श्री अरुण कुमार दुबे
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “वो जीना है नहीं जीना…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४३ ☆
वो जीना है नहीं जीना… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
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कभी तोला कभी माशा यही सबको बनाता है
समय हर एक की क़ीमत घटाता और बढ़ाता है
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समझ लीजे छुपाने में लगा है अपने ग़म सबसे
बिना ही बात जब इंसान कोई मुस्कराता है
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रहा जो मुनहसर है दूसरों पर कामयाबी को
कुल्हाड़ी पाँव पर अपने ही हाथों से चलाता है
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ज़लालत से भरी इस ज़िंदगी से मौत है बहतर
किसी की नज़रों में कोई अगर इंसां गिराता है
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वो जीना है नहीं जीना जो केवल छाँव में पलता
है अच्छा वो जो हर मौसम में खिलता लहलहाता है
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समुंदर और झरने की नहीं तमसील है जायज़
किसी के तिशना लब की प्यास झरना ही बुझाता है
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बुरा जब वक़्त आये वो नहीं तब हाथ फैलाता
कमाई में से कुछ हिस्सा अगर अपनी बचाता है
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ख़ुदा उसकी इबादत पर तवज़्ज़ो दे नहीं कोई
अगर मजबूर मुफ़लिस को सताता और रुलाता है
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चुनावों में नहीं अब हार औ है जीत का मतलब
तबंगर वोट जनता के किसी तरहा चुराता है
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वही वंदा ख़ुदा का है वही है दीन का हामी
गिराया वक़्त जिस इंसान को उसको उठाता है
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सनक हसरत बनी है जब मिली है कामयाबी तब
अगर रस्मन रही काविश न कुछ भी हाथ आता है
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तुम्हें ये आप बीती इसलिए लगती तुम्हारी सी
अरुण जो दर्द जीवन ने दिए गीतों में गाता है
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© श्री अरुण कुमार दुबे
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