्देशों पर लिखे अनेक शहरों के नाम सैलानियों को आकर्षित करते हैं। लेकिन अधिकतर सैलानी, गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम आदि घूमने जाते हैं। गुलमर्ग के रास्ते में कई छोटे सुंदर गांव और आसपास धान के खेत आंखों को सुहाते हैं। सीधी लंबी सडक के दोनों और ऊंची दीवार के समान दिखाई पडती पेडों की कतार अत्यंत भव्य दिखाई देती है। पुरानी फिल्मों में इन रास्तों के बीच फिल्माए गीत पर्यटकों को याद आ जाते हैं। तंग मार्ग के बाद ऊंचाई बढने के साथ ही घने पेडों का सिलसिला शुरू हो जाता है। कुछ देर बाद सैलानी गुलमर्ग पहुंचते हैं तो घास का विस्तृत तश्तरीनुमा मैदान देख कर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार उत्तराखंड में पहाडी ढलवां मैदानों को बुग्याल कहते हैं, कश्मीर में उन्हें मर्ग कहते है। गुलमर्ग का अर्थ है फूलों का मैदान। समुद्र तल से 2680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गुलमर्ग सैलानियों के लिए वर्ष भर का रेसॉर्ट है। यहां से किराये पर घोडे लेकर खिलनमर्ग, सेवन स्प्रिंग और अलपत्थर जैसे स्थानों की सैर भी कर सकते हैं। घोड़े से खिलन मर्ग, चिल्ड्रन पार्क, महाराजा पैलेस तक जाकर फ़िज़ा का लुत्फ़ उठा सकते हैं। केबल कार (गंडोला) द्वारा गुलमर्ग से कुँगडोरा जाकर चारों तरफ़ मनभावन दृश्यों का आनंद के सकते हैं।

विश्व का सबसे ऊंचा गोल्फकोर्स भी यहीं है। सर्दियों में जब यहां बर्फ की मोटी चादर बिछी होती है तब यह स्थान हिमक्रीडा और स्कीइंग के शौकीन लोगों के लिए तो जैसे स्वर्ग बन जाता है। यहां चलने वाली गंडोला केबल कार द्वारा बर्फीली ऊंचाइयों तक पहुंचना रोमांचक लगता है। ढलानों पर लगे चीड या देवदार के पेडों पर बर्फ लदी दिखती है। तमाम पर्यटक बर्फ पर स्कीइंग का आनंद लेते हैं तो बहुत से स्लेजिंग करके ही संतुष्ट हो लेते हैं। यहां पर्यटक चाहें तो स्कीइंग कोर्स भी कर सकते हैं। हर वर्ष होने वाले विंटर गेम्स के समय यहां विदेशी सैलानी भी बडी तादाद में आते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला नंदा देवी, एलओसी और पीर पंजाल रेंज का शानदार दृश्य प्रस्तुत करता है। हिमालय पर्वतमाला की सुंदरता को संजोने के अलावा, पर्यटक घुड़सवारी और स्नो स्कीइंग जैसी अन्य गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। केबल कार गुलमर्ग गोंडोला दुनिया की दूसरी सबसे लंबी और दूसरी सबसे ऊंची केबल कार है।  दो चरणों में विभाजित, यह प्रति घंटे लगभग 600 लोगों को अपहरवत पर्वत तक ले जाता है, जहां गुलमर्ग में अधिकांश शीतकालीन खेल होते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला के चरण 1 द्वारा गुलमर्ग रिज़ॉर्ट से कोंगदूरी पर्वत (मध्य स्टेशन) तक पहुँचे। यह 2,990 मीटर की ऊँचाई से शुरू हुआ और 400 मीटर की ऊर्ध्वाधर वृद्धि से 3390 मीटर की ऊँचाई पर पहुँचा कर रुका। गुलमर्ग गोंडोला का चरण 2 कोंगदूरी पर्वत को अपहरवत चोटी से जोड़ता है। केबल कार 1,330 वर्टिकल मीटर से लगभग 4,000 मीटर की ऊंचाई तक चढ़ती है। स्टेशन पर पहुंचने के बाद पर्वत की चोटी तक पहुंचने के लिए 30 मिनट का ट्रेक किया। यहां से एलओसी या नियंत्रण रेखा दिखाई दे रही है।

सबसे रमणीय स्थानों में से एक, खिलनमर्ग हिमालय की कुछ सबसे ऊंची चोटियों की मनोरम झलकियों से घिरा हुआ है। खिलनमर्ग एक लघु घाटी है जो 6 किमी की पैदल दूरी पर गुलमर्ग से 2000 फीट ऊपर स्थित है और जम्मू-कश्मीर में सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। यह स्थान साहसिक खेलों के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का सही समावेश है, जो इसे हजारों आगंतुकों के लिए एक पसंदीदा स्थान बनाता है। ऑफबीट यात्रा के प्रति उत्साही लोगों के लिए खिलनमर्ग एक बेहतरीन जगह है क्योंकि यह स्थान सीधे वाहनों से उपलब्ध नहीं है। इस जगह तक पहुंचने के लिए या तो गुलमर्ग से पैदल चलना पड़ता है या एक टट्टू लेना पड़ता है। टट्टू की सीधी चढ़ाई चलनी पड़ी।

खिलनमर्ग वसंत ऋतु में खिलने वाले और सुगंधित फूलों से आच्छादित है और सर्दियों में स्कीइंग के प्रति उत्साही लोगों के लिए एक प्रिय गंतव्य है। जब ऊपर पहुँचे तो नंगा पर्वत शिखर और नन और कुन की जुड़वां चोटियाँ भी खिलनमर्ग से दिखाई दे रही थीं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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