डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘शवयात्रा का इंतज़ाम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४२ ☆
☆ व्यंग्य ☆ शवयात्रा का इंतज़ाम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
भाई नटवरलाल 70 साल की उम्र तक राजनीति का आनन्द लेते रहे। तीन बार अंतरात्मा की पुकार पर दल बदले, लंबे समय तक मंत्री रहे, लेकिन अब कई साल से राजनीति के कबाड़खाने में थे। अब कोई पूछ-कदर नहीं थी, जानने वाले मुंह फेर कर निकल जाते थे।
भाई नटवरलाल जब मंत्री थे तब उनका बड़ा जलवा था। जहां भी वे भाषण देने जाते वहां भारी भीड़ जुटती। मेला लग जाता। दरअसल उस भीड़ का इंतज़ाम नटवरलाल खुद करते थे। पार्टी के कार्यकर्ताओं को कोटा बांध दिया जाता था कि कितने लोगों को हांक कर लाना है। रेट पांच सौ रुपये प्रति व्यक्ति और भोजन। बसें ज़बरदस्ती बुला ली जातीं। शिक्षकों को निर्देश देकर स्कूली बच्चों को लाकर कार्यक्रम में बैठा दिया जाता, जहां बैठे वे ऊंघते रहते। बदले में मिलता नाश्ते का पैकेट। कार्यक्रम का सारा खर्च पार्टी या समर्थकों पर मढ़ दिया जाता और भाई नटवरलाल राजनीति के सुख- सागर में गोते लगाते रहते।
लेकिन अब भाई नटवरलाल चिन्ताग्रस्त थे। चिन्ता यह थी कि जीते जी तो उन्होंने अपने कार्यक्रमों में खूब भीड़ जुटायी, लेकिन मरने के बाद उनकी शवयात्रा में भीड़ नहीं जुटी तो उनकी नाक कट जाएगी। ज़िन्दगी भर की कमाई एक पल में राख हो जाएगी। लोगों का कोई भरोसा नहीं, आदमी के पद से हटते ही उससे कन्नी काटने लगते हैं। अब उन्हें बीच-बीच में सपने में यमराज दिखने लगे थे, इसलिए चिन्ता और गहरी हो गयी थी।
परेशान, वे राजनीति के अपने बड़े भैया रौनक भाई के पास पहुंचे। उनसे अपनी आशंका बतायी, बोले, ‘दादा, डर लगता है कि मौत के बाद हम हीरो की जगह जीरो साबित न हो जाएं। ज़िंदगी भर अपने कार्यक्रमों में झूठी भीड़ खड़ी करते रहे। लगता है अब सारी लोकप्रियता की कलई खुल जाएगी। सोच सोच कर रात को नींद नहीं आती।’
रौनक भाई उनकी बात सुनकर हंसे, बोले, ‘क्या बात करते हो! अब ज़माना बदल गया है। ए आई का ज़माना है। अब ज़मीन पर भीड़ भले ही न जुटे, सोशल मीडिया में जितनी चाहो भीड़ दिख जाएगी। ज़मीन की भीड़ देखने कौन जाता है, सब घर में बैठे मीडिया की भीड़ देखते हैं। ईरान के अयातुल्लाह के जनाज़े में कितनी बड़ी भीड़ दिखी थी, उसे ज़मीन पर देखने तुम ईरान गये थे क्या? ‘बाहुबली’ फिल्म में जो शानदार नगर दिखाया गया था वह सब नकली, कंप्यूटर का कमाल था। ‘जुरासिक पार्क’ का ख़ूंख़्वार डायनासोर वास्तव में कहीं था ही नहीं, लेकिन उसे देखकर दर्शकों की हालत खराब हो गयी। तुम बिलकुल चिन्ता मत करो। हम तुम्हारी शवयात्रा में ऐसी भीड़ दिखाएंगे कि अयातुल्लाह के जनाज़े की भीड़ फीकी पड़ जाएगी।’
बड़े भैया से ऐसा आश्वस्तिदायक आश्वासन पाकर भाई नटवरलाल निश्चिंतता को प्राप्त हुए। विश्वास हो गया कि उनके स्वर्ग सिधारने के बाद भी उनकी नाक सलामत रहेगी।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





