श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६८ ☆
☆ लघुकथा ☆ ~ दादी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
कमर पर हाथ रखे हुए लगभग ८० वर्ष की दादी ने जब अपनी नजर ऊपर की तरफ उठाई, तो एक सुंदर सा स्मार्ट बालक उनकी नजरों के सामने था।
दादी ! आपके किस पैर में दर्द है? आप बैठ जाइए, मैं इसे देखता हूँ।
तुम कौन हो बेटा? तुम्हें किसने भेजा है?.. उस वृद्ध महिला ने उस नौजवान से पूछा .
दादी, दादी मैं आपका पोता हूँ ? अरे.. अरे हाँ, नहीं दादी ! मैं कृष हूँ , आपका फिजियोथैरेपिस्ट। बुआ जी ने भेजा है दादी।
हाँ..बुआ जी ने मुझसे कहा है कि मैं आपके यहाँ प्रतिदिन आऊँ और आपकी एक्सरसाइज कराऊँ।
दादी तखत पर लेट गयीं। कृष ने उनकी एक्सरसाइज करानी शुरू कर दी। वह प्रतिदिन आता, दादी..दादी कहते हुए, कमरे में प्रवेश करता और दादी की एक्सरसाइज कराता। कृष के रूप में दादी को उनका पोता मिल चुका था तो वहीं कृष जिसकी आँखों ने न दादी और न ही नानी किसी को देखा था, उसे एक नई दादी और नानी मिल गयी थी।
उसकी स्वयं की दादी और नानी, उसके जन्म से बरसों पहले ईश्वर को प्यारी हो गयी थीं।
शायद इसी कारण, ईश्वर ने उसपर कृपा की और उसे उस वृद्ध महिला के रूप में उसकी दादी मिल गई थी। दादी का दर्द न जाने फिजियोथैरेपिस्ट के फिजियो करने से कम हुआ या पौत्र के रूप में कृष के मिलने से कम हुआ, यह हम नहीं कर सकते हैं, लेकिन दर्द तो पहले से बहुत कम था। अब कृष, दादी के घर में बेरोक -टोक आया करता था। दादी के घर में जब कुछ खास चीजें बनती, दादी उसे सहेज कर, अपने कृष के लिए अवश्य रखती। दादी का दुर्भाग्य था कि उनका इकलौता बेटा और एकलौता पौत्र दोनों ही उनके पास रहकर भी दूर थे।
वे सभी दादी के घर से तीन चार मकान आगे,उसी गली रहते थे, लेकिन बीबी की धमक, स्वयं बुजुर्ग हो रहे, पुत्र पर काफी भारी पड़ रही थी। उसकी हिम्मत इतनी नहीं थी कि वह खुले आम जाकर अपनी माँ को देख ले, उनका हाल-चाल पूछ ले।
हालाँकि उसकी यह बंदिश उतनी बड़ी रही थी जितनी कहानी में कहीं जा रही थी। स्वभावत: अब दादी का यह बुजुर्ग बेटा, अपनी माँ से मिलना नहीं चाहता था। निराशा भाव में भीग चुका दादी का यह बेटा! शुरुआती दौर में मजबूरी के कारण, लेकिन बाद में अपने बदले हुए स्वभाव के कारण, अपनी माँ से नहीं मिलता था।
उसकी माँ भी अब उससे घृणा करने लगी थी। वह अपने ऐसे मनहूस -नीरस पुत्र से बिल्कुल बात नहीं करना चाहती थी, जिसने उनकी जिंदगी में कष्ट के कांटे रोप दिए थे।
इधर कृष की कितनी भी व्यस्तता में हो, वह फिजियो- एक्सरसाइज कराने के लिए दादी के यहाँ तो अवश्य जाता था। दादी और उनका यह पोता, नि:स्वार्थ भाव से एक दूसरे से मिलते थे। दादी अपने इस फिजियोथैरेपिस्ट पोते को जब तक देखती नहीं थीं, उन्हें चैन ही नहीं मिलता था। हालाँकि दादी की इकलौती बेटी, यानि बुआ जी, समय से कृष को उनकी एक्सरसाइज का चार्ज दे दिया करती थी। दादी की एक्सरसाइज करते हुए दो वर्षों से अधिक हो गए थे। अक्सर कृष सोचता कि आखिर बुआ जी, दादी की एक्सरसाइज पर इतने पैसे क्यों खर्च करती हैं। यह तो बस बुढ़ापे वाली एक ऐसी पीड़ा का एक छोटा सा उपाय है, जिसमें कुछ समय के लिए दर्द से आराम मिलता है, पर दर्द बिल्कुल चला जाए ऐसा नहीं होता है। जीवन में अपना सब कुछ खो चुकी, बुआ जी, अपनी ८० वर्षीय माँ के इस पौत्र प्रेम की खुशी को छिनना नहीं चाहती थीं।
एक दिन कृष दादी की फिजियोथैरेपी करने, दादी के घर पहुँचा तो वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था। दो, चार, दस लोग दादी के शव के पास बिल्कुल शांत मुद्रा में बैठे हुए थे।
इधर दादी अपनी आँखों को बंद कर चिर निद्रा में सो चुकी थीं। इस मार्मिक दृश्य को देखकर कृष की आँखों से आँसू के दो बून्द छलक पड़े, मानो आँसू के ये दो बूँद, दादी के चरणों में श्रद्धा सुमन के रूप में गिरे हो रहे हों।
वहीं शव से दूर अकेले में बैठे एक शख्स, जिससे कोई भी बात नहीं कर रहा था, उसकी आँखें न जाने अतीत की किन यादों में खोयी हुईं थी, यह पता नहीं चल पा रहा था। शायद पश्चाताप की अग्नि में जलकर उसके आँशु अब स्वाहा हो गये थे।
मृत्यु के तीसरे दिन शांति पाठ के दिन भी कृष दादी के घर पहुँचा था। उसके हाथों में श्रद्धा के पुष्प थे, जिसे वह दादी के चित्र पर अर्पित करते हुए मन ही मन कह रहा था,दादी, अब मैं किसे दादी कहूँगा और किसकी फिजियोथैरेपी करूँगा।
आप बहुत याद आएँगी.. दादी।
नोट :- इस लघु कथा की कहानी के पात्र के नाम काल्पनिक है। लेखक के मन में उपजे हुए भाव के आधार पर यह कहानी लिखी गई है। यदि कहानी किसी व्यक्ति चरित्र से मेल खाती है तो इसे मात्र संयोग समझाया जाए।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





