सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – ३‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # ३० ☆
कविता – परशुराम जी – ६ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
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परशुराम कहते सभी, मातु रेणुका लाल l
दानवीर अति वीर जो, बुद्धि प्रचंड विशाल ll
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करें पाप संहार ये, विष्णु लिये अवतार l
धरा चिरंजीवी कहे, करते परशु प्रहार ll
-3-
मातु धरा दूषित हुई, बढ़ते थे जब पाप l
करे नाश क्षत्रिय सभी, जन्म लिये थे आप ll
-4-
काम धेनु स्वतंत्र किये, पृथ्वी का कर दान l
सारे शस्त्र सिखा दिए, बढ़ा कर्ण का मान ll
-5-
शिव पिनाक का टूटना, क्रोध लिया अवतार l
राम रूप को देखकर, शांत किया व्यवहार ll
– क्रमशः
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







