सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा

परिचय

शिक्षण : प्रयागराज विश्वविद्यालय से स्नातक (हिंदी, राजनीति-शास्त्र, इतिहास) 

सृजन की विधाएँ : लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘रोशनी के अंकुर’ एवं  ‘टूटती मर्यादा’ लघुकथा संग्रह तथा  ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह। अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित। सम्पादन :  ‘खाकीधारी’ 2024{लघुकथा संकलन} ‘अदृश्य आँसू’ 2025 {कहानी संकलन} ‘किस्से खाकी के’ 2025 {कहानी संकलन} ‘उत्तर प्रदेश के कहानीकार’ 2025 {कहानी संकलन}

पुरस्कार : लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य/कविता विधा में कई बार पुरस्कृत। आकाशवाणी आगरा से कहानी प्रसारित 

अनुवाद : ‘अदहने क आखर’ अवधी अनुबाद [लघुकथा-संकलन], कुछ लघुकथाएँ पंजाबी, उर्दू, नेपाली और उड़िया में अनूदित होकर प्रकाशित।

यू ट्यूब चैनेल :  ‘savita mishra akshja’ और ‘साहित्य एक समुन्दर: ‘अक्षजा’ नाम से।  ब्लॉग : ‘मन का गुबार’ एवं ‘दिल की गहराइयों से’।

सम्प्रति: परिवार की धुरी, ब्लॉगर, साहित्यकार, यूट्यूबर।

☆ लघुकथा – सुचालक ☆ सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ☆

“आज मेरे मैसेज का तुमने कोई जवाब नहीं दिया।”

“सिर में दर्द हो रहा था यार।”

“क्यों! क्या हुआ?”

“अरे जानती ही हो, फेसबुक पर कहीं पार्टी विरोधी और समर्थकों की लम्बी हांक, तो कहीं जातिवाद का जहर।”

“अरे तो कौन कहता है कि फेसबुक की सारी पोस्ट पढ़ों!”

“सारी कौन पढ़ रहा। लेकिन फ्रेंडलिस्ट वालों की पोस्ट-कमेन्ट तो दिख ही जाती हैं। कमेन्ट ऐसे कि बुझ चुकी राख में भी आग पैदा कर दें।

“हटाओ अपनी फ्रेंड-लिस्ट से ऐसे सिर-दर्दो को, क्यों झेले पड़ी हो?”

“अरे यार! जातिवाद का जहर बोते देखकर क्रोध में दिल तो मेरा भी यही कहता है। उनकी प्रोफाइल खोलती भी हूँ, लेकिन अनफ्रेंड पर गया मेरा अँगूठा उस समय रुक जाता है, जब उनके द्वारा कहा गया दीदी/जिज्जी का सम्मानजनक संबोधन याद हो आता है।”

“भावनाओं में बहकर तुम उनके नकारात्मक विचारों को बढ़ावा दे रही हो, फिर से सोच लो!”

“नहीं यार, तू समझती क्यों नहीं है! ये दीदी/जिज्जी मेरे लिए सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि अपनेपन की मिठास है। मैं उन्हें अन्फ्रेंड करके इस रिश्ते को कसैला नहीं करना चाहती हूँ।”

“चाहे अपनी बात को शिष्टता से रखने पर भी वो तुम्हें अनफ्रेंड कर दें! पीठ पीछे तुम्हारी इस परम्परावादी सोच की चाहे हँसी ही क्यों न उड़ाएं! क्यों?” क्रोध की लकीरें दोनों के माथे पर उभर आई थीं।

“तू जानती है न कि स्त्रियाँ रिश्तों की सुचालक होती हैं। वे रिश्तों को तब तक जीना चाहती हैं, जब तक पानी सिर के ऊपर से न बहने लगे।” अब दोनों के चेहरे पर गर्वीली मुस्कान कानों तक खिंच गयी थी ।

© सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

सम्पर्क: फ़्लैट नंबर-302, हिल हॉउस, खंदारी अपार्टमेंट {हनुमान मन्दिर के बगल में} खंदारी, आगरा, {उ. प्र.} पिन-282002

ई-मेल: 2012.savita.mishra@gmail.com मोबाइल: 09411418621

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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