श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हमारा आदर्श समाज…“।)
अभी अभी # ९८८ ⇒ आलेख – हमारा आदर्श समाज
श्री प्रदीप शर्मा
किसे पता था कि व्यावहारिक जीवन से आदर्श शब्द अचानक पलायन कर शब्दकोश में दुबककर बैठ जाएगा और उसके दर्शन केवल गीताप्रेस गोरखपुर की आदर्श नारी और आदर्श बालक जैसी पुस्तकों में ही संभव हो पाएँगे।
हमने बचपन में आदर्शों को ऐसे ही ढोया है जैसे आज की पीढ़ी कथित रूप से भ्रष्टाचार और आतंकवाद को ढो रही है। अगर मैं यह कहूँ कि उस ज़माने में लोग आदर्श ही ओढ़ते और आदर्श ही बिछाते थे, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।।
आज के समय की नर्सरी और kg 1 kg 2 तब कच्ची और पक्की पहली और अ-खण्ड, ब-खण्ड कहलाती थी। रोते हुए बच्चों को पकड़-पकड़कर स्कूल भेजा जाता था। हमारी पहली नर्सरी का नाम भी आदर्श बाल मंदिर ही था। एक आदर्श खंडहरनुमा ढाँचा स्कूल कहलाता था, जो समय के साथ विवादित ढाँचे के पहले ही ढह गया। आदर्शों का टिका रहना इतना आसान भी नहीं होता।
हमारे आदर्श शिक्षक, आजीवन नैतिकता और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति ही रहे। कई चेले शक्कर निकल गए, लेकिन गुरु गुड़ ही रह गए। उनकी ईमानदारी गूँगे का गुड़ थी, जो होते हुए भी, आँखों से नज़र नहीं आती थी। आज केवल उनके स्मरण मात्र से ही आँखें नम हो जाती हैं।।
गाइड और ट्यूशन जैसे शब्द शिक्षा में प्रचलित नहीं थे। शिक्षा के क्षेत्र में आदर्श शिशु विहार, आदर्श कन्या विद्यालय
और आदर्श महाविद्यालय, शिक्षा के आदर्श केंद्र थे। हम आदर्श नगर में ही रहते थे और एक आदर्श को-ऑपरेटिव सोसाइटी में ग़बन भी हमारे ही सामने हुआ था।
आदर्श का इतना बोलबाला था कि आदर्श पुस्तक भंडार, आदर्श किराना स्टोर तो ठीक, रहने के लिए आदर्श लॉज और खाने के लिए आदर्श भोजनालय तक उपलब्ध था।।
बीच में आदर्श से थोड़ी राहत मिली ज़रूर, जब अंग्रेज़ी ने सर उठाया। फिर दौर चला आइडियल कॉफ़ी हाउस और आइडियल पैथोलॉजी का।
शिक्षा का आरंभ भी आइडियल प्रिपप्रेटरी स्कूल से होने लगा। लेकिन आइडियल शब्द आदर्श का विकल्प नहीं बन पाया।
नैतिकता, ईमानदारी और आदर्श को आप अलग अलग नहीं कर सकते। पुस्तकों के ज्ञान ने हमेशा सच बोलने को बाध्य कर दिया। झूठ बोलने से पाप लगता है, यह डर, कई बार झूठ बोलने के बाद जाता रहा। पाप के डर से नहीं, पकड़े जाने के डर से कभी चोरी करने की हिम्मत नहीं हुई और हम शरीफ बनकर रह गए।
नैतिकता साहस का काम है। जिनमें दुस्साहस होता है, वे आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी को ताक में रख देते हैं ! जब सम्पन्न, सुखी और इज़्ज़तदार बन जाते हैं, तब टोपी और कोट की तरह आदर्श और नैतिकता ओढ़कर समाज में प्रकट हो जाते हैं। समाज उन्हें चिंतक, विचारक और समाज सुधारक जैसे विशेषणों से अलंकृत एवं पुरस्कृत करता है। उनके सम्मान में फलाने आदर्श पुरुष के नाम से अभिनंदन ग्रंथ का विमोचन होता है।
सफलता के रास्ते में आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी बड़े बड़े स्पीड ब्रेकर हैं। जो इनमें उलझकर पिछड़ गया, वह समय से पिछड़ गया। आगे बढ़ने वाले कब ऐसे अवरोधक से घबराते हैं। वे समय के साथ चलते हैं, और अपनी मंज़िल पर पहुँच ही जाते हैं। समय के साथ चलना ही समझदारी है।।
क्या आपने इतना उन्नत समाज पहले कभी देखा है ? चुनाव घोषित होते ही आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गई है। इतने आदर्श चुनाव 70 साल में पहले कभी नहीं हुए। हिंसा, बूथ पर कब्ज़ा और बोगस वोटिंग से पूरी तरह छुटकारा। अब आप अपने आदर्श उम्मीदवार को बिना भय और लालच के मत दे सकते हैं। इससे अधिक आदर्श वातावरण की तो शायद आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
अब हम विकासशील देश नहीं रहे। पूरी तरह विकसित हो गए हैं। क्यों न बरसों से ताक में रखा ईमानदारी का तावीज़ पुनः गले में पहन लिया जाए। यह हमारी बेईमानी और भ्रष्टाचार से रखवाली तो करेगा ही, हमें एक आदर्श समाज की स्थापना में मदद भी करेगा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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