श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दोस्ती बढ़ाना…“।)
अभी अभी # 706 ⇒ दोस्ती बढ़ाना
श्री प्रदीप शर्मा
जब दोस्ती बढ़ती है, तब वह दोस्ताना कहलाती है। किसी से दोस्ती बढ़ाना इतना आसान नहीं होता। पहले परिचय, हैलो हाय से औपचारिक मेल-मिलाप होता है। कच्ची उम्र में दोस्ती, प्यार जैसी, अनायास ही हो जाती है। एक दूसरे का नाम भी नहीं जानते और दोस्ती हो जाती है।
आजकल दोस्ती का प्रबंधन फेसबुक ने अपने ज़िम्मे ले लिया है। किसी परिचित/अपरिचित की प्रोफाइल में जाओ, एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजो, उधर से मंजूरी आई और we are friends! भले ही रिश्ते में वो आपका बाप लगता हो।।
फेसबुक के पास एक ही दर्ज़ा है, एक ही क्लास है, all are friends! हमारे शहर में एक लॉज थी, उसका नाम भी फ्रेंड्स लॉज ही था। वसुधैव कुटुंबकम् की धारणा फेसबुक ने साकार कर दी।
स्कूल का एक साथी था, राम नाम था उसका, राम पाहूजा। खतीपुरे पर सायकल की दुकान थी उसकी। एक ही स्कूल, एक ही क्लास में थे, घर भी आसपास ही थे। दोस्ती हो गई। वह सायकल से मुझे घर लेने आता। डबल सवारी स्कूल जाते। उसकी सायकल की दुकान पर रेडियो सीलोन और विविध भारती सुनते। हफ़्ते में एक फ़िल्म ज़रूर देखते।
हम अच्छे दोस्त थे। फिर भी दोस्ती बढ़ाया करते थे। हमारा एक मौखिक करार था, खिलाओ पिलाओ, दोस्ती बढ़ेगी। कभी मुझे दोस्ती बढ़ाना पड़ती, कभी उसे। जिसकी जेब में पैसे होते, वह दोस्ती बढ़ा देता।।
कभी कभी नोंकझोंक भी हो जाती ! आज दोस्ती कौन बढ़ाएगा। दोनों के पास पैसे नहीं ! जेब की तलाशी ली जाती। दुकान के पैसे हैं, खर्च नहीं कर सकता। आज से दोस्ती खत्म।
दूसरे ही दिन ! चलो दोस्ती बढ़ाते हैं। दोनों की जेब में पैसे होते थे। कभी दामू अण्णा की कचोरी और एक फुल चाय से दोस्ती बढ़ती थी तो कभी प्रशांत के उसल पोहे अथवा दही मिसल से। इतना सस्ता, सुंदर लेकिन टिकाऊ तरीक़ा था हमारा दोस्ती बढ़ाने का।।
रामकथा हम बड़े भाव और श्रद्धा से सुनते हैं लेकिन किसी की रामकहानी में हमें कब दिलचस्पी होती है। मेरे इस दोस्त राम की भी बहुत अग्नि-परीक्षा ली गई। इसके भी लक्ष्मण और भरत जैसे दो भाई थे। राम का भी वनवास शुरू हुआ। पिताजी के शांत होते ही जहाँ पहले राम सायकल स्टोर्स था, वहाँ पहले ऑटो गैरेज और बाद में कपड़े की दुकान खुल गई। कलयुग के लक्ष्मण और भरत ने भ्राता राम को बाहर का रास्ता दिखा दिया। बड़ा परेशान रहा मेरा दोस्त ! चार लड़कियों की शादी की। मर्यादा में रहा, लेकिन किसी अफसर, नेता से मतलब की दोस्ती नहीं बढ़ाई। दोस्ती बढ़ाई भी तो मुझ जैसे साधारण आदमी से, निःस्वार्थ निश्च्छल।
आज भी संघर्षरत है मेरा राम ! बहुत ठोकरें खाई लेकिन कभी निराश, हताश नहीं हुआ, डगर डगर भटका, लेकिन कभी कदम नहीं भटके। अपना छोटा मोटा धंधा करता है। कम मिलता है आजकल, लेकिन जब भी मिलता है, यही कहता है, चलो दोस्ती बढ़ाते हैं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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