श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “श्याम पट”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७२ ☆
🌻लघु कथा🌻 श्याम पट 🌻
गिरधारी लाल आज कमरे की दिवाल पर काले रंग का श्याम पट बनवा रहें हैं। दौड़ता हुआ पारस—- पास आकर
दादा जी ये क्या बना रहे?
(ब्लैक ब्लैक)
आज के बच्चे रंगों को रेड ब्लू, ग्रीन, यलो—से ही पहचानते हैं
धूमिल हो गई सिंदूरी रंग, भोर की लालिमा, गोधूली की बेला—
दादा जी ने बाल सुलभ चंचलता को आंकते कहा–यहाँ तुम लिखाई करोगे और एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनोगे। पारस गले में झूल गया मुझे तो आपके जैसा बनना है पापा तो दिनभर मोबाइल चलाते है क्या आपने उन्हें ये बोर्ड नही बनवाया था।
दादा ने कनकी लगा देखते फुसफुसा कर कहने लगे – – मोबाइल रिश्तों को काला करने लगा श्याम पट में आज भी वो ताकत है, जो परिवार जोड़ रखेगा।
देखते है श्याम पट पर पारस की छूअन कंचन बन कर कैसे निखरेगी। दादा श्याम पट को ध्यान से देखने लगे।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





