श्री हेमंत तारे

हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है।)

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री हेमंत तारे जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ अम्मा की यादों का खज़ाना”।) 

 ☆  दस्तावेज़ # ३९ – अम्मा की यादों का खज़ाना ☆ श्री हेमंत तारे ☆

आज अम्मा कि पूजा सामग्री टटोल रहा था तो एक डिब्बे में उसके सहेजे हुये कुछ सिक्के हाथ लगे 5, 10, 20, 25 और 50 पैसे के सिक्के. ये सिक्के तो अब प्रचलन में रहे नही लेकिन हमारी पीढी ने इनका जलवा देखा है.

अम्मा को चीजें सहेजने का शौक था पर यूं भी नही की हर  अटाले को सीने से चिपका के रख ले. उसकी रूचि अत्यंत परिष्कृत थी. क्या रखा जाये और क्या जरूरतमंद लोगों को दे दिया जाये ये उससे बेहतर कोई नही जानता था.  बाबूजी भी दस्तावेज सम्भालने में अत्यंत दक्ष थे.  आई बाबूजी के यह संस्कार हमें विरासत में मिले हैं.  मेरे खजाने में कक्षा 1 से M. Sc. तक की सभी मार्कशीट, 1976 में लगे चश्मे से आज तक हुई आंखों की जांच का अद्यतन रिकार्ड,  1976 में खरीद की गई HMT घडी से लगाकर जीवन में की गयी छोटी – बडी खरीददारी के बिल आदि शुमार है.  इन दस्तावेजों की आज कोई अहमियत नही लेकिन रखे हुये हैं, तो हैं.😏

सिक्के से शुरू बात कहां से कहां निकल गयी.  मानव मन से गतिमान कुछ हो ही नही सकता. एक सेकंड के दसवे हिस्से में ये चाँद,  मंगल ग्रह या सूरज कि लौटाबाट यात्रा कर सकता है,  फिर सिक्के से मार्कशीट तक कोई लम्बा सफर तो था नही पर कुछ मित्र ये अवश्य कहेंगे खाली दिमाग शैतान का घर 😀

♥♥♥♥

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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