श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग- २० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

10 जुलाई 2022 को गुलमर्ग में सर्द रात गुज़ारने के बाद नाश्ता निपटाया। गाड़ी वालों ने गुलमर्ग के पर्यटन स्थलों के भ्रमण हेतु एक वाहन का खर्चा 4,000/- बताया। लम्बी बातचीत और बोलियों के उतार चढ़ाव के बाद 3,000/- में सौदा पट गया। लेकिन ईद के कारण गाड़ी नहीं आ पायी इसलिए कार्यक्रम निरस्त करना पड़ा। बारह बजे दोपहर को हमारी टैक्सी आ गयी। हम हाउसबोट में शिफ़्ट होने को श्रीनगर रवाना हुए। वहाँ हाउसबोट में रुकना है। हमने सोचा भीड-भाड से परे शांत वातावरण में किसी हाउसबोट में रहने की इच्छा है तो नागिन लेक या झेलम नदी पर खडे हाउसबोट में ठहर सकते हैं। नागिन झील भी कश्मीर की सुंदर और छोटी-सी झील है। यहां प्राय: विदेशी सैलानी ठहरना पसंद करते हैं। झेलम नदी में छोटे हाउसबोट होते हैं।

आज कश्मीर में बक़रीद मनाई जा रही है। गुलमर्ग से श्रीनगर के लिए निकले। चीड़, चिनार, देवदार के पेड़ जो आते वक्त स्वागत द्वार थे, अब बिदाई तोरण नज़र आ रहे हैं। जल के कई रिसाव स्थान पार करते विचार आ रहा है कि भारत के हिमालयी क्षेत्र सभी एक जैसे ही हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र के इलाकों में चश्मों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, सिक्किम में धारा, तो उत्तराखण्ड में जलस्रोत, बावली, तो हिमाचल में नौले, खात्री या छुरुहरा और मेघालय में जलकुण्ड और सतपुड़ा इलाक़े में झरने।

प्रतिभा की तबियत ख़राब होने से उन्हें नूरा अस्पताल में दिखाना पड़ा। दो घंटे इलाज करने में व्यतीत हुए। तीन बजे हाउसवोट पहुँचे। चीयरफ़ुल चार्ली नामक हाउसवोट में पहुँचे। हाउसवोट मालिक को बुकिंग लेकर कुछ कठिनाई थी। उसने दो-तीन लोगों को फ़ोन घुमाया तब जाकर वोट में कमरा मिला। यहाँ से किनारे का नजारा बेहद खूबसूरत है। शिकारे बहते नज़र आ रहे हैं। आज बक़रीद की छुट्टी होने से सभी शिकारे काम पर लगे हैं। असलम भाई डाँगोला की मिशन कश्मीर हाउसवोट में एक रात का आशियाना है। उन्होंने बताया कि यदि आप सात दिनों के लिए कश्मीर आते हैं तो आपको सिर्फ़ 40,000/- रुपयों में यहाँ रहना, खाना, टैक्सी उपलब्ध रहेगी। उनका मोबाईल नम्बर 9419065385 है। हाउसवोट में सामने बैठे हैं। यहाँ से सामने शंकराचार्य पहाड़ी और बाजू में जबरवन पहाड़ी दिख रही है। शाम हो रही है। अब शिकारों की भीड़ बढ़ती जा रही है। शिकारों में शराब, चिकन टिक्का, पनीर टिक्का और दूसरी चीजें मिल रही हैं।

हाउसबोट एक तरह की लग्जरी में तब्दील हो चुके हैं। कुछ लोग दूर-दूर से केवल हाउसबोट में रहने का लुत्फ उठाने के लिए ही कश्मीर आते हैं। हाउसबोट में ठहरना सचमुच अपने आपमें एक अनोखा अनुभव है। परंतु वास्तव में इसकी शुरुआत लग्जरी नहीं, बल्कि मजबूरी में हुई थी। कश्मीर में हाउसबोट का प्रचलन डोगरा राजाओं के काल में तब शुरू हुआ था, जब उन्होंने किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कश्मीर में स्थायी संपत्ति खरीदने और घर बनाने पर क़ानूनी प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय कई अंग्रेजों और अन्य आसामियों ने बडी नाव पर लकडी के केबिन बना कर यहां रहना शुरू कर दिया। फिर तो डल झील, नागिन झील और झेलम पर हाउसबोट में रहने का चलन हो गया। बाद में उनकी देखादेखी स्थानीय लोग भी हाउसबोट में रहने लगे। आज भी झेलम नदी पर स्थानीय लोगों के हाउसबोट तैरते देखे जा सकते हैं। शुरुआती दौर में बने हाउसबोट बहुत छोटे होते थे, उनमें इतनी सुविधाएं भी नहीं थीं, लेकिन अब वे लग्जरी रूप ले चुके हैं। सभी सुविधाओं से लैस आधुनिक हाउसबोट किसी छोटे होटल के समान हैं। डबल बेड वाले कमरे, अटैच बाथ, वॉर्डरोब, टीवी, डाइनिंग हॉल, खुली डैक आदि सब पानी पर खडे हाउसबोट में है। लकडी के बने हाउसबोट देखने में भी बेहद सुंदर लगते हैं। अपने आकार एवं सुविधाओं के आधार पर ये विभिन्न दर्जे के होते हैं। शहर के मध्य बहती झेलम नदी पर बने पुराने लकडी के पुल भी पर्यटकों के लिए एक आकर्षण है। कई मस्जिदें और अन्य भवन झेलम नदी के निकट ही स्थित है।

हमारे पैकेज में डल झील में एक घंटे का शिकारा सफ़र तय था लेकिन आज शिकारों पर भारी भीड़ होने से सात बजे शिकारा आया। पानी की बोतल में स्कॉच के दो पेग भरकर एक घंटा शिकारा सैर से डल झील का भरपूर मज़ा लिया। चारों तरफ़ पहाड़ों पर हरियाली का आलम था। गवर्नर हाउस, शंकराचार्य पहाड़ी और मुग़ल क़ालीन क़िला ढलते सूरज की मद्धिम रोशनी में सुहाने लग रहे थे। जी भरकर फ़ोटो उतारीं। कश्मीर की डल झील को मन भरकर जी लिया।

हाऊसबोट पर तीन कश्मीरी थे। उनसे बातें होती रहीं। उन्होंने बताया कि पहाड़ों की चट्टानों और भूमि में स्थित जल ही चश्मों में फूटता है। चश्मे अक्सर ऐसे क्षेत्रों में प्राकृतिक होते हैं जहाँ धरती में दरारें और रिसाव हो, जिनमें बारिश का पानी प्रवेश कर जाये। फिर यह पानी जमीन के अन्दर ही प्राकृतिक नालियों और गुफ़ाओं में घूमता हुआ किसी और जगह से चश्मे के रूप में उभर आता है।

कश्मीर के गाँवों में अभी भी चश्में ही पानी का मुख्य स्रोत हैं। कश्मीर के गाँवों में ज़मीनी खेती ही रोजी-रोटी का एक बड़ा सहारा है। ज्यादा ऊँचाई वाले इलाकों में खासकर चश्में ही पानी और सिंचाई के स्रोत थे। उपेक्षा और नए ‘विज्ञानियों के नजर में अनुपयोगी’ चश्मों को लोग भूलते गए। कई प्राकृतिक चश्में सालों पहले बन्द हो गए या कर दिए गए। लोगों ने उनके आस-पास और उनके ऊपर घर बना लिये। लोग भूल गए कि कभी यहाँ कोई चश्मा भी था। पिछले साल जब ज्यादा बारिश हुई तो उनके घर के नीचे से कमरों में पानी आने लगा। तब याद आया कि वे किसी पानी की ‘जगह’ पर बैठे हुए हैं। उन्होंने पानी का आशियाना हथिया लिया है।

चश्में हालांकि बहुत ज्यादा पानी नहीं देते, पर चश्में आज भी कश्मीरी गाँवों में पीने के पानी के सबसे बड़े स्रोत हैं। हाँ! सिंचाई के लिये जरूर चश्मों से थोड़ा आगे बढ़कर 8वीं शताब्दी में कश्मीर के शासक ललितादित्य ने ऊँचे पठारों तक पानी पहुँचाने के लिये एक नए यंत्र का इस्तेमाल कराना शुरू किया था जिसका नाम था ढेंकी। इसमें किसान को एक बड़े खम्बे का इस्तेमाल करना था। जिसके मुँह पर पानी के लिये बाल्टीनुमा पात्र बँधा होता था। अपने पैरों से सन्तुलन बनाते हुए उसे पानी के कुएँ या किसी जलधारा से खींचना होता था। यह सारा काम मानवीय ऊर्जा से होता था, तब तक सब ठीक ही रहा। भूजल में कोई खास दिक्कत नहीं थी। पर पम्पिंग मशीनों ने दृश्य बदल दिया। भूजल की गिरावट ने चश्मों को सुखाना शुरू कर दिया है। अब तो कश्मीरी सिंचाई का वर्तमान तरीक़ा धीरे-धीरे ‘डीपवेल’ और ‘लिफ्ट इरिगेशन’ की तरफ जा चुका है। स्थान विशेष की योजना वहाँ की ज़मीनी हकीक़त से ही बनाई जानी चाहिए। हर कीमत पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसकी गहराई में वहाँ की संस्कृति, भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियाँ सभी कुछ शामिल होती हैं। विकासवादी गतिविधियों और गलत निर्णयों के चलते चश्में खत्म होते जा रहे हैं।

पहले इस इलाके में भरपूर जंगल थे, जो चश्मों के पुनर्भरण में मददगार होते थे, लेकिन धीरे-धीरे जंगल कम हुए और चश्मों में जलापूर्ति कम होती गई। साथ ही पुनर्भरण क्षेत्रों में बिना समझे-बूझे पक्के निर्माण चश्मों की जल-भण्डारण क्षमता को घटा रहे हैं। कश्मीरी पहाड़ जो खुद ही ‘वाटर टैंक’ थे, उनको सुखा के सरकारों का जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग टैंकों और टैंकरों से पीने का पानी मुहैया करवाने की कोशिश कर रहा है। श्रीनगर और कुछ नगरों के नागरिकों को तो यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी, और होती रहेगी पर गाँवों को कौन पूछेगा। उनको तो अपने प्राकृतिक और टिकाऊ पानी के टैंक ‘चश्मों’ को ही ठीक-ठाक रखना होगा।

फिर विचार आया कि कश्मीरियत क्या है? “आज़ादी-आज़ादी, हम माँगते आज़ादी” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे” नारे लगाने वाले कोई मिले नहीं। एक भले से दिखते पढ़े लिखे कश्मीरी से बातचीत कश्मीरियत को कुछ इस तरह बयाँ करती है।

इस्लाम आने के बाद सूफी संतों का दर्शन यहां की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। मध्ययुग में मुस्लिम आक्रान्ता सिकंदर बुतशिकन कश्मीर पर क़ाबिज़ हो गये। कुछ भले शाह ज़ैन-उल-आबदीन जैसे मुसलमान हिन्दुओं से अच्छा व्यवहार करते थे पर सुल्तान सिकन्दर बुतशिकन जैसों ने यहाँ के मूल कश्मीरी हिन्दुओं को मुसलमान बनने या राज्य छोड़कर जाने या मरने पर मजबूर कर दिया। कुछ ही सदियों में कश्मीर घाटी मुस्लिम बहुल हो गई। चौदहवीं शताब्दी में यहां मुस्लिम शासन आरंभ हुआ। उसी काल में फारस से सूफी संतों के रूप में इस्लाम का भी आगमन हुआ। यहां पर ऋषि परम्परा, त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम का संगम मिलता है, जो कश्मीरियत का सार है।

यहाँ की सूफ़ी-परम्परा बहुत विख्यात है, जो कश्मीरी इस्लाम को परम्परागत शिया और सुन्नी इस्लाम से थोड़ा अलग और हिन्दुओं के प्रति सहिष्णु बनाती है। यह हमने भी महसूस किया। सभी कश्मीरियों को आतंकी कह देना बहुत बड़ी नादानी और सिरे से बेमानी है। जन्नत-ए-कश्मीर भारत छोड़ कर जाते अंग्रेजों, रुकते हिंदुओं और बँटते मुसलमानों के बीच एक राजनीतिक मोहरा बन गया था। अब चुनावी बिछात पर शकुनि पाँसा है। चुनाव के वक़्त मंदिर-मस्जिद, कश्मीर और आतंक एक साथ परोसे जाते हैं।

हमने कहा- लेकिन 370 का समापन भारतीय राष्ट्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। एक राष्ट्र, एक संविधान, राष्ट्रीय एकता और प्रभुसत्तावादी राज्य की अनिवार्यता होती है। आप क्या कहेंगे?

उन्होंने कहा- रियासत की परम्पराओं से मुक्त होना कठिन होता है। थोड़ा वक़्त लगेगा। कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीरी पंडित कहा जाता है और वो सभी ब्राह्मण माने जाते हैं। सभी कश्मीरियों को कश्मीर की संस्कृति, यानि कि कश्मीरियत पर बहुत नाज़ है। वादी-ए-कश्मीर अपने चिनार के पेड़ों, कश्मीरी सेब, केसर (ज़ाफ़रान, जिसे संस्कृत में काश्मीरम् भी कहा जाता है), पश्मीना ऊन और शॉलों पर की गयी कढ़ाई, गलीचों और देसी चाय (कहवा) के लिये दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ का सन्तूर भी बहुत प्रसिद्ध है। कश्मीरी व्यंजन भारत भर में बहुत ही लज़ीज़ माने जाते हैं। ज़्यादातर कश्मीरी पंडित मांस खाते हैं। कश्मीरी लोगों के मांसाहारी व्यंजन हैं, नेनी (बकरे के ग़ोश्त का) क़लिया, नेनी रोग़न जोश, नेनी यख़ियन (यख़नी), मच्छ (मछली), इत्यादि। कश्मीरी पंडितों के शाकाहारी व्यंजन हैं : चमनी क़लिया, वेथ चमन, दम ओलुव (आलू दम), राज़्मा गोआग्जी, चोएक वंगन (बैंगन), इत्यादि। कश्मीरी मुसलमानों के (मांसाहारी) व्यंजन में कई तरह के कबाब और कोफ़्ते, रिश्ताबा, गोश्ताबा, इत्यादि शामिल होते हैं। परम्परागत कश्मीरी दावत को वाज़वान कहा जाता है। कहते हैं कि हर कश्मीरी की ये ख़्वाहिश होती है कि ज़िन्दगी में कम से कम एक बार अपने दोस्तों के लिये वो वाज़वान परोसे।

हमने पूछा- यदि कश्मीरियत कश्मीरी पंडितों की खैर ख़्वाह है तो कश्मीरी पंडित कब लौटेंगे, अभी माहौल ठीक नहीं लगता।

उन्होंने कहा- आग ठंडी होने में वक़्त लगता है, जनाब।

इतने में गिलासों में कहवा पेय आ गया। चुस्कियों के बीच कश्मीरी खान-पान पर चर्चा निकल पड़ी। उन्होंने बताया- कश्मीर घाटी की प्रसिद्ध फसल चावल यहाँ के निवासियों का मुख्य भोजन है। मक्का, गेहूँ, जौ और जई भी अन्य फसलें हैं। इनके अतिरिक्त विभिन्न फल एवं सब्जियाँ यहाँ उगाई जाती हैं। अखरोट, बादाम, नाशपाती, सेब, केसर, तथा मधु आदि का प्रचुर मात्रा में निर्यात होता है। कश्मीर केसर की कृषि के लिए प्रसिद्ध है। शिवालिक तथा मरी क्षेत्र में कृषि कम होती है। दून क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर अच्छी कृषि होती है। जनवरी और फरवरी में कोई कृषि कार्य नहीं होता। यहाँ  झीलों का बड़ा महत्व है। उनसे मछली, हरी खाद, सिंघाड़े, कमल एवं मृणाल तथा तैरते हुए बगीचों से सब्जियाँ उपलब्ध होती हैं। कश्मीर की मदिरा मुगल बादशाह बाबर तथा जहाँगीर को बड़ी प्रिय थी किंतु अब उसकी इतनी प्रसिद्धि नहीं रही। कृषि के अतिरिक्त, रेशम के कीड़े तथा भेड़ बकरी पालने का कार्य भी यहाँ पर होता है।

कश्मीर राज्य में प्रचुर खनिज साधन हैं किंतु अधिकांश अविकसित हैं। कोयला, जस्ता, ताँबा, सीसा, बाक्साइट, सज्जी, चूना पत्थर, खड़िया मिट्टी, स्लेट, चीनी मिट्टी, अदह (ऐसबेस्टस) आदि तथा बहुमूल्य पदार्थों में सोना, नीलम आदि यहाँ के प्रमुख खनिज हैं।

श्रीनगर का प्रमुख उद्योग कश्मीरी शाल की बुनाई है जो मुग़लों के समय ठीक से विकसित हुई थी और तभी से ही चली आ रही है। कश्मीरी कालीन भी प्रसिद्ध औद्योगिक उत्पादन है, किंतु आजकल रेशम उद्योग सर्वप्रमुख प्रगतिशील धंधा हो गया है। चाँदी का काम, लकड़ी की नक्काशी तथा पाप्ये-माशे यहाँ के प्रमुख उद्योग हैं। कश्मीर का प्रमुख धंधा पर्यटन  है जिससे राज्य को और स्थानीय निवासियों को बड़ी आय प्राप्त होती है। लगभग एक दर्जन औद्योगिक संस्थान स्थापित हुए हैं परंतु प्रचुर औद्योगिक क्षमता के होते हुए भी बड़े उद्योगों का विकास अभी तक नहीं हो पाया है। मुख्य नदियाँ सिन्धु, झेलम और चेनाब हैं। यहाँ कई ख़ूबसूरत झीलें हैं जैसे: डल, वुलर और नगीन।

उनसे विदाई लेकर हम हरि पर्वत किला की सैर को निकल गये। श्रीनगर के डल झील के पश्चिम में हरि पर्वत किला स्थित है। अता मोहम्मद खान ने किले का निर्माण कराया। हरि पर्वत को कोह-ए-मारन के नाम से भी जाना जाता है। यह किला श्रीनगर की डल झील के पश्चिम में स्थित है। जिला प्रशासन के मुताबिक इस किले का निर्माण 18वीं सदी में अफगान गवर्नर अता मोहम्मद खान ने कराया। बाद में 1590 में बादशाह अकबर ने किले में एक लंबी दीवार का निर्माण कराया। इस किले से डल झील की खूबसूरती देखते बनती है। किले की देख-रेख एवं रखरखाव भारतीय पुरातत्व विभाग करता है। हरि पर्वत किले के प्राचीन खंभे इसके सौंदर्य को और बढ़ाते हैं। यहां से मखदूम साहिब की दरगाह भी अच्छी तरह दिखती है। ऊंचाई पर स्थित होने के नाते यह किला श्रीनगर के सभी इलाके से नजर आता है। इस पर्वत की पश्चिमी ढलान पर भगवती पार्वती का मंदिर है। इस किले पर आने के लिए पर्यटकों को पुरातत्व विभाग से अनुमति लेनी होती है।

11 जुलाई 2022 को अब कश्मीर से बिदाई लेने का वक़्त आ गया है। सुबह आठ बजे श्रीनगर से अमृतसर फ़्लाइट है। शिकारे में सोए थे, नींद अच्छी आई और समय पर खुल भी गई। जब तक भूख और नींद ज़िंदा है, तब तक सब ठीक समझना चाहिए। आठ बजे फ़्लाइट पकड़ने के लिए पाँच बजे निकलना पड़ा। श्रीनगर विमानतल पर सघन चौकसी और सूक्ष्म जाँच परीक्षण से गुजरना पड़ा। गो-एयर की सेवा का स्तर ठीक नहीं है। हमेशा अफ़रातफ़री में काम होता है। विमान श्रीनगर से अमृतसर-दिल्ली होकर मुंबई जाना था। श्रीनगर से अमृतसर की सवारियाँ बहुत थीं। लगभग पूरा विमान ख़ाली हो गया। जबसे कश्मीर से धारा 370 हटी है। तब से पंजाब के सिक्ख कश्मीर में प्रॉपर्टी ख़रीदने लगे हैं। उन्होंने बताया अभी सस्ती मिल रही हैं। भविष्य में निजी क्षेत्र के अस्पताल और कारोबारी आएँगे तब महंगाई चरम पर पहुँचेगी। उस समय बेंच कर कमाई कर लेंगे। आज धर्मशाला के लिए टैक्सी से निकलना है। अमृतसर में विमान के उतरने के पहले ही अमृतसर के टैक्सी चालक का फ़ोन आ गया। संदीप सिंह टैक्सी नम्बर PB 01 B 4742 लेकर गेट पर खड़े मिले। उन्हें सीधा धर्मशाला जाना था। हमारे कहने पर स्वर्ण मंदिर दर्शन करने का कार्यक्रम बन गया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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