श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “क्रू मेंबर ट्रेनिंग”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५२ ☆
🌻लघु कथा🌻 ✈️ क्रू मेंबर ट्रेनिंग ✈️
विवाह का घर सैकड़ो काम और कुछ नहीं तो यहाँ से वहाँ भागना। गाँव का वातावरण भी अछूता नहीं रहा शहरों की हवा से और सोशल मीडिया की कृपा से।
ऐसे ही एक परिवार में शादी के दिन मेहंदी की रस्म निभाई जा रही है। सभी हँसते खिलखिलाते नाच गा रहे हैं। घर की सयानी वरिष्ठ महिलाएं जो कुछ अपने समय नहीं कर पाई वह भी शामिल थी, परंतु कुछ वरिष्टों को पसंद नहीं आ रहा था।
बहुत देर से एक सुंदर सी बिटिया पर निगाह टिकी थी दादी की। परंतु उसके हाव-भाव अच्छे नहीं लग रहे थे। पास जाकर पूछने लगी– किसकी बेटी हो?
केश लहराते डीजे की धुन पर नाचते वह बोली – – – दिल्ली में रहती हूँ।
फिर से पूछने लगी– क्या नौकरियाँ करती हो।
तपाक से उत्तर मिला क्रू मेंबर की ट्रेनिंग कर रही हूँ।
दादी को समझ नहीं आया। अपना सा मुँह लेकर बैठ गई, परंतु निगाह अभी भी वहीं पर जाकर टिकी थी।
शायद कुछ सोच रही थी। थोड़ी देर बाद उनका अपना पोता हँसते मुस्कुराते आया दादी को परेशान देख बोला – – कुछ चाहिए।
दादी ने बड़े भोलेपन से कहा– पहले बता गुरु मैदान। पोते ने कहा– अभी नहीं, थोड़ी देर में चलते हैं। अभी बैठो।
उसको लगा शायद बाहर जाने को कह रही है खुले मैदान में। एक किनारे ले जाकर हाथ पकड़ कर पोते से लड़की को दिखाते हुए बोली– गुरु मैदान क्या बहुत बड़ी नौकरियाँ होती है। पोते ने हँस कर कहा – – गुरु मैदान नहीं दादी क्रू मेंबर।
अरे हाँ वही दादी अम्मा ने कहा। दादी हवाई जहाज जो उड़ता है ना उस पर पानी, चाय, पेपर, दवाई, जरूरी सामान और सहायता करना। बस ये समझ लो तुम।
दादी ने कहा अब तू जा। अपनी जगह बैठ गई दादी फिर से चार लोगों से बता रही थी आजकल की बिटियाँ घर में गिलास नहीं उठाती, हवाई जहाज में चाय पानी नाश्ता देती है गुरु मैदान में। फैशन तो ऐसे करी है जाने कहूँ बड़ी नौकरी मिली है।
और उसके बाद जोरदार हँसी की आवाज। सभी पलट कर देखने लगे। जानते हो देती तो चाय पानी ही है। पोता सुन्न होकर दादी को देखता रहा क्रू मेंबर किसे कहते हैं।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





