आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपके मुहावरेदार दोहे. 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 12 ☆ 

☆ मुहावरेदार दोहे☆ 

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पाँव जमकर बढ़ ‘सलिल’, तभी रहेगी खैर

पाँव फिसलते ही हँसे, वे जो पाले बैर

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बहुत बड़ा सौभाग्य है, होना भारी पाँव

बहुत बड़ा दुर्भाग्य है होना भारी पाँव

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पाँव पूजना भूलकर, फिकरे कसते लोग

पाँव तोड़ने से मिटे, मन की कालिख रोग

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पाँव गए जब शहर में, सर पर रही न छाँव

सूनी अमराई हुई, अश्रु बहाता गाँव

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जो पैरों पर खड़ा है, मन रहा है खैर

धरा न पैरों तले तो, अपने करते बैर

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सम्हल न पैरों-तले से, खिसके ‘सलिल’ जमीन

तीसमार खाँ हबी हुए, जमीं गँवाकर दीन

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टाँग अड़ाते ये रहे, दिया सियासत नाम

टाँग मारते वे रहे, दोनों है बदनाम

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टाँग फँसा हर काम में, पछताते हैं लोग

एक पूर्ण करते अगर, व्यर्थ न होता सोग

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बिन कारण लातें न सह, सर चढ़ती है धूल

लात मार पाषाण पर, आप कर रहे भूल

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चरण कमल कब रखे सके, हैं धरती पर पैर?

पैर पड़े जिसके वही, लतियाते कह गैर

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धूल बिमाई पैर का, नाता पक्का जान

चरण कमल की कब हुई, इनसे कह पहचान?

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©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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Shyam Khaparde
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सुंदर दोहे