श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपराध-बोध।)

?अभी अभी # १०४४ ⇒ आलेख – अपराध-बोध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अपराधियों को अपराध-बोध नहीं होता और जो निर्दोष होते हैं, वे अपराध-बोध के तले दबे रहते हैं। अपराध बोध, अपराध करने से अधिक घातक होता है।

अक्सर अवसाद और आत्महत्या की जड़ में यही अपराध-बोध होता है।

अपराध क्या है, यह कानून तय करता है। इंसान नैतिकता और अनैतिकता के चक्र में उलझा रहता है। जिसमेंलोग क्या कहेंगे” वाला भाव मुख्य रूप से हावी रहता है।।

सिगरेट पीना, शराब पीना अथवा झूठ बोलना कोई इतना बड़ा अपराध तो नहीं ! इन्हें अधिक से अधिक आप बुरी आदत अथवा लत कह सकते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ये तीनों ही आदतें आदमी में आत्म-विश्वास बढ़ाती हैं। एक तो गलत काम और उससे आत्म-विश्वास, विश्वास नहीं होता।

पान वाले की दुकान पर, घर में, सार्वजनिक स्थान में, कभी छुपकर, कभी खुले आम, जिस आत्म-विश्वास से लोग सिगरेट का धुआँ छोड़ते हैं, वह देखते ही बनता है। कोई भी बुरी आदत आसानी से नहीं छूटती। जिनकी इच्छा-शक्ति प्रबल होती है, वे बुरी आदतों से बाज आते हैं, कुछ इसे एक मानवीय कमज़ोरी मान, भरे मन से ही सही, आदतों के समक्ष आत्म-समर्पण कर देते हैं।।

अच्छी-बुरी आदत अपराध नहीं ! अपराध-बोध सकारात्मक भी हो सकता है, और नकारात्मक भी।

सकारात्मक अपराध-बोध में विवेक मन पर अंकुश लगाए बैठा रहता है, और छोटी से छोटी भूल होने पर भी, मन को आगाह किया करता है। जो आत्म-विश्लेषण करते रहते हैं, वे अपने अपराधों /भूलों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी कर लेते हैं।

इससे उनके मन का बोझ भी हल्का हो जाता है। ईसाइयों के confession, जैनियों का पर्युषण के वक्त जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा, और गाँधीजी के सत्य के प्रयोग इसी श्रेणी में आते हैं। प्रायश्चित अपराध-बोध से मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है।

नकारात्मक अपराध-बोध की श्रेणी में ऐसी छोटी-मोटी भूलें होती हैं, जिन्हें व्यक्ति बड़ा मान बैठता है, और अंदर ही अंदर घुटते रहकर अवसाद की स्थिति निर्मित कर लेता है। यह स्थिति इतनी घातक होती है कि इसमें चित्त में अंधकार व्याप्त हो जाता है, और आत्महत्या के अलावा उसे कोई दूसरी राह नज़र नहीं आती। स्वाभिमानी, सच्चरित्र लोगों पर जब झूठे इल्ज़ाम या केस लगाए जाते हैं, तो उन्हें अपने स्वाभिमान को बचाने का कोई अन्य रास्ता दिखाई नहीं देता और वे आत्महत्या की ओर अग्रसर हो जाते हैं।।

आसाराम और राम-रहीम में कितना अपराध-बोध है, और वे किस हद तक अपराधी हैं, यह ईश्वर जाने, लेकिन जब भैय्यू महाराज जैसे कथित संत पारिवारिक समस्याओं के लिए स्वयं को ज़िम्मेदार मानते हुए स्वयं को गोली मारकर समाप्त कर लेते हैं, तो अपराध-बोध की सकारात्मकता, नकारात्मकता में बदल जाती है। इसका मतलब यह भी कतई नहीं कि आसाराम का सकारात्मकता से कुछ लेना-देना है। कुछ अपराधियों में अपराध-बोध होता ही नहीं।

इस तरह वे अपने आपको एक सच्चा अपराधी ही सिद्ध कर रहे होते हैं।

अपराध बुरा है, लेकिन अपराध-बोध उससे भी बुरा है। अपराध से बचें, और अपराध-बोध से भी ! छोटी-मोटी गलतियों को कबूलें, बड़ी गलतियों से तौबा करें। अनजाने में, अथवा आवेश में हुए अपराध के लिए प्रायश्चित करें। अपराध और अपराधी को संरक्षण देना जुर्म है और पाप भी।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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