डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘होनी को टालने के टोटके‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२४ ☆
☆ व्यंग्य ☆ होनी को टालने के टोटके ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
कुछ समय पहले एक अखबार में मजे़दार खबर पढ़ी थी कि राजस्थान में हर साल करीब 200 नेता, अफसर, बिल्डर जेल का खाना खाते हैं। कारण यह बताया गया कि ज्योतिषी ने उनकी कुंडली में ‘कारागार योग’ या ‘जेल योग’ बताया था और कहा था कि जेल का खाना खाने से ‘जेल योग’ का संकट टल सकता है। यानी अगर वे जेल का खाना खा लेंगे तो ऊपर वाले के रिकॉर्ड में आगे संभावित सज़ा से बच जाएंगे। हमारे यहां इसे ‘अलफ़’ टालना कहते हैं। एक ज्योतिषी जी ने संवाददाता को बताया कि जेल का खाना खाने का टोटका 50% तक काम करता है।
एक विधायक प्रत्याशी ने अखबार के संवाददाता को बताया कि उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ कई प्रदर्शन किये हैं, इसलिए उन्हें भय है कि उन्हें किसी भी मामले में फंसा कर जेल में डाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि वे जेल से बाहर रहकर समाज की सेवा करना चाहते हैं, इसलिए ‘जेल योग’ टालने के लिए जेल का खाना खाते हैं।
कुछ लोग लोकलाज के कारण जेल में ही खाने के बजाय खाने को बंधवाकर घर ले जाते हैं। यह भी पढ़ने को मिला कि कुछ आईएएस अधिकारियों को ज़मानत नहीं मिल रही थी तो उनके ज्योतिषी ने उन्हें घर का खाना मंगाने के बजाय जेल का खाना खाने की सलाह दी थी। पता नहीं इस टोटके का कुछ असर हुआ या नहीं।
मुझे अपने छात्र जीवन की याद आती है जब एक बार हम चार पांच छात्र किसी मरीज़ को देखने अस्पताल गये थे। हम में से एक वहां की एक ‘बेड’ पर लंबा हो गया। पूछने पर भाई ने बताया कि वह अपनी ‘अलफ़’ टाल रहा था, यानी यदि उसकी किस्मत में ‘अस्पताल योग’ हो तो वह अभी खारिज हो जाए। आदमी अब इतना होशियार हो गया है कि उसने होनी को भी टालने के जुगाड़ ढूंढ़ लिये हैं।
गांव में जब हमें किसी ‘अशुभ’ दिन पर बाहर निकलने की ज़रूरत होती थी तो एक दिन पहले अपने किसी सामान को आगे वाले पड़ोसी के घर में रखा दिया जाता था। माना जाता था कि ‘प्रस्थान’ एक दिन पहले हो गया और अब यात्रा दूसरे दिन निर्विघ्न की जा सकती है।
मृत्यु के बाद के कर्मकांड में भी अब ‘शॉर्टकट’ ढूंढ़े जा रहे हैं। आज के आदमी को कर्मकांडों के हिसाब से चलने की फुरसत नहीं है। उसके लिए अपना काम और अपनी कमाई सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। इसलिए अब तेरहीं और ‘बरसी’ एक दिन के अंतर से निपटने लगी है, जब कि ‘बरसी’ एक बरस बाद होनी चाहिए। यह भी देखा कि मृतक की संतानें अग्निसंस्कार के बाद पंडित जी को बता देती हैं कि तेरहीं के लिए उनका आना संभव नहीं है, इसलिए जो कुछ भी करना है, तत्काल करा दीजिए। बेचारे पंडित जी भी अपनी जान बचाते हुए सुरक्षित रास्ता खोजते रहते हैं।
आज का आदमी नये और पुराने के बीच में झूलने के लिए अभिशप्त है। पुराने संस्कारों को छोड़ नहीं पाता, इसलिए उन्हें यथासंभव तोड़- मरोड़कर ज़िंदगी की गाड़ी को आगे ठेल रहा है।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





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धन्यवाद, बिष्ट जी।