श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लेट लतीफ…“।)
अभी अभी # 708 ⇒ लेट लतीफ…
श्री प्रदीप शर्मा
किसी और का नाम किसी व्यक्ति पर आरोपित करना कहां की समझदारी है। वक्त के बाद आप पहुंचते हैं, गलती आपकी है, लेट आप हो रहे हैं, और बदनाम बेचारा लतीफ हो रहा है। अजीब लतीफा है।
वियोगी होगा पहला कवि की तरह शायद लतीफ पहला इन्सान ऐसा हुआ होगा, जो बेचारा कहीं वक्त पर नहीं पहुंचा होगा, उसकी कुछ मजबूरी रही होगी। लेकिन बद अच्छा, बदनाम बुरा। लतीफ अच्छा, लेट लतीफ, ना बाबा ना।।
जो आदतन लेट होते हैं, उन्हें इस विशेषण से सम्मानित किया जाता है। राजा महाराजाओं की सवारी की तरह, लोग उन्हें देखते ही कह उठते हैं, लो आ गए, महाराज लेट लतीफ। वे भी आदत से मजबूर हैं अथवा उनकी भी कोई मजबूरी रहती होगी।
हर दफ्तर में लेट लतीफ पाए जाते हैं। महिलाओं में भी लेट लतीफी होती होगी, लेकिन कोई लता अथवा ललिता कभी लेट नहीं हुई, इसलिए उनके लिए कोई लेट लता अथवा लेट ललिता जैसा आदर्श स्थापित नहीं हो सका। घर गृहस्थी भी संभालना, बच्चों को स्कूल भेजना, पतिदेव का टिफिन तैयार करना, कितने कामकाज होते हैं उनके पास, हम समझते हैं। मैडम, कोशिश कीजिए, थोड़ा समय पर आने की।।
जो आदतन लेट होते हैं, उनका आत्म विश्वास बड़ा गज़ब का होता है। हमारा एक साथी घड़ी से पंद्रह मिनट लेट आता था, इसे कहते हैं वक्त की पाबंदी। आप अपनी घड़ी मिला लो। उसके पास कोई बहाना नहीं था। आधी हकीकत, आधा फसाना था। उसके और दफ्तर के बीच रेलवे क्रॉसिंग आते थे, ट्रेन का भी अपना टाइम था, और उसका भी दफ्तर का। बस अक्सर टकराहट हो जाती थी। अगर कभी शंटिंग शुरू हो गई, तो गए काम से। उससे आग्रह किया जाता, अपना समय थोड़ा एडजस्ट कर लिया करो। लेकिन एडजस्ट दफ्तर को ही करना पड़ता था।
एक हमारे वरिष्ठ मित्र के बारे में शर्त लगाई जाती समय पर आने की। खुद से अधिक दूसरा आप पर भरोसा करे। लगा लो शर्त, अगर वे कभी समय पर आ जाएं ! किसी दिन अगर वे समय से आ जाते, तो उनका अभिनंदन किया जाता। उन्हें सफाई देनी पड़ती, आज वे समय से कैसे आ गए।।
चलिए लेट लतीफ को छोड़िए, जो दफ्तर से जल्दी घर जाते हैं, बताइए, उन्हें क्या कहते हैं ! देखिए, यह आपसी मामला है, अगर इंसान अपना काम खत्म करके, किसी जरूरी काम से, जल्दी घर जाना चाहता है, तो जा सकता है। इसके लिए लतीफ की तरह किसी हनीफ को बीच में लाने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जो आदतन जल्दी घर जाते हैं, जरा उनके भी तो जलवे देखिए।
एक सज्जन अपने वरिष्ठ अधिकारी की सदाशयता का लाभ उठाकर दफ्तर से रोजाना शाम दो घंटे पहले ही घर खसक जाते थे। बाबू अफसर राजी, तो इससे हमें क्यों आपत्ति जी ! लेकिन एक दिन तो गजब हो गया। जल्दी जाने वाले सज्जन के घर से उनकी धर्मपत्नी का फोन आ गया। फोन दरियादिल अफ़सर ने ही उठाया। उधर से दहाड़ सुनाई दी। वे रोज तो अब तक घर आ जाते हैं, आज ऐसा क्या हो गया जो अभी तक नहीं आए, हमें चिंता हो गई, इसलिए फोन लगाया है। अगले ही दिन पहले उनकी खिंचाई हुई और उसके बाद से वे भी, दफ्तर के नियत समय पर ही घर जाने लगे। अति सर्वत्र वर्ज्यते।।
हमारे एक पुराने पड़ोसी थे, संयोग से उनका नाम भी मिस्टर लतीफ ही था। बड़े मिलनसार भले इंसान। बरसों से उनसे भेंट नहीं हुई। कहीं से उनका फोन नंबर तलाशा और संपर्क किया तो पता चला he is mo more.
मिस्टर लतीफ अब late लतीफ हो गए, इस दुनिया में नहीं रहे। बड़ा बुरा लगा।
इन सत्तर वर्षों में बहुत कुछ बदला है। प्राइवेट दफ्तरों में समय की और काम की भी बहुत
सख्ती है। लेट लतीफों के दिन अब हवा हुए। अब तो दफ्तरों में भी मस्टर नहीं, ई – अंगूठे चलते हैं। समय की पाबंदी और अनुशासन से अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। जो बेहतर है, उसका स्वागत है। लेट लतीफ कहीं अब एक लतीफा बनकर ही न रह जाए। यह कहावत अब शायद ही उनके काम आए ;
लेट लतीफ ?
Better late than never. !!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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