डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय’
(डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं। आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख “बुंदेली के प्रकांड विद्वान डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव”।)
☆ बुंदेली के प्रकांड विद्वान डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ☆ डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय’ ☆
सभी जानते हैं कि संस्कारधानी ही नहीं अपितु पूरे बुंदेल क्षेत्र में जब भी बुंदेली भाषा एवं साहित्य की बात आती है तो स्व. डॉ. पूरन चंद श्रीवास्तव जी के नाम और उनके द्वारा किये गए कार्यों का उल्लेख अवश्य ही होता है।
पितृतुल्य स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव जी का जन्म 1 सितंबर 1916 में कटनी के पिपरहटा गाँव में हुआ था। एम. ए. (हिन्दी) तथा पी-एच. डी. की शैक्षिक अर्हता उनकी अध्ययनशीलता का प्रतीक है। शिक्षकीय जीवन जीते हुए ये सन 1976 में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। इनका बाल्यकाल प्रकृति की गोद में बीता, जहाँ प्रकृति भरपूर प्यार लुटाती है। पेड़-पर्वत, झरने-नदियाँ, करौंदे, बेर, मकोये, आम, जामुन, महुआ, अमरूद आदि खाने को मिलते थे। अंतहीन हरियाली से सजी वसुंधरा में खरगोश, मोर, गौरैया आदि पशु-पक्षी दिखाई देते थे। इन सबके बीच रहने वाले डॉ. श्रीवास्तव जी का प्रकृति प्रेम भला उनके साहित्य में कैसे नहीं आता। इनकी तो एक कृति का नाम ही हमें प्रकृति से जोड़ने हेतु पर्याप्त है। वह है बुंदेली काव्य कृति “भौंरहा पीपर”।
डॉ. पूरनचंद जी श्रीवास्तव बुंदेली के प्रति आजीवन समर्पित रहे। वे एक संवेदनशील, अध्ययनशील एवं वरिष्ठ बुन्देली भाषा मर्मज्ञ तो थे ही, बुंदेली गुणज्ञता के विरले व्यक्तित्व भी थे। सन 1984 में प्रकाशित अपने बुंदेली काव्य संग्रह भौंरहा पीपर के संबंध में इन्होंने कहा है कि इस संग्रह की सारी रचनाएँ मेरे ग्राम्यांचल में बिताए वक्त की देन है, जिससे उनका ग्रामीण जगत से अतीव जुड़ाव परिलक्षित होता है। इसके आगे वे कहते हैं कि उन दिनों गाँव में पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों का निर्वहन ईमानदारी और निष्ठा के साथ किया जाता था।
संस्कारधानी एवं बाहरी साहित्यकारों को सदैव मार्गदर्शन देने वाले डॉ. श्रीवास्तव जी के निष्णात एवं यशस्वी शिष्यों की एक लंबी फेहरिस्त है। अंतरराष्ट्रीय प्रज्ञा मिशन नई दिल्ली के संस्थापक ख्यातिलब्ध ब्रह्मलीन स्वामी प्रज्ञानंद जी ने डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव जी के बारे में लिखा है कि उनके समक्ष होने पर मुझे उनका सौम्य तथा गुरु गाम्भीर्य रूप साकार होने लगता था। जब मैं एक छात्र के रूप में उनके द्वारा कराए जाने वाले लोक साहित्य का बोध करते समय करता था।
डॉ. श्रीवास्तव की कालजयी कृतियों में बुंदेली काव्य संग्रह “भौंरहा पीपर” एवं सन 1958 में सृजित खंडकाव्य “वीरांगना रानी दुर्गावती” प्रमुख हैं। इसके इतर इनका हिन्दी एवं बुन्देली सृजन का व्यापक साहित्य सागर है। निबंध आत्मकथाएँ, शैक्षणिक साहित्य की रचनाएँ और बुंदेली शब्दकोश आदि इनके द्वारा रचे गये हैं। वर्ष 1990 के पूर्व तक ऐसे विद्वत मनीषी का जन्मदिवस गुंजन कला सदन द्वारा प्रतिवर्ष 1 सितंबर को मनाया जाता रहा। इनकी सक्रिय बुन्देली भाषा सेवा तथा समर्पण से प्रेरित होकर सन 1990 से इनके जन्मदिवस को गुंजन ने “बुन्देली दिवस” के रूप में मनाना शुरू किया। इसमें संस्कारधानी के लोगों तथा साहित्यकारों का भी योगदान मिलना प्रारंभ हो गया।
इनके 90 वें जन्मदिवस की तैयारियाँ जोरों से चल ही रहीं थी तभी इस बुन्देली दिवस के 12 दिन पूर्व ही अर्थात 20 अगस्त 2005 को संस्कारधानी का यह प्रकांड बुंदेली मर्मज्ञ हमें छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल गया। संस्कारधानी की यह अपूर्णीय क्षति थी। सबको मात्र इस बात का संतोष है कि उनके जीवन काल में ही सन 1990 से इनका जन्म दिवस “बुंदेली दिवस” के रूप में मनाया जाने लगा था। इस तरह वर्तमान वर्ष 2025 में हम 36 वाँ बुंदेली दिवस और उनका 109 वाँ जन्मदिवस मना रहे हैं, जो प्रतिवर्ष 1 सितम्बर के 30 दिन पूर्व से मनाया जाने लगता है। जबलपुर और आसपास की समस्त साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाएं अपने अगस्त माह के कार्यक्रम स्व. डॉ. पूरनचंद जी को समर्पित करती हैं। यहां अगस्त माह बुंदेली मास कहलाता है।
ऐसे प्रसिद्धि प्राप्त बुंदेली भाषा विज्ञानी की स्मृति में हम बुंदेली दिवस विगत 35 वर्ष से व्यापक स्तर पर मना रहे हैं और इसमें हमें पूरे बुन्देली भाषायी क्षेत्र से सहयोग तथा समर्थन मिल रहा है। इन सभी तथ्यों व उपलब्धियों के आधार पर हम मध्य प्रदेश शासन व संस्कृति विभाग से माँग करते हैं कि इस “बुन्देली दिवस” को शासकीय मान्यता प्रदान कर शासकीय स्तर पर बुंदेली दिवस घोषित किया जाये।
© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






सभी को बुंदेली दिवस पर अनंत शुभभाव। 💐💐👍👍👍
आदरेय अग्रज बावनकर जी,
इस आलेख के प्रकाशन पर आपका हृदयतल से आभार।
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