श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग- २१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

अमृतसर पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र शहर माना जाता है। सिक्खों का सबसे बड़ा गुरूद्वारा स्वर्ण मंदिर अमृतसर में है। ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा पर्यटक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को ही देखने आते हैं। स्वर्ण मंदिर अमृतसर का दिल माना जाता है। अमृतसर का इतिहास गौरवमयी है। यह अपनी संस्कृति और लड़ाइयों के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है। अमृतसर अनेक त्रासदियों और दर्दनाक घटनाओं का गवाह रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नरसंहार अमृतसर के जलियांवाला बाग में ही हुआ था। इसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच जो बंटवारा हुआ उस समय भी अमृतसर में बड़े स्तर पर हत्याकांड हुआ। यही नहीं अफगान और मुगल शासकों ने इसके ऊपर अनेक आक्रमण किए और इसको कई बार बर्बाद किया। इसके बावजूद सिक्खों ने अपने दृढ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से इसे हर बार बसाया। हालांकि अमृतसर में समय के साथ काफी बदलाव आए हैं लेकिन आज भी अमृतसर की गरिमा बरकरार है।

स्वर्ण मंदिर अमृतसर का सबसे बड़ा आकर्षण है। इसका पूरा नाम हरमंदिर साहब है लेकिन यह स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों पर्यटक आते हैं। अमृतसर का नाम उस तालाब के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरू रामदास ने अपने हाथों से कराया था। यह गुरू रामदास का डेरा हुआ करता था। अकबर ने गुरु रामदास को उस ज़मीन का पट्टा दिया था, जिस पर स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ है।

हमने टैक्सी नियत पार्किंग में खड़ी कर दी। जूतों की उतराई-पहनाई और रखने-उठाने की मुश्किल से बचने के लिए, जूते वाहन में ही छोड़ दिए। पार्किंग से मंदिर प्रांगण तक़रीबन डेढ़-दो किलोमीटर रहा होगा। धूप तेज होने से पाँव जलने लगे। बाज़ार के बीच से होकर रास्ता था। छाया देखकर ठंडी जगह पर पैर रख कर चलते रहे। दुकानों पर लस्सी और सिकंजी की बहार थी। अधिकतर दुकाने कपड़ों की और कुछ जूते-चप्पल की दुकाने भी थीं। आधा घंटा में मंदिर परिसर पहुँच गये। परिसर में चोकोर परकोटा है। बीच में स्वर्णमंदिर चमचमाता नज़र आ रहा है। जिसकी प्रतिच्छाया सरोवर में झिलमिला रही है। मंदिर के दाहिने और बाएँ तरफ़ से परकोटा में प्रवेश द्वार हैं। हम बाएँ दरवाज़े से अंदर घुसे। हरमंदिर साहब का इतिहास याद आने लगा।

गुरुनानक, गुरु अंगददेव और गुरु अमरदास के बाद चौथे सिख गुरु रामदास ने अमृतसर में दरबार साहिब के नाम से मशहूर मंदिर बनाने की  शुरुआत 1577 में की थी और पांचवें गुरु अर्जन ने मंदिर की स्थापना का कार्य पूरा किया था। मंदिर को पूरा करने में आठ साल लगे थे। इसके निर्माण के बाद गुरु अर्जन ने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को स्थापित किया था। आदि ग्रंथ, सिखों द्वारा दस मानव गुरुओं के वंश के बाद अंतिम, संप्रभु और अनंत जीवित गुरु का रूप माना जाता है। इसमें 1,430 पृष्ठ हैं, जिनमें से अधिकांश को 31 रागों में विभाजित किया गया है।

सिखों और मुस्लिमों के बीच लंबे समय से चले विवाद से 1762 में मंदिर ध्वस्त हो गया था। 1776 में एक नया मुख्य प्रवेश द्वार, मार्ग और गर्भगृह का निर्माण पूरा हुआ, जबकि सरोवर  के चारों ओर पूल का काम 1784 में समाप्त हो गया।

रणजीत सिंह ने घोषणा की कि वह संगमरमर और सोने के साथ इसका पुनर्निर्माण करेंगे। मंदिर को 1809 में संगमरमर और मिश्रित सोना-तांबे में पुनर्निर्मित किया था, और 1830 में रणजीत सिंह ने सोने की पर्त के साथ गर्भगृह को सुसज्जित करने के लिए सोना दान किया।

मंदिर में अकाल तख्त भी मौजूद है जो ‘छठे गुरु का सिंहासन कहा जाता है। छठे गुरु हरगोबिंद द्वारा इसे बनवाया गया था। यह सिखों के लिए सत्ता के  पांच तख़्तों में से एक है। अकाल तख्त राजनीतिक संप्रभुता का प्रतीक है और ऐसी जगह है जहां सिख लोगों के आध्यात्मिक और लौकिक सरोकारों को संबोधित किया जाता है। हरमंदिर साहब में पूरे दिन गुरुबानी की स्वर लहरियां गुंजती रहती हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का स्मारक लगा हुआ है। यह पत्थर जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगा हुआ है।

सिक्ख गुरूग्रंथ साहिब में आस्था रखते हैं। उनके लिए गुरू ही सब कुछ हैं। स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सीढ़ियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं। सीढ़ियों के साथ-साथ स्वर्णमंदिर से जुडी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है। स्वर्ण मंदिर बहुत ही खूबसूरत है। इसमें रोशनी की सुन्दर व्यवस्था की गई है। सिक्खों के अलावा भी बहुत से श्रद्धालु यहां आते हैं। उनकी स्वर्ण मंदिर और सिक्ख धर्म में अटूट आस्था है। हमने परकोटा से मंदिर की परिक्रमा करके लंगर में प्रसादी ग्रहण की और परिसर से वापस निकले।  

अमृतसर एक भयानक जलियांवाला बाग हत्याकांड का गवाह रहा है। 13 अप्रैल 1919 को इस बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा को बीच में ही रोकने के लिए जनरल डायर ने बाग के एकमात्र रास्ते को अपने सैनिकों के साथ घेर लिया और भीड़ पर अंधाधुंध गोली बारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं समेत लगभग 300 लोगों की जान गई और 1000 से ज्यादा घायल हुए। यह घटना को इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड इतना भयंकर था कि उस बाग में स्थित कुआं शवों से पूरा भर गया था। अब इसे एक सुन्दर पार्क में बदल दिया है और इसमें एक संग्राहलय का निर्माण भी कर दिया है। इसकी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी जलियांवाला बाग ट्रस्ट की है। यहां पर सुन्दर पेड लगाए गए हैं और बाड़ बनाई गई है। इसमें दो स्मारक भी बनाए गए हैं। जिसमें एक स्मारक रोती हुई मूर्ति का है और दूसरा स्मारक अमर ज्योति है।

बारह बजे अमृतसर से पठानकोट होते हुए धर्मशाला के लिए रवानगी डाली। पंजाब की उर्वरा ज़मीन पर बासमती चावल की खेती लहरा रही है। सफ़ेद बगुले कुलाँचे भरते मटरगश्ती में संलग्न हैं। अमृतसर से पठानकोट तक छै लेन की मज़बूत सड़क बन गई है। सबसे पहले बटाला आया। बटाला पंजाब राज्य के गुरदासपुर ज़िले का एक शहर है। बटाला एक मुख्य औद्योगिक केन्द्र है और पंजाब के महत्वपूर्ण माझा सांस्कृतिक क्षेत्र का एक केन्द्रबिन्दु माना जाता है। फिर धारीवाल आया। धारीवाल गुरदासपुर जिले में पंजाब का 5 वां सबसे बड़ा शहर और अपनी ऊनी मिल के लिए सबसे प्रसिद्ध है। यह शहर अपर बारी दूबा नदी के तट पर स्थित है जो व्यास नदी में मिलती है। वहाँ से गुरदासपुर 13 किमी दूर है।  

गुरदासपुर की स्थापना 17वीं शताब्दी की शुरुआत में पनियार गांव के एक ब्राह्मण गुरिया जी ने की थी। उन्होंने गुरदासपुर के लिए सांगी गोत्र के जाट समुदाय से जमीन खरीदी थी। उन्ही के नाम पर गुरदासपुर नाम पड़ा। गुरिया जी के दो पुत्र थे-नवल राय और पाला जी। नवल राय के वंशज गुरदासपुर में बस गए। गुरु नानक देव की पत्नी का मायका गुरदासपुर में था।

भारत के विभाजन से पहले, गुरदासपुर जिले का भविष्य लंबे समय तक तय नहीं किया गया, क्योंकि यह मुसलमान बहुल था। सीमा सीमांकन समिति द्वारा प्रारंभिक योजना पठानकोट (उस समय गुरदासपुर जिले का हिस्सा) को पाकिस्तान और शकरगढ़ को भारत में रखने की बात थी। हालांकि, बाद में निर्णय की बारीक ट्यूनिंग के रूप में इसके विपरीत किया गया। यानी शकरगढ़ पाकिस्तान को दिया गया था और गुरदासपुर जिला (पठानकोट के साथ) भारत को दिया गया। गुरदासपुर ब्यास और रावी नदियों के बीच एक शहर है। इसमें गुरदासपुर जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है, जो पाकिस्तान के साथ सीमा साझा करता है।

अंत में, रैडक्लिफ अवार्ड के तहत, केवल एक तहसील शकरगढ़- को पाकिस्तान में स्थानांतरित कर दिया गया, और शेष जिला भारत के साथ रख दिया। गुरदासपुर जिले से कई मुसलमान पाकिस्तान चले गए; सिख और हिंदू सीमा पार कर भारत आ गए। भारी मात्रा में हिंसक वारदातें हुईं। गुरदासपुर भारत को देने का दबाव नेहरू-पटेल का था। पाकिस्तान को भरोसा था कि मुस्लिम बहुल होने से और सीमा पर होने से गुरदासपुर उन्हें मिलेगा तो जम्मू-कश्मीर भारत से पूरी तरह कट जाएगा। वह उसे अधिग्रहण कर लेगा। जब पाकिस्तान ने देखा कि गुरदासपुर उन्हें पूरा नहीं मिला तो उन्होंने कश्मीर में क़बायली हमला शुरू करवा दिए। गुरदासपुर ज़िले में गुरुद्वारा दरबार साहिब, करतारपुर – सबसे प्रसिद्ध सिख गुरुद्वारों में से एक, जहाँ सिख गुरु नानक देव ने अपने अंतिम दिन बिताए थे।

धारीवाल के बाद पठानकोट आया। पठानकोट ऐतिहासिक महत्व वाला एक प्राचीन शहर है। पठानकोट में पाए गए पुराने सिक्के यह सिद्ध करते हैं कि यह पंजाब के सबसे पुराने स्थलों में से एक है। यह हमेशा से बहुत महत्व का स्थान रहा होगा क्योंकि यह पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। पठानकोट हिमाचल में स्थित नूरपुर राज्य की राजधानी थी और अकबर के शासनकाल में इसका नाम बदलकर धमेरी (नूरपुर) कर दिया गया था। राजपूत के पठानिया कबीले ने अपना नाम पठानकोट से लिया है।

पठानकोट को कांगड़ा और डलहौजी की सुरम्य तलहटी में चक्की नदी पर स्थित होने के कारण जम्मू, कश्मीर, डलहौजी, चंबा, कांगड़ा, धर्मशाला, मैकलोडगंज, ज्वालाजी, चिंतपूर्णी और आगे हिमालय पहाड़ों में जाने से पहले एक विश्राम स्थल के रूप में उपयोग किया जाता है। पठानकोट जम्मू और कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के आस-पास के क्षेत्रों के लिए एक शिक्षा केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है। इन राज्यों के कई ग्रामीण छात्र शिक्षा के लिए पठानकोट आते हैं। पठानकोट में हल्का नाश्ता किया और गाढ़ी चाय पी। अब शिवालिक पहाड़ियाँ शुरू हो गईं। सबसे पहले काँगड़ा ज़िले का नूरपुर आया।

काँगड़ा क्षेत्र में ब्रिटिश राज के आगमन से पहले धर्मशाला और इसके आसपास के क्षेत्रों में दो सहस्राब्दियों तक कटोच राजवंश का शासन था। 1810 में सिख राजवंश के महाराज रणजीत सिंह और राजा संसार सिंह कटोच के मध्य हुई ज्वालामुखी की संधि के बाद कटोच केवल काँगड़ा क्षेत्र में स्थानीय जागीरदार रह गए। 1848 में अंग्रेज़ों ने कब्ज़ा कर लिया था। 1849 में कांगड़ा जिले के अंदर एक फौजी छावनी के लिए धौलाधार पर्वत की ढलानों पर एक स्थान को चुना गया, जहां एक हिन्दू धर्मशाला स्थित थी। ऐसी मान्यता है कि धर्मशाला नगर का नाम धर्मशाला शब्द से उत्पन्न हुआ है।

धर्मशाला वर्ष 1849 में कांगड़ा में स्थित सैन्य छावनी के रूप में अस्तित्व में आया। वर्ष 1855 में धर्मशाला को कांगड़ा जिले का मुख्यालय घोषित किया गया था। धर्मशाला में सिविलियन और छावनी क्षेत्र की बढ़ती चहल-पहल को देखते हुए, सुविधाएं लोगों को मुहैया करवाने के लिए नगर परिषद बनाने का विचार बना था। पांच मई 1867 को यहां नगर परिषद अस्तित्व में आई थी। उस समय बनी नगर परिषद की पहली बैठक भी 6 मई 1867 को तत्कालीन जिलाधीश एल्फिनस्टोन की अध्यक्षता में हुई थी।

धर्मशाला के 1867 में नगर परिषद बनने के बाद यहां सुविधाओं में इजाफा हुआ। 1896 में धर्मशाला में लोगों को बिजली भी मिलनी शुरू हुई थी। तत्पश्चात नगर में कार्यालयों के विकास के अतिरिक्त व्यापार व वाणिज्य, सार्वजनिक संस्थान, पर्यटन सुविधाओं तथा परिवहन गतिविधयों में भी उन्नति हई। वर्ष 1905 व 1986 के भूकम्पों से नगर का बहुत नुकसान हुआ। 1926 से 1948 के बीच यहां पर इंटर कॉलेज सहित महाविद्यालय खुला तो वर्ष 1935 में सिनेमा हाल भी यहां खुला। बढ़ते समय के साथ-साथ सामाजिक सुधारों के साथ संगीत, साहित्य और कला के क्षेत्र में भी यह क्षेत्र कहीं पीछे नहीं रहा। 1960 से महामहिम दलाई लामा का मुख्यालय भी धर्मशाला में स्थित है।

धर्मशाला राज्य की शीतकालीन राजधानी है। यह कांगड़ा नगर से 16 किमी की दूरी पर स्थित है। धर्मशाला के मैक्लॉडगंज उपनगर में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के मुख्यालय हैं, और इस कारण यह दलाई लामा का निवास स्थल तथा निर्वासित तिब्बती सरकार की राजधानी है। दो घंटे बौद्ध मंदिर में गुज़ारे। धर्मशाला को भारत सरकार के स्मार्ट सिटीज मिशन के अंतर्गत एक स्मार्ट नगर के रूप में विकसित होने वाले सौ भारतीय नगरों में से एक के रूप में भी चुना गया है।

12 जुलाई 2022 को पठानकोट से जम्मू के रास्ते पर पंजाब की जम्मू-कश्मीर सीमा पर करके कठुआ, बरनोटी, जसरोटा, छन्नी और सम्बा जो कि चिकन नेक बिंदु पर स्थित हैं, को पार करके जम्मू शहर में दाखिल हुए। जम्मू शहर ऐतिहासिक नगर है और पूर्व जम्मू प्रांत की राजधानी रह चुका है और बाद में भी भारत के जम्मू एवं कश्मीर राज्य की शीतकालीन राजधानी रह चुका है। राय जम्बुलोचन राजा बाहुलोचन का छोटा भाई था। बाहुलोचन ने तवी नदी के तट पर बाहु किला बनवाया था और जम्बुलोचन ने जम्बुपुरा नगर बसवाया था। नगर के नाम का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। जम्मू शहर से 32 किलोमीटर दूर अखनूर में पुरातात्त्विक खुदाई के बाद इस जम्मू नगर के हड़प्पा सभ्यता के एक भाग होने के साक्ष्य भी मिले हैं। जम्मू में मौर्य, कुशाण और गुप्त वंश काल के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। 480 ई. के बाद इस क्षेत्र पर एफ्थलाइटिस का अधिकार हो गया था और यहां कपीस और काबुल से भी शासन हुआ था। इनके उत्तराधिकारी कुशानो-हेफ्थालाइट वंश के थे, जिनका अधिकार 565 से 670 ई. तक रहा। तदोपरांत 670 ई. से लेकर 11वीं शताब्दी तक शाही राजवंश का राज रहा जिसे गजनी के अधीनस्थों ने छीन लिया। जम्मू का उल्लेख तैमूर के विजय अभियानों के अभिलेखों में भी मिलता है। इस क्षेत्र ने सिखों एवं मुगलों के आक्रमणों के साथ एक बार फिर से शक्ति-परिवर्तन देखा और अन्ततः ब्रिटिश राज का नियंत्रण हो गया। यहां 840 ई. से 1869 ई. तक देव वंश का शासन भी रहा था। तब नगर अन्य भारतीय नगरों से अलग-थलग पड़ गया और उनसे पिछड़ गया था। उसके उपरांत डोगरा शासक आये और जम्मू शहर को अपनी खोई हुई आभा व शान वापस मिली। उन्होंने यहां बड़े बड़े मन्दिरों व तीर्थों का निर्माण किया व पुराने स्थानों का जीर्णोद्धार करवाया, साथ ही कई शैक्षिक संस्थान भी बनवाये। उस काल में नगर ने काफ़ी उन्नति की। 1817 में 43 कि.मी लम्बी रेल लाइन द्वारा जम्मू को सियालकोट से जोड़ा गया था, किन्तु 1947 में भारत के विभाजन के बाद यह रेल लाइन बंद कर दी गयी क्योंकि सियालकोट से आवाजाही की कड़ी टूट गयी थी। उसके बाद जम्मू शहर में 1971 तक कोई रेल सेवा नहीं थी। तभी भारतीय रेल ने पठानकोट-जम्मू तवी ब्रॉड गेज रेल लाइन डाली और अन्ततः 1975 में एक बार फ़िरसे नये जम्मू-तवी रेलवे स्टेशन के साथ जम्मू शेष भारत से रेल द्वारा जुड़ गया। वर्ष 2,000 में पुराने रेलवे स्टेशन का अधिकांश भाग ध्वस्त कर वहां एक कला केन्द्र बनाया गया।

जम्मू में बहुत तेज गर्मी है। न धरती पर बारिश है और न आसमान में बादल दिख रहे हैं। तभी दूसरे चौराहे पर अमरनाथ यात्रियों के लिए संचालित भंडारे में भोजन किया। उसके बाद दस मिनट में जम्मू विमानतल पहुँच गये। इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड पर Go first की फ़्लाइट नम्बर G-196 दोपहर बाद तीन बजे का प्रस्थान प्रदर्शित हो रहा है।

इति वृतांत

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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