डॉ. ऋचा शर्मा
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘रुख बदलना होगा‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५९ ☆
☆ लघुकथा – रुख बदलना होगा ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
अलसुबह चाय की चुस्कियों के साथ रेवा की शादी की बातें चल रही थीं। सासु जी बोलीं- “अरे बहू! यह बताओ रेवा की शादी में भात कौन देगा? तुम्हारे भाई तो है नहीं, दो बहनें ही हो।”
“अम्माँ! शादी में भात की रस्म भाई ही करता है क्या? ”- साधिका ने बड़े ही शांत भाव से पूछा।
“हाँ बहू! लड़की की माँ मिठाई, कपड़े, फल लेकर मायके अपने भाई को भात न्योतने जाती है। शादी में लड़की का मामा अपनी सामर्थ्य के अनुसार भात लेकर आता है, जिसमें बहन के परिवार के लिए कपड़े और लड़की के लिए साड़ी, गहने आदि होते हैं।”
“अम्माँ! तो मैं कल ही जाकर राधिका को भात न्योतकर आती हूँ। मेरी बेटी की शादी में उसकी मौसी भात लेकर आएगी।”
“बहू! अपने किसी ताऊ-चाचा के लड़के को कह दे भात देने को, मौसी को तो शादी में भात देते मैंने कभी नहीं देखा।”
“अब देख लेना अम्माँ!”- साधिका हँसते हुए बोली।
© डॉ. ऋचा शर्मा
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बहुत अच्छा विषय, सार्थक सृजन!