श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय और भावप्रवण कविता  “पर्यावरण संरक्षण”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ ☆

🌻कविता 🌧️पर्यावरण संरक्षण 🌻

वृक्ष रहे गुणकारी जानों, देती शीतल छाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी ,लगते निर्मल गाँव।।

*

पुरवैया जो बहे सनातन, दीप जले है शाम।

राम – राम की जै जै कहते, करते अपने काम।।

बीच धार में मांझी गाता, तेरे भरोसे नाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बदले ऋतु है बदली शोभा, खिले नीम पलाश।

कोयल कूके बागों में जब, पिया मिलन की आस।।

महुआ महके डाली- डाली,बढा़ हुआ है भाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बौरें अमिया बेरी झूले, नीबू लटके डाल।

त्वचा निरोगी सुंदर काया, हरे नीम की छाल।।

पौधे जो मन को भाते हैं, बढे़ मनुज की चाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

 बाँस सागौन शीशम चंदन, कंचन सा है मोल।

वृक्ष हमारे संगी साथी, लगे बड़े अनमोल।।

घर मकान सब बनते इनसे, लगते इनमें दाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

कृष्ण कन्हैया यमुना तट पर, झूले कंदब  डाल।

सिया राम की जोड़ी सुंदर, जटा जूट से बाल।।

सजी आलता लाल महावर, बैदेही के पाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी,लगते निर्मल गाँव।।

*

तुलसी पीपल पूजे बरगद,धरे दीप घर द्वार।

कृष्णा कावेरी नित बहती, गंगा यमुना धार।।

झर – झर झरना बहते सुंदर, हरा भरा है ठाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted