श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “दूरियां…”`।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५८ ☆

☆ # “दूरियां…” # ☆

दिलों में अब कितनी दूरियां आ गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

कोई जीने के लिए संघर्ष कर रहा है

रोज जी रहा है मर रहा है

मजबूरी में कठिनाइयां

उसको भा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

रिश्ते तो अब तार-तार हो गए हैं

सबके अलग घर बार हो गए हैं

यह नई नीतियां है

जो रिश्तों को खा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

यहीं से विरोध में निकलती थी रेलियां

बुलंद आवाज में होती थी बोलियां

अब सब चुप है

जैसे वह सब कुछ पा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

यहां कुछ बोले तो क्या बोलें ?

सब खामोश है किससे बोलें ?

सवाल करना गुनाह है

हर वह आवाज कैद पा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

नदी नाले नहीं मिलते हैं समंदर में

कोई तूफान नहीं है उनके अंदर में

ज्वार -भाटे भी अब कहां उठते हैं

लहरों में शांति छा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

“श्याम” यह जिंदगी का आखिरी पहर है

जहां रहते हैं वह मुर्दों का शहर है

मसान की उड़ती हुई राख

कहर ढा़ गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

दिलों में दूरियां अब कितनी आ गई है

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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