डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “राजभाषा – केंद्र, राज्य व देश“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३६ ☆

✍ आलेख – राजभाषा – केंद्र, राज्य व देश… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

हमने हाल ही में वर्ष 2025 का हिंदी दिवस मनाया है अर्थात् 14 सितंबर। वैसे तो पूरे सितंबार माह में केंद्र सरकार के कार्यालयों में राजभाषा सप्ताह, राजभाषा माह मनाए जाते हैं, चाहे वे कार्यालय किसी भी राज्य में स्थित हों। यह सब जानते हैं कि भारत के आजाद होने पर संविधान बना और संविधान में हिंदी को भारत संघ की राजभाषा बनाया गया यानी केंद्र सरकार के कामकाज को हिंदी में करने का निर्णय लिया गया लेकिन यह भी निर्णय लिया गया कि संविधान लागू होने के बाद पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी में ही कामकाज किया जाता रहेगा और पंद्रह वर्ष बाद संसद अंग्रंजी भाषा को जारी रखने, न रखने या अंकों के स्वरूप के इस्तेमाल में परिवर्तन करने के बारे में कानून बनाएगी। कानून बना भी 1963 में यानी पंद्रह साल की अवधि समाप्त होने से पहले ही और यह निर्णय लिया गया कि केंद्र सरकार के कामकाज के हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी का प्रयोग अनिश्चित काल तक होता रहेगा। लेकिन राजभाषा तो हिंदी ही रही, अंग्रेजी नहीं। इन सब बातों को बहुत बार दोहराया जा चुका है और सभी जानते भी हैं। संभवतः यह भी समझते हैं कि संविधान में हिंदी भले ही राजभाषा हो परंतु काम अंग्रेजी में ही करना है।

परंतु, मैं आज कुछ और कहना चाहता हूँ, जिसके बारे में कभी कोई बात नहीं होती जबकि होनी चाहिए, क्योंकि भारत संघ का भौगोलिक  अस्तित्व भारत के राज्य हैं, जिनकी अपनी राजभाषा और अपने-अपने राजभाषा अधिनियम भी हैं। कारण यह है कि संविधान के अनुच्छेद 345 में प्रत्येक राज्य सरकार को अपने राज्य की एक या अनेक या हिंदी को राज्य की राजभाषा के रूप में अंगीकार करना होगा और जब तक राज्य का विधान मंडल अपनी भाषा के बारे में कानून पारित नहीं करता तब तक अंग्रेजी प्रयोग की जाती रहेगी। संविधान के अनुच्छेद 346 में यह कहा गया कि केंद्र सरकार के कामकाज के लिए तत्समय जो भाषा प्राधिकृत होगी, वह भाषा केंद्र व राज्य सरकारों के बीच, एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच पत्राचार की भाषा होगी। (अर्थात राजभाष हिंदी रहेगी परंतु अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकेगा।) इसी अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि यदि एक या दो से अधिक राज्य यह करार करते हैं कि उन राज्यों के बीच पत्राचार के लिए राजभाषा हिंदी रहेगी तो हिंदी का प्रयोग किया जाएगा। 

अब देखते हैं कि किस राज्य सरकार ने इस दिशा में क्या किया। उत्तर प्रदेश सरकार का राजभाषा अधिनियम 1951 पारित हुआ और 1969 में उसका संशोधन। इस अधिनियम में देवनागरी लिपि व हिंदी को राजभाषा माना गया और उर्दू को सह-राजभाषा। उत्तराखंड राजभाषा अधिनियम 2009 में देवनागरी लिपि में हिंदी को राजभाषा और संस्कृत भाषा को द्वितीय राजभाषा बनाया गया। राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान राजभाषा अधिनियम पारित किया गया और देवनागरी लिपि व हिंदी को अपनी राजभाषा बनाया गया। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पारित मध्य प्रदेश राजभाषा अधिनियम 1957में हिंदी को राजभाषा बनाया गया। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पारित छत्तीसगढ राजभाषा अधिनियम 2007 में हिंदी और छत्तीसगढी को राजभाषा बनाया गया है सन 2010 में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग अधिनियम पारित किया गया परंतु उसमें भी करार का कोई जिक्र नहीं है। बिहार सरकार द्वारा पारित बिहार राजभाषा अधिनियम 1950 में  हिंदी को राजभाषा बनाया गया। हरयाणा सरकार द्वारा पारित हरयाणा राजभाषा अधिनियम 1969 में हिंदी को राजभाषा बनाया गया और  हरयाणा राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 2004 में भी हिंदी को राजभाषा माना गया । हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा पारित  हिमाचल प्रदेश राजभाषा अधिनियम 1975 में हिंदी को राजभाषा बनाया गया ।  गुजरात सरकार द्वारा पारित राजभाषा अधिनियम 1960 में हिंदी और गुजराती को राजभाषा बनाया गया । महाराष्ट्र सरकार द्वारा महाराष्ट्र राजभाषा अधिनियम 1964 में देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली मराठी भाषा को राजभाषा बनाया गया और धारा 3 में संविधान के अनुच्छेद 210 का उल्लेख करते हुए यह भी कहा गया कि 15 वर्ष की अवधि के बाद राज्य के विधान मंडल की कार्यवाही के संव्यवहारार्थ हिंदी तथा मराठी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का उपयोग जारी रह सकेगा। इसी प्रकार धारा 4 में संविधान के अनुच्छेद 345 में निर्दिष्ट समस्त राजकीय प्रयोजनों के लिए मराठी भाषा का उपयोग किया जाएगा तथा ऐसे अपवादित प्रयोजनों के लिए राजभाषा के रूप में हिंदी का उपयोग किया जा सकेगा। ऐसा उल्लेख किसी अन्य राज्य सरकार के राजभाषा अधिनियम में नहीं है। 

पंजाब सरकार द्वारा पारित राजभाषा अधिनियम 1967 में गुरुमुखी में लिखी पंजाबी को राजभाषा बनाया गया । जम्मू और काश्मीर राजभाषा अधिनियम 2020 में काश्मीरी, डोगरी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं को राजभाषा बनाया गया है। केरल सरकार द्वारा पारित केरल  राजभाषा अधिनियम 1969 में मलयालम को राजभाषा बनाया गया, परंतु सामान्य आदेश, नियम उप नियम आदि अंग्रेजी में भी रहेंगे। तेलंगाना सरकार द्वारा पारित राजभाषा अधिनियम 1966 में तेलुगु को  प्रथम और उर्दू को द्वितीय राजभाषा बनाया गया। कर्नाटक सरकार द्वारा पारित कर्नाटक राजभाषा अधिनियम  1963 में कन्नड़ को राजभाषा बनाया गया। उसमें  यह भी लिखा गया कि 26 जनवरी 1965 के बाद राज्य का विधान मंडल कन्नड़ व हिंदी के अलावा अंग्रेजी को राज्य विधान मंडल के कार्य के लिए जारी रखने के लिए कानून बना सकेगा। आंध्र प्रदेश राजभाषा अधिनियम 1966 में तेलुगु भाषा को राज्य की राजभाषा बनाया गया और कुछ जिलों में उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाया गया। तमिलनाडु राजभाषा अधिनियम 1956 में तमिल भाषा को राजभाषा बनाया गया। पश्चिम बंगाल राजभाषा अधिनियम 1961 में  दार्जिलिंग, कलिमपोंग और कुरसियोंग जैसै पहाडी इलाकों में बंगाली और नेपाली राजभाषा होंगीं और शेष पूरे पश्चिम बंगाल में बंगाली राजभाषा रहेगी।  आसाम राजभाषा अधिनियम 1961 में आसामी को राजभाषा बनाया गया परंतु कछार के कुछ हिस्से में बंगाली के प्रयोग की अनुमति दी गई। त्रिपुरा राजभाषा अधिनियम 1964 में बंगाली और कॉक-बोरक भाषा को राजभाषा बनाया गया। उड़ीसा राजभाषा अधिनियम 1954 में उड़िया भाषा को राजभाषा बनाया गया। मेघालय राजभाषा अधिनियम 2005 में मेघालय स्टेट लेजिसलेचर (कंटीनियुएंस ऑफ द इंग्लिश लैंगुएज) अधिनियम 1980 को मान्य करते हुए अंग्रेजी को ही मेघालय की राजभाषा बनाया गया परंतु पूर्वी खासी हिल, पश्चिमी खासी हिल, दक्षिण पूर्व खासी हिल, पूर्वी जैंतिया हिल, पश्चिमी जैंतिया हिल और री-भोई में क्षेत्र में खासी को एसोशिएट राजभाषा बनाया गया।   गारो भाषा को पूर्वी गारो हिल, पश्चिमी गारो हिल, दक्षिणी गारो हिल, उत्तरी गारो हिल और दक्षिण पश्चिमी गारो हिल क्षेत्र के लिए राजभाषा बनाया गया।  मिजोरम में मिजो लैंग्वेज डेवलेपमेंट बोर्ड एक्ट 2022   मिजो भाषा के विकास, प्रसार आदि के लिए बनाया गया। नागालैंड  में नागालैंड स्टेट लेजिसलेचर (कंटीन्युएंस ऑफ इंगलिश लैंग्वेज) एक्ट 1964 बनाया गया जिसमें संविधान लागू होने के पंद्रह वर्ष बाद भी अंग्रजी को बनाए रखने के लिए लिखा गया। 

उल्लेखनीय है कि किसी भी राज्य सरकार ने अपने राजभाषा अधिनियम में यह प्रस्ताव पारित नहीं किया गया कि वे केंद्र सरकार के साथ किस भाषा में पत्राचार करेंगे और न ही किसी दूसरे राज्य के साथ यह करार किया गया कि वे आपस में किस भाषा में पत्राचार करने के लिए सहमत हैं। 

सभी राज्य सरकारों के राजभाषा अधिनियम की व्याप्ति यानी कार्यक्षेत्र संपूर्ण राज्य है, परंतु यह किसी ने स्पष्ट नहीं किया है कि उनके राज्यक्षेत्र में स्थित केंद्र सरकार के अधीनस्थ व विभागीय कार्यालयों को अपने राज्य की राजभाषा में कार्य न करने की छूट प्रदान की गई है क्योंकि उन पर केंद्र सरकार का राजभाषा अधिनियम पहले से हीलागू है। इन कार्यालयों में कार्य करने वाले अधिकारी कर्मचारी क्या केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों के राजभाषा अधिनियमों का अनुपालन करेंगे।

सभी राज्य सरकारों के राजभाषा अधिनियमों में अंग्रेजी को बरकरार रखने के लिए अवश्य प्रस्ताव पारित किए गए हैं,परंतु हिंदी को बनाए रखने या उसके प्रचार प्रसार के लिए कोई प्रस्ताव पारित किया हुआ दिखाई नहीं देता। और, कोई करे भी क्यों, हिंदी किसी की मातृभाषा नहीं है न, उत्तर भारत के प्रदेशों में जहां हिंदी को राजभाषा बनाया गया है उनकी अपनी अपनी भाषा बोलियां हैं, जो हिंदी से पहले की हैं और वे उन्हीं के विकास में लगे हैं। हिंदी को तो भारत की एकता व अखंडता के लिए विकसित किया गया है। फिर भी हिंदी को केंद्र सरकार की राजभाषा होने के नाते सम्मान मिलना चाहिए न कि उसे किसी प्रदेश की भाषा मानकर उसकी अवहेलना करना चाहिए। स्थिति आपके सामने है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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