डॉ राकेश ‘चक्र’
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
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आप “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८७ ☆
☆ बाल गीत – हो अपना मधुर व्यवहार… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆
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सहज, सरल जीवन बने
मानव कर उपकार।
मूल मंत्र मधुविद्या का
करें मधुर व्यवहार।।
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बिगड़े अपने काम बनेंगे
जीवन को हम महकाएँ ।
सत्यनिष्ठ, आचरण सुगंधित
फूलों – सा हम मुस्काएँ।
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मन पावन हो आचरण
बाँटें जग में प्यार।
मूल मंत्र मधुविद्या का
करें मधुर व्यवहार।।
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द्वेष, कपट सब मिट जाते हैं
मन निर्मल हो जाता है ।
सोच – समझकर मीठा बोलें
जटिल प्रश्न हल हो जाता है।।
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सदाचार का पाठ ही
है जीवन का सार।
मूल मंत्र मधुविद्या का
करें मधुर व्यवहार।।
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जो भी मधु – सा मीठा बोलें
अपना ही उपकार करें।
गन्ने का रस मीठा बनकर
तन – मन में संस्कार भरें।
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भोजन शाकाहार का
करें प्रचार – प्रसार।
मूल मंत्र मधुविद्या का
करें मधुर व्यवहार।।
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कोमल मन पहचान बनाए
मधुर नेह को उपजाता।
शौर्य पराक्रम स्वयं मिलेगा
मानव अंबर छू पाता।
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सदभावों, गुण, प्रेम से
खुद का हो उपकार।
मूल मंत्र मधुविद्या का
करें मधुर व्यवहार।।
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© डॉ राकेश चक्र
(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)
90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र. मो. 9456201857
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



