श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. कमल किशोर दुबे जी द्वारा लिखित “मानव जीवन की सार्थकता…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९४ ☆
☆ “मानव जीवन की सार्थकता…” – लेखक..डॉ. कमल किशोर दुबे ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक.. “मानव जीवन की सार्थकता”
लेखक..डॉ. कमल किशोर दुबे
पृष्ठ संख्या – 128 पृष्ठों
मूल्य 199/- रुपये
प्रकाशक – भाषा भारती प्रकाशन
J-610, दिल्ली 110053
संपर्क – मोबाइल 7428732689 ई-मेल – bhashabharti99@gmail.com
☆ जीवन दर्शन, नैतिकता और व्यवहारिक आध्यात्मिकता का समन्वित पाठ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
यह पुस्तक मूलतः चिंतन प्रधान निबंधों का संकलन है, जिनमें मानव जन्म की दुर्लभता, सही गलत के विवेक, धर्म और नैतिकता, सामाजिक दायित्व, तथा आत्मिक साधना जैसे मुद्दों पर क्रमिक और संतुलित विमर्श प्रस्तुत हुआ है।
जीवन को केवल भोग या उपभोग की प्रक्रिया न मानकर, उसे जिम्मेदार, सजग और मूल्यनिष्ठ आचरण का अवसर मानते हुए ,लेखक उपदेशात्मक होते हुए भी बोझिल नहीं हैं ।
कमल किशोर जी मनुष्य को केवल भौतिक नहीं, बल्कि चेतन सत्ता के रूप में चिन्हित करते हुए कहते हैं कि विवेक, मूल्य-बोध और संवेदना ही वह विशेषता है जो पशु और मनुष्य के बीच की दूरी को तय करती है , यह दूरी केवल वाणी या बुद्धि से नहीं, बल्कि कर्म के स्तर पर दिखाई देनी चाहिए।वे बार‑बार प्रश्न उठाते हैं किहम क्यों जी रहे हैं? हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है? क्या हमारा पूरा समय केवल धन संचय, प्रतिष्ठा और प्रतिस्पर्धा में बीत जाना ही पर्याप्त है? या इसके पार भी कुछ है जिसके लिए काम करना चाहिए? इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढते हुए लेखक पाठक को तैयार जवाब बताने की बजाय, उसे स्वयं सोचने पर मजबूर करते हैं ।
पुस्तक की रचनाएँ जीवन के विभिन्न आयामों को इस तरह स्पर्श करती हैं कि व्यक्तिगत साधना और सामाजिक सरोकार एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक दिखते हैं। धार्मिक आडंबर, कर्मकांड और बाह्य दिखावे की आलोचना भी है, तो कहीं आचरण प्रधान धर्म, करुणा, सेवा और ईमानदारी की प्रतिष्ठा की प्रशंसा भी की गई है।लेखक बार‑बार स्पष्ट करते हैं कि यदि धर्म से मनुष्यता, करुणा और न्याय लुप्त हो जाएँ तो वह केवल एक आवरण बचा रह जाता है। लोककथाओं, साधारण गृहस्थ की दिनचर्या और प्रचलित जीवन स्थितियों के माध्यम से वो बताते हैं कि जीवन की सार्थकता किसी विशेष वेशभूषा, स्थान या आश्रम की मोहताज नहीं, बल्कि उसी घर परिवार, नौकरी, बाज़ार और समाज में भी गृहस्थ जीवन के साथ सम्भव है, जहाँ हम प्रतिदिन संघर्षरत हैं।
उदाहरण देते हुए लेखक एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना करते हैं जो आर्थिक रूप से समृद्ध, सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित और बाहरी रूप से सफल है, परंतु उसके व्यवहार में संवेदना, विनम्रता और सेवा भाव का अभाव है । ऐसे व्यक्ति को वे ‘सफल’ तो कह सकते हैं, किन्तु उसका जीवन‘सार्थक’ नहीं मानते।
इसके विपरीत, सीमित साधनों वाला, लेकिन ईमानदार, सहृदय और दूसरों के लिए उपयोगी व्यक्ति, जो अपनी सुविधा से पहले दूसरों की पीड़ा को महत्व देता है, लेखक के लिए अधिक सार्थक जीवन का उदाहरण है। इस तुलना से पुस्तक का मंतव्य स्पष्ट हो जाता है कि जीवन का मापदंड धन या सत्ता नहीं, बल्कि उपयोगिता, करुणा और नैतिकता हैं।
इसी तरह क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और अहंकार की चर्चा करते हुए वे इन्हें किसी दैवी दंड का कारण कहकर भय उत्पन्न नहीं करते, बल्कि दिखाते हैं कि ये भाव हमारे अपने मन की शांति, संबंधों की मधुरता और समाज की समरसता को नष्ट करते हैं । इस प्रकार ‘पाप’ और ‘दंड’ की पारंपरिक भाषा के स्थान पर ‘परिणाम’ और ‘जिम्मेदारी’ की उनकी आधुनिक व्याख्या प्रभावी है।
समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति इसकी सरल, भावपूर्ण और प्रवाही भाषा है, जो कहीं कहीं लोकधर्मी मुहावरे, धर्मग्रंथ के सूत्र और लोककथाओं से समृद्ध है । लेखक का दृष्टिकोण भी संतुलित है, वे एक ओर अंधविश्वास, संकीर्णता और बाह्य धार्मिकता की आलोचना करते हैं, तो दूसरी ओर व्यवहारिक आध्यात्मिकता, आचरण प्रधान धर्म और सामाजिक जिम्मेदारी की अनुशंसा करते हैं । यह संतुलन पुस्तक को व्यवहारिक बनाता है।
संन्यास के बजाय गृहस्थ जीवन के भीतर ही कर्म साधने की बात लेखक करते हैं, गृहस्थ को “रोजमर्रा के संघर्षों के बीच भी आत्मा की आवाज सुनने वाला साधक” मानकर उसके जीवन को गरिमा पूर्ण दिशा देते हैं । आज के भ्रम भरे विचलित समय में पाठक के भीतर इस दृष्टिकोण से सकारात्मक ऊर्जा आती है।
यद्यपि कई जगह नैतिक आग्रह की तीव्रता इतनी बढ़ जाती है कि विशेष रूप से युवा, तर्कप्रधान या संशयात्मक प्रवृत्ति वाले पाठक को भाषा आदर्शवादी लग सकती है।
आधुनिक मनोविज्ञान, समाजशास्त्र या समकालीन शोधों के संदर्भ अपेक्षाकृत कम हैं, यदि लेखक ने इनसे भी कुछ उदाहरण जोड़े होते, तो तर्क की प्रभावशीलता और वैज्ञानिकता और बढ़ सकती थी।
कुछ अध्यायों में भाव प्रवणता के कारण विचारों की पुनरावृत्ति का अनुभव भी होता है।
इन सीमाओं के बावजूद “मानव जीवन की सार्थकता” उन पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी और प्रेरक कृति सिद्ध होती है, जो अपने जीवन के उद्देश्य, दिशा और मूल्य-चयन को लेकर गंभीर आत्म चिंतन करना चाहते हैं और जीवन की राह पर व्यावहारिक मार्गदर्शन खोज रहे हैं।
छात्र, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, धार्मिक सांस्कृतिक मंचों से जुड़े व्यक्ति तथा सामान्य गृहस्थ , सबके लिए यह पुस्तक जीवन दर्शन, नैतिकता और व्यवहारिक आध्यात्मिकता का समन्वित पाठ प्रस्तुत करती है।
पुस्तक लगभग 128 पृष्ठों में, 28 चैप्टर्स में विन्यस्त है, इसका मूल्य 199/- रुपये अंकित है, तथा इसे भाषा भारती प्रकाशन, J-610, दिल्ली 110053 द्वारा प्रकाशित किया गया है। संपर्क के लिए मोबाइल 7428732689 और ई-मेल bhashabharti99@gmail.com दिया गया है।
इस प्रकार, यह कृति आज के भटकाव, अव्यवस्था और स्वार्थ की संस्कृति के बीच मनुष्यता, करुणा और उत्तरदायी जीवन बोध का सजग दिशा दर्शक दस्तावेज है।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८
readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






