श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८६ ☆
☆ वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
भीषण गर्मी जब अपने चरम पर होती है, तब केवल शरीर ही नहीं, मन और समाज भी तपने लगते हैं। आज हम एयर कंडीशनर और कूलर की ओर भागते हैं, लेकिन कभी ठहरकर सोचें—हमारे पूर्वजों ने इस तपती ऋतु के लिए क्या उपाय बनाए थे?
वैसाख मास की परंपराएँ इसी प्रश्न का सजीव उत्तर हैं। जलदान, सत्तू का दान और मौसमी फलों का वितरण—ये केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं थे, बल्कि एक सुविचारित सामाजिक और वैज्ञानिक व्यवस्था थी। गाँव-गाँव में मटके रखना, राहगीरों के लिए पानी की व्यवस्था करना—यह समाज को निर्जलीकरण और लू से बचाने का सामूहिक उपाय था।
सत्तू ( चने का चूर्ण) वास्तव में गर्मी के विरुद्ध शरीर का प्राकृतिक कवच है। यह ठंडक देता है, ऊर्जा बनाए रखता है और शरीर के संतुलन को बनाए रखता है। मौसमी फल—तरबूज, खीरा, आम—ये शरीर को जल और पोषण दोनों देते हैं। जब इन्हें दान के रूप में बाँटा जाता है, तो यह संदेश भी जाता है कि जो हमारे लिए उपयोगी है, वही समाज के लिए भी आवश्यक है।
इसी परंपरा का एक अत्यंत संवेदनशील और व्यापक रूप हमें जीव-जंतुओं के प्रति हमारे व्यवहार में दिखाई देता है। गाँवों, कस्बों और शहरों में बड़े-बड़े पात्र, नाद और टंकियाँ रखी जाती हैं, जिनमें पानी भरा जाता है ताकि पशु-पक्षी भी अपनी प्यास बुझा सकें। साल भर जिन पात्रों पर शायद ध्यान नहीं जाता, वे इस समय साफ किए जाते हैं, उनमें ताज़ा पानी भरा जाता है। यह केवल एक कार्य नहीं, बल्कि करुणा का विस्तार है।
दरअसल, जब इन कार्यों को धर्म और पुण्य से जोड़ा गया, तभी वे व्यापक रूप से समाज में स्वीकार्य हो पाए। यही कारण है कि हम न केवल स्वयं इनका पालन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। बचपन में जो दृश्य हमने सहज रूप से देखे—आज उन्हें करते हुए समझ में आता है कि यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक वैज्ञानिक और संवेदनशील व्यवस्था थी।
वैसाख हमें सिखाता है कि प्रकृति, समाज और समस्त जीवों के साथ संतुलन बनाकर ही हम इस भीषण गर्मी से लड़ सकते हैं। यही हमारे संस्कारों की सच्ची ठंडक है।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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