श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “बज रहे हम” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १३९ ☆ बज रहे हम ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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बाँसुरी के छेद
या साँसों का क्रम
बज रहे हैं हम।
एक टुकड़ा धूप
बस लाँघती देहरी
पेड़ से उतरी
डरती छाँव सी गहरी
रात वाले भेद
ले सपनों के भ्रम
जी रहे हैं हम।
दर्द के आधीन
तन और मन रहे हैं
एक करुणासिक्त
सब आराधन रहे हैं
समय के संकेत
नियति के हर नियम
भज रहे हैं हम।
आ लिखित से मौन
स्वाहा यज्ञ समिधाएँ
मूक से सब मंत्र
हुईं आहत ऋचाएँ
हो रहे आखेट
मरता नित्य ही श्रम
चुप रहे हैं हम।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




