आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – ग़ज़लिका – किस्से।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६८ ☆
☆ ग़ज़लिका – किस्से ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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दग़ा कहानी, वफ़ा फ़साना, सनम हमारे यही हैं किस्से।
तुम्हें छिपाना, मुझे दिखाना, हुए दर-ब-दर, सही हैं किस्से।।
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न किस्सागोई, नई खोज है, यही विरासत हमें मिली है।
कहे ना कहे, कहे जा रहे, न जाने कितने, बने हैं किस्से।।
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डगर डगर पर, शहर शहर में, गढ़े-बढ़े जा रहे दिनों-दिन
मिला मसाले, भरे रिसाले, हुए चटपटे, कई हैं किस्से।।
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सियासती ही सियासती हैं, बयान इनके, बयान उनके।
न संसदों में, विधायिका में, जम्हूरियत के रहे हैं किस्से।।
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चुरा रहे हैं, निगाह खुद से, लुका-छिपी का मजा ले रहे।
कहीं हसीं हैं, कहीं जवां हैं, ठठा रहे सब सुना के किस्से।।
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कहे आइए, नहीं जाइए, दिखा जिहादी लवों को ठेंगा।
खड़े हों पैरों पे आप अपने, बनें हमसफर तभी न किस्से।।
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नहीं रहूँ मैं, नहीं रहो तुम, मगर सुनाएगा वक्त तब भी।
यहीं पले थे, फ़ना हुए जो, ‘सलिल‘ मियाँ के अनाम किस्से।।
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
१९.११.२०२५
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चलभाष: ९४२५१८३२४४ ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com
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