श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मा मू …“।)
अभी अभी # १०८८ ⇒ आलेख – मा मू
श्री प्रदीप शर्मा
नाम बड़े और दर्शन खोटे!
मामू में ऐसा कुछ नहीं था, वह एक साधारण इंसान था, जो अपने नाम के अनुरूप उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुका था, जहां उसे मामू कहकर ही पुकारा जा सकता था।
गेहूंआ रंग, दमकता चेहरा, आधा सपाट और आधे सर पर, मिले जुले काले सफेद बाल, दोहरा, औसत कद काठी का कसरती बदन, आंखों में अनुभव की चमक, बस एक नज़र में यही उसकी पहचान थी।
मेरे पूर्व निवास ४४, नारायण बाग के गृह स्वामी के यहां उसका आना जाना था। बैंक, सरकारी दफ्तर और कार्यालयों के अधिकारियों के घरों में उसकी हैसियत एक प्लंबर कम इलेक्ट्रीशियन कम कारपेंटर की थी। उसे घर अथवा दफ्तर की मरम्मत का कोई भी कार्य निश्चिंत होकर सौंपा जा सकता था। जानकार लोगों की निगाह में मामू एक ऐसे हरफन मौला इंसान का नाम था, जो आपका कोई भी काम जिम्मेदारी के साथ पूरा करने की क्षमता रखता था।।
मामू कोई अलादीन का चिराग तो था नहीं, कि घिसा और हाजिर, लेकिन बिजली के उपकरण फ्रिज, मिक्सर, पानी की मोटर, फ्यूज, और शॉर्ट सर्किट के अलावा घर की मरम्मत, और रंग रोगन में भी उसी को हाजिर होना पड़ता था। छोटी मोटी तोड़फोड़ और कारीगरी में भी वह उस्ताद था। मजदूरों को लाना, मोलभाव करना और उनकी निगरानी का दायित्व भी वह स्वेच्छा से ही उठाता था।
मामू पर घर के हर सदस्य का अधिकार था, क्योंकि मामू भी एक तरह से हमारे घर का ही सदस्य जो हो गया था। फुर्सत में बातों बातों में इंसान जब खुलता है तो उसकी खूबियां भी उजागर होती है। मामू B.Sc. पास आउट था, और अपने जमाने का एक अच्छा फुटबॉल खिलाड़ी था। बीड़ी, सिगरेट, पान गुटका और शराब जैसे व्यसनों से कोसों दूर, एक औसत मुस्लिम परिवार का होते हुए भी उसने अपने एक लड़के को सॉफ्टवेयर इंजिनियर और एक को वकालात के काबिल बनाया।।
मामू, जब तुम्हारे बच्चे इतने काबिल हैं, फिर तुम्हें क्यों अब इस तरह काम करना पड़ता है, जैसे प्रश्नों का उसके पास एक ही जवाब होता था, ऊपर वाले ने हाथ पांव काम करने के लिए दिए हैं। अपना काम तो सभी करते हैं। दूसरों के काम तो केवल खुशनसीब ही आते हैं। इतनी बड़ी दुनिया अब मेरा परिवार हो गया है। आप सबकी समस्या, मुझे अपनी समस्या लगती है।
बस पांव उठ जाते हैं और मैं चला आता हूं। Work is worship! काम ही मेरे लिए इबादत है।
सब दिन समान नहीं होते।
मामू को घुटनों की समस्या हो गई। आंखों में भी अब वह रोशनी नहीं रही। हमारा भी वह आशियाना छूट गया। इल्म और ईमान जहां मिल जाते हैं, वहीं एक इंसान पैदा हो जाता है। हम सबके जीवन में भी मामू, बाबू भाई और जफर भाई जैसे इंसान आते रहते हैं। कौन कहता है दुनिया में अच्छे लोग नहीं, अच्छाई नहीं। आज भी हर कारीगर में मेरी आंखें मामू को तलाशती हैं, लेकिन ऊपर वाला एक जैसे दो इंसान कहां बनाता है। कामयाब इंसान तो बहुत देखे, लेकिन मामू जैसा नेकदिल, ईमानदार इंसान नहीं देखा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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