श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग- २८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

नैनीताल

कालाढूँगी से नैनीताल की तरफ़ मुड़ने लगे तो वहाँ पुलिस ने बेरीकेड़ लगा कर मुस्तैद चौकसी कर रखी थी। वे कोरोना चेकिंग कर रहे थे। उन्हें टेस्ट रिपोर्ट बताई। फिर भी संतुष्ट नहीं हो रहे थे। परिचय पत्र के रूप में स्टेट बैंक के पहचान पत्र दिखाते ही अफ़सर ने कहा जाइए। यात्रा शुरू होते ही पहाड़ियों का घुमावदार रास्ता आरम्भ हो गया। जिम कार्बेट कभी इन्ही रास्तों से पैदल नैनीताल ज़ाया करते थे। इन्ही पहाड़ियों में उन्होंने आदमखोरों का पीछा किया था और कई बार तो आदमखोरों ने उनका पीछा किया था। शुरू में पहाड़ियाँ थोड़ी सपाट सी थीं लेकिन दस किलोमीटर चलने के बाद तीखी चढ़ाई आते ही चारों तरफ़ खूबसूरत नज़ारे दिखने लगे। शाम के धुँधलके में नैनीताल पहुँच गये।

स्टेट बैंक का गेस्ट हाऊस बहुत ऊँची पहाड़ी पर बहुत देर तक ढूँढने के बाद मिल तो गया। परंतु वहाँ का केयरटेकर बोला कि आपकी बुकिंग नहीं है। काफ़ी बहस मुबाहिसों के बाद कमरा हासिल कर लिया। बाहर निकल कर देखा तो नैनीताल को घेरकर अतीव प्राकृतिक सौदर्य बिखरा था। पूरा शहर नज़र आ रहा था। झील को घेरकर बनी सड़क पर आवागमन चिटियों की चलत रेखा सादृश्य दिख रहा था।

नैनीताल कुमायूँ इलाक़े का प्रमुख शहर और भारत का एक लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल है। राज्य का उच्च न्यायालय स्थित होने से यह उत्तराखंड की न्यायिक राजधानी है। कुमाऊं मंडल का मुख्यालय होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण ज़िला भी है। उत्तराखंड के राज्यपाल यहाँ राजभवन में रहते हैं। जबकि राजनीतिक राजधानी देहरादून है। नैनीताल संयुक्त प्रांत की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। नैनीताल बाहरी हिमालय की कुमाऊं तलहटी में राज्य की राजधानी देहरादून से 285 किमी की दूरी और नई दिल्ली से 345 किमी की दूरी पर स्थित है। यह शहर समुद्र तल से 6,358 फुट की ऊंचाई पर एक घाटी में स्थित है। जिसमें एक आंख के आकार की झील लगभग दो मील की परिधि में  पहाड़ों से घिरी हुई है, जिनमें से सबसे ऊंची नैना चोटी 8,579 फीट, उत्तर में देवपथ 7,999 फुट और पश्चिम में अयारपथ 7,474 फुट ऊंची चोटियों के शीर्ष से दक्षिण की ओर विशाल मैदान और उत्तर में बर्फीली श्रृंखला के साये में उलझी हुई लकीरों से पहाड़ी खेत के शानदार दृश्य हिमालय की केंद्रीय धुरी का निर्माण करती हैं। नैनीताल शहर का कुल क्षेत्रफल को 11.73 किमी है। झील की तलहटी झील के सबसे गहरे बिंदु, पाषाणदेवी के पास 85 मीटर की गहराई पर है। झील को विवर्तनिक रूप से बनाया गया माना जाता है। बलिया नाला, जो झील को भरने वाली मुख्य धारा है, और बाद की धाराएँ प्रमुख जोड़ों सहित 26 प्रमुख नाले झील  में मिलते हैं, जिसमें 3 बारहमासी नाले शामिल हैं।

पुराणों के अनुसार सती के शव के विभिन्न अंगों से बावन शक्तिपीठों का निर्माण हुआ था। इसके पीछे यह अंतर्कथा है कि दक्ष प्रजापति ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व’ नामक यज्ञ रचाया। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शंकर को नहीं बुलाया। शंकरजी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी यज्ञ में भाग लेने गईं। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को अपशब्द कहे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। भगवान शंकर के आदेश पर उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। भगवान शंकर ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए इधर-उधर घूमने लगे। तदनंतर सम्पूर्ण विश्व को प्रलय से बचाने के लिए जगत के पालनकर्त्ता भगवान विष्णु ने चक्र से सती के शरीर को काट दिया। तदनंतर वे टुकड़े 52 जगहों पर गिरे। वे 52 स्थान शक्तिपीठ कहलाए। सती ने दूसरे जन्म में हिमालयपुत्री पार्वती के रूप में शंकर जी से विवाह किया। पौराणिक मान्यता है की सती के नैन यहाँ गिरने से नैना देवी का शक्ति पीठ स्थापित हुआ।

नैनीताल ऐतिहासिक रूप से कुमाऊं क्षेत्र का हिस्सा रहा है। 10वीं शताब्दी में कत्यूरी राजवंश के पतन के बाद, कुमाऊं कई छोटी रियासतों में विभाजित हो गया था, और नैनीताल के आसपास का क्षेत्र एक खासिया परिवार की विभिन्न शाखाओं के अधीन था। कत्यूरियों के बाद कुमाऊं पर समेकित प्रभुत्व हासिल करने वाला पहला राजवंश चंद था, लेकिन इसमें कई शताब्दियां लगीं और नैनीताल और इसके आसपास के क्षेत्र अवशोषित होने वाले अंतिम क्षेत्रों में से एक थे।

त्रिलोक चंद ने तेरहवीं शताब्दी में भीमताल में एक किला बनवाया था, लेकिन उस समय नैनीताल स्वयं चंद शासन के अधीन नहीं था, और राज्य की पश्चिमी सीमा के पास स्थित था। उद्यान चंद के शासनकाल के दौरान, चंद राज्य की पश्चिमी सीमा कोशी और सुयाल नदियों तक फैली हुई थी, लेकिन रामगढ़ और कोटा अभी भी पूर्व खासिया शासन के अधीन थे। 1488 से 1503 तक शासन करने वाले कीरत चंद अंततः नैनीताल और आसपास के क्षेत्र पर अधिकार स्थापित करने में सक्षम हुए थे। खासिया प्रमुखों ने 1560 में अपनी स्वतंत्रता हासिल करने का प्रयास किया, जब उन्होंने रामगढ़ के एक खासिया के नेतृत्व में सफलता के एक संक्षिप्त क्षण का आनंद लिया, लेकिन बाद में बालो कल्याण चंद द्वारा निर्ममता से वश में कर लिया गया। अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में आपसी दुर्भावनाओं व राग-द्वेष के कारण चंद राजाओं की शक्ति बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन्‌ 1790 में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया।

कुमाऊं पर गोरखा शासन 24 वर्षों तक चला। इस अवधि के दौरान काली नदी को अल्मोड़ा के रास्ते श्रीनगर से जोड़ने वाली एक सड़क थी। गोरखा काल के दौरान अल्मोड़ा कुमाऊं का सबसे बड़ा शहर था, और अनुमान है कि इसमें लगभग 1000 घर थे।

कुमाऊँ की पहाड़ियाँ एंग्लो-नेपाली युद्ध (1814-16) के बाद ब्रिटिश शासन के अधीन आ गईं। नैनी ताल के हिल स्टेशन शहर की स्थापना  1841 में हुई थी, जिसमें शाहजहांपुर के एक चीनी व्यापारी पी. बैरोन द्वारा पहले यूरोपीय घर (पिलग्रिम लॉज) का निर्माण किया गया था। अपने संस्मरण में, उन्होंने लिखा: “यह अब तक का सबसे अच्छा स्थल है जिसे मैंने हिमालय में 2,400 किमी की यात्रा के दौरान देखा है।”

1846 में, जब बंगाल आर्टिलरी के एक कैप्टन मैडेन ने नैनी ताल का दौरा किया, तो उन्होंने दर्ज किया कि “बस्ती के अधिकांश हिस्सों में घर तेजी से उभर रहे थे: कुछ सैन्य रेंज के शिखर की ओर समुद्र तल से लगभग 7,500 फीट ऊपर थे। स्थानीय लोगों द्वारा इसका नामकरण ऊबड़-खाबड़ और जंगली आन्यारपट्टा आशीष (अन्यार-पट्ट – कुमाऊँनी में – पूर्ण अंधकार) किया था क्योंकि घने जंगलों के कारण यहाँ कम से कम सूर्य की किरणें पड़ती थीं। सेंट जॉन (1846) चर्च जंगल में सबसे शुरुआती इमारतों में से एक था। उसके बाद बेल्वेडियर, अल्मा लॉज, एशडेल कॉटेज (1860 ) बनीं। जल्द ही, यह शहर ब्रिटिश सैनिकों और औपनिवेशिक अधिकारियों और उनके परिवारों द्वारा मैदानी इलाकों की गर्मी से बचने की कोशिश करने वाला एक रिसॉर्ट बन गया। बाद में, यह शहर संयुक्त प्रांत के गवर्नर का ग्रीष्मकालीन निवास बन गया।

30 जुलाई 2021 को हमने एक पूरा दिन नैनीताल के दर्शनीय स्थलों के लिए रखा था। नैनीताल को भारत के लेक सिटी के रूप में भी जाना जाता है। कहा जाता है कि एक समय में नैनीताल जिले में 60 से अधिक झीलें थीं। चारों ओर सुंदरता बिखरी पड़ी है। सैर-सपाटे के लिए दर्जनों जगहें हैं, जहां पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। बर्फ से ढके पहाड़ों से घिरा यह स्थान झीलों से भरा हुआ है। नैनीताल हिमालय की कुमाऊँ पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है।

नैनी झील नैनीताल का सबसे प्रमुख आकर्षण है, जो हरी घाटियों से घिरा है। यात्री नौकायन (रोइंग), रोइंग, पैडलिंग (नौकायन) जैसी गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। यह झील काफी लंबी है और इसके उत्तरी भाग को ‘मल्ली ताल’ कहा जाता है, जबकि दक्षिणी भाग को ‘तल्ली ताल’ कहा जाता है। यह एकमात्र झील है जिस पर एक पुल और एक डाकघर है।

मॉल रोड नैनीताल की एक प्रसिद्ध सड़क का नाम है, और हाल ही में इसे बदलकर ‘गोविंद बल्लभ पंत मार्ग’ कर दिया गया है। दुकानों और बाजारों के अलावा, कई बैंक और ट्रैवल एजेंसियां मॉल रोड पर उपलब्ध हैं। यह सड़क मल्लीताल को महाल्ली से जोड़ती है। एक अन्य पर्यटक आकर्षण ‘ठंडी सड़क’ है, जो नैनी झील के दूसरी ओर स्थित है। हम लोग एक नौका पर सवार होकर दो घंटे नैनीताल में नौकायन का आनंद लेते रहे। चारों तरफ़ पहाड़ों पर बादलों की अठखेलियाँ मस्त वातावरण रच रही थीं। मंद-मंद रिमझिम फुहारों ने वातावरण को और भी रोमांटिक बना दिया। झील की सैर के बाद चिड़िया घर की सैर को निकल गए।

नैनीताल में चिड़ियाघर 1984 में स्थापित किया गया था। यह नैनीताल बस स्टॉप से केवल एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह चिड़ियाघर विभिन्न जानवरों का घर है, जिनमें बंदर, साइबेरियाई बाघ, तेंदुए, भेड़िये, ताड़ के सिवेट बिल्लियाँ, रोज़ रिंग पैराकेट्स, सिल्वर तीतर, पहाड़ी लोमड़ी, सांभर, प्यारे और बार्क हिरण और हिमालयन काला भालू  भी शामिल है। चिड़ियाघर सोमवार और सभी राष्ट्रीय छुट्टियों पर बंद है।

नैनीताल की सात चोटियों में 2611 मीटर ऊंची नैनी चोटी (चाइना पीक) सबसे ऊंची चोटी है। चाइना पीक की दूरी नैनीताल से लगभग 6 किलोमीटर है। इस चोटी से हिमालय की ऊँची चोटियाँ दिखाई देती हैं। नैनीताल झील और शहर के भव्य दृश्य भी हैं। फिर नीचे आकर टिफ़िन टॉप पर चढ़े। टिफिन टॉप एक सुंदर पिकनिक स्थल है, जिसे ‘डोरोथी की सीट’ के रूप में भी जाना जाता है। अयारपट्टा चोटी पर स्थित यह स्थान समुद्र तल से 7520 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यात्री यहाँ से ग्रामीण परिदृश्य के साथ शक्तिशाली हिमालय पर्वतमाला के प्रभावशाली दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। इस स्थान का विकास डोरोथी शैले (एक अंग्रेजी कलाकार) के पति द्वारा विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद किया गया था। नैनीताल टाउन से 4 किमी दूर स्थित, यह टिफिन टॉप प्रकृति की फोटोग्राफी के लिए एक आदर्श स्थान है।

अगली सुबह सेंट जॉन चर्च इन वाइल्डरनेस गए जो मल्लीताल (नैनीताल के उत्तरी भाग) में स्थित  एक शांत जगह है। यह चर्च वर्ष 1844 में स्थापित किया गया था। अभिलेखों के अनुसार, कोलकाता के बिशप, डैनियल विल्सन, इस चर्च की आधारशिला स्थापित करने के लिए यहां आए थे, अपनी यात्रा के दौरान, वे बीमार हो गए और उन्हें पास के जंगल में एक अधूरे घर में रहना पड़ा।  इसलिए, चर्च को जंगल में सेंट जॉन के रूप में जाना जाने लगा। यह चर्च 1880 में भूस्खलन का शिकार हुए लोगों के एक स्मारक के रूप में भी काम करता है, जहाँ कांस्य पट्टिका में मारे गए लोगों के नाम लिखे हैं।

उसके बाद गुफा गार्डन गए। गुफा गार्डन को इको गुफा गार्डन के नाम से भी जाना जाता है। यह नैनीताल का एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है। यह उद्यान अपने आगंतुकों को पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली की एक झलक प्रदान करता है। छह भूमिगत पिंजरे हैं जो पेट्रोमैक्स लैंप द्वारा प्रकाशित किए जाते हैं और एक संगीत वाद्ययंत्र की ताल पर चलने वाला एक फव्वारा भी है जो पहली बार नैनीताल में स्थापित किया गया था। इन गुफाओं को टाइगर गुफा, पैंथर गुफा, चमगादड़ गुफा, गिलहरी गुफा, फ्लाइंग फॉक्स, एव और एप गुफा के रूप में जाना जाता है। इन गुफाओं को जोड़ने का मार्ग काफी संकीर्ण है, कभी-कभी यात्रियों को रेंगने की आवश्यकता होती है। ये सभी गुफाएँ प्राकृतिक हैं और स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रबंधित हैं।

नैनीताल के पास एक खुर्पाताल भी है। कॉटेज, फिशिंग फिटर (झोपड़ी) लोगों के लिए स्वर्ग है। यह नैनीताल से 10 किमी दूर स्थित है। यह खूबसूरत छोटा उपग्राम (खेरा) समुद्र तल से 1635 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देती है। खूबसूरत झील और आसपास के घर और होटल कई बार इस सुंदरता को बढ़ाते हैं। 19 वीं शताब्दी तक खुर्पाट लोहे के औजारों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन अब यह हरी सब्जियों के लिए प्रसिद्ध है।

तीसरे दिन सबसे पहले नैनीताल झील के किनारे पर स्थित नयना देवी के मंदिर पर देवी दर्शन किया। उसके ठीक बाजू में सिक्ख गुरुद्वारा में मत्था टेका। फिर नैनीताल झील में नाव की सवारी पर एक घंटा बिताता। इस झील में कई फ़िल्मों की शूटिंग हुई है। जिनमे कटी पतंग फ़िल्म का गाना “जिस गली में तेरा घर न हो बालमा” बहुत प्रसिद्ध है। झील से चारों तरफ़ के गगनचुंबी पर्वत शिखर अत्यंत मनोरम दृश्यावली बनाते हैं। उसके बाद रोपवे से नैनीताल शहर की ऊँची चोटी पर पहुँच कर पूरे शहर को देखा और फ़ोटो खींचे। फिर मॉल रोड पर दो घंटे मटरगश्ती करते रहे। इस प्रकार हमारा अंतिम पड़ाव पूरा हुआ।  

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments