श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२९ ☆

✍ ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

नाम के सिर्फ ये फ़क़ीर हुए

शाह जैसे सभी वज़ीर हुए

 *

वक़्त कैसे गुज़र गया था वो

जब मैं राँझा वो मेरी हीर हुए

 *

बाँटते मुँह को देख उजियारा

लोग सूरज के यूँ सफीर हुए

 *

अपना घर फूंक राह दिखलाने

दूसरे फिर नहीं कबीर हुए

 *

काम आते नहीं गरीबों के

दिल के छोटे बहुत अमीर हुए

 *

ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी

शायरी की वो यूँ नज़ीर हुए

 *

मैं हूँ मक़तल में सर है जाने को

लोग  मुझको नहीं बशीर हुए

 *

दफ़्न कर लाश एक लाबारिस

कौन कहता है तुम हक़ीर हुए

 *

कैसे उम्मीद में वफ़ा की करूँ

आँख तुम फेरने में कीर हुए

 *

वक़्त पर काम दे दुआ हरदम

आप बेवक़्त ही अधीर हुए

 *

शायरी के कई घरानों में

कोई ग़ालिब तो कोई मीर हुए

 *

रूह सबकी अज़र अमर होती

खाक़ होने सभी शरीर हुए

 *

शौक़ ही शौक में किये जो शुरु

उस नशे के वही असीर हुए

*

शक्ल उनकी ख़ुदा बदल जाती

रूह से जिनके गुम ज़मीर हुए

उनके गालों पे जो मले जाते

हम अरुण वो नहीं अबीर हुए

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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