श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के कटु अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

☆ संजय दृष्टि  – जीवन की सवारी 

भयमिश्रित एक चुटकुला सुनाता हूँ। अँधेरा हो चुका था। राह भटके किसी पथिक ने श्मशान की दीवार पर बैठे व्यक्ति से पूछा,’ फलां गाँव के लिए रास्ता किस ओर से जाता है?’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘मुझे क्या पता? मुझे तो गुजरे 200 साल बीत चुके।’

पथिक पर क्या बीती होगी, यह तो वही जाने। अलबत्ता यह घटनाक्रम किसी को डरा सकता है, चुटकुला है सो हँसा भी सकता है पर महत्वपूर्ण है कि डरने और हँसने से आगे चिंतन की भूमि भी खड़ी कर सकता है। चिंतन इस बात पर कि जो जीवन तुम बिता रहे हो, वह जीना है या गुजरना है?

अधिकांश लोग अपनी जीवनशैली, अपनी दैनिकता से खुश नहीं होते। वे परिवर्तन जानते हैं पर परिवर्तित नहीं होते। पशु जानता नहीं सो करता नहीं। मनुष्य जानता है पर करता नहीं।

”आपकी रुचि कौनसे क्षेत्र में हैं?”…”मैं नृत्य करती थी। नृत्य मेरा जीवन था पर ससुराल में इसे हेय दृष्टि से देखा जाता था, तो….”,  “शादी से पहले मैं पत्र-पत्रिकाओं में लिखती थी। पति को यह पसंद नहीं था सो….”, “मैं तो स्पोर्ट्स के लिए बना था पर….”, “घुमक्कड़ी बहुत पसंद है। अब व्यापार में हूँ। बंध गया हूँ….।”

टू व्हीलर पर जब सवारी करते हैं तो अलग ही आनंद आता है। कई बार लगता है मानो हवा में उड़ रहे हैं। यही टू व्हीलर रास्ते में  पंक्चर जाये और ढोकर लाना पड़े तो बोझ लगता है।

जीवन ऐसा ही है। जीवन की सवारी कर हवा में उड़ोगे तो आसमान भी पथ पर  उतर आया अनुभव होगा। जीवन को ढोने की आदत डाल लोगे तो ढोना और रोना, दोनों समानार्थी लगने लगेंगे।

मनोविज्ञान एक प्रयोग है। हाथी के पैर में चार रोज नियमित रूप से रात को बेड़ी डालो, सुबह खोल दो। पाँचवें दिन बेड़ी डालने का ढोंग भर करो। हाथी रोज की तरह खुद को बेड़ी में बंधा हुआ अनुभव करेगा। आदमी बेड़ी के इसी ढोंग का शिकार है।

आमूल परिवर्तन का अवसर हरेक को नहीं मिलता। जहाँ है वहाँ उन स्थितियों को अपने अनुकूल करने का अवसर सबको मिलता है। उस अवसर का बोध और सदुपयोग तुम्हारे हाथ में है।

सुख यदि धन से मिलता तो मूसलाधार बरसात में भागते-दौड़ते, उछलते-कूदते, नहाते, झोपड़ियों में रहने वाले नंगधड़ंग बच्चों के चेहरे पर आनंद नहीं नाचता और कार में बंद शीशों में बैठा बच्चा उदास नहीं दिखता।

शीशा नीचे कर बारिश का आनंद लेने का बटन तुम्हारे ही हाथ में है। विचार करो, जी रहे हो या गुजार रहे हो? बचे समय में कुछ कर गुजरोगे या यूँ ही गुजर जाओगे?

 

समय रहते कुछ कर गुजरो। वह समय आज ही है। शुभ आज।

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©  संजय भारद्वाज , पुणे

9890122603

writersanjay@gmail.com

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Vijaya Tecksingani
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मना सर्वथा सत्य सांडूं नको रे।
मना सर्वथा मिथ्य मांडूं नको रे॥
मना सत्य ते सत्य वाचे वदावे।
मना मिथ्य तें मिथ्य सोडूनि द्यावें ॥१९॥
समर्थ रामदास स्वामी
सत्य और मिथ्य का अंतर बुद्धि से सत्य छाँटकर मन को क़ाबू में लाकर जीवन को सही दिशा में चलाया जा सकता हैं ।
संत रामदास की कही गहरी बात का आपने किया हुआ सहज निरूपण हैं ।लेकिन जैसे आपने कहा मनुष्य जानता हैं पर करता नहीं ‘केल्याने होत आहे रे आधी केलेचि पाहिजे’
विजया टेकसिंगानी

ऋता सिंह
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मित्र,मुझे चिंता है उस आत्मा की जो दो सौ साल से गुज़रे वक्त में पड़ी थी हाँ ,कभी आदमी रहा होगा!!!!?????
पर तथ्य यह है कि मनुष्य साहस जुटाकर स्थितियों से जूझता नहीं बस समझौता कर लेता है इसीलिए तकलीफ़ सहता है।सच है आनंद उपभोग का बटन हम सबके हाथ में है।सुंदर अभिव्यक्ति??

शिवप्रकाश गौतम
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सुंदर विचारों का पुस्तकालय है हमारे मित्र संजयजी भारद्वाज। बधाई मित्र