श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिलाई मशीन”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ ☆
🌻लघु कथा🌻 सिलाई मशीन 🌻
पैरदान सिलाई मशीन पर बैठी सिलाई करते – करते अचानक अंजू रुक गई। तारिख— ओहहहहहहहहहहह आज तो उसका जन्मदिवस है। पूरे साठ बरस की हो गई। कितने सैकड़ों डिजाईनर कपड़े बनाकर देती रही। परन्तु आज भी उसने भाभी- बहु के उतरे साड़ी ब्लाउज पहन रखे हैं। क्योंकि उसने अपने वैवाहिक जीवन को चरक प्रेस करके मजबूत तो बनाया परन्तु समय के अनुसार चलन पर लटकन- झटकन, डोरी फुदरा सलमा सितारें नही टाँक सकी।
नतीजा आज वह मायके में भैया – भाभी के साथ पूरी जिंदगी बीता रही है। अचानक सुई ऊँगली पर चूभ गई, परन्तु आज यह चूभन उसे रुला नही रही थी बल्कि पुरानी बातों को याद दिला रही थी।
सिलाई मशीन बनना और सिलाई करने का मतलब वह आज समझ चुकी थीं पर समय बीत चुका था।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





