श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पवित्र रिश्ता…“।)
अभी अभी # 718 ⇒ पवित्र रिश्ता
श्री प्रदीप शर्मा
जब भी पवित्र रिश्ते का जिक्र होता है, पतित पावन का स्मरण हो आता है। जो पतित को भी पावन कर दे, वह केवल परम पिता परमेश्वर ही हो सकता है।
हम संसारी तो रिश्तों में ही पवित्रता तलाशते रह जाते हैं।
रिश्ते अच्छे खराब तो हो सकते हैं, लेकिन क्या पवित्र और अपवित्र भी होते हैं। मां बेटे, भाई बहन, बेटी दामाद, सभी रिश्ते तो पवित्र होते हैं। क्या सच्चे प्यार का पवित्र होना भी जरूरी है। क्या किसी रिश्ते को गंगाजल से पवित्र किया जा सकता है। केवल पति पत्नी के रिश्तों को अग्नि की साक्षी में सात फेरों के बाद पवित्र माना जाता है। अब तो सुप्रीम कोर्ट लिव इन रिलेशन को भी पवित्र बनाने पर तुली हुई है।।
समाज हमें नैतिकता सिखा सकता है, कानून में बांध सकता है, लेकिन किसी रिश्ते को पवित्र अथवा अपवित्र नहीं ठहरा सकता। मीरा ने कुल की मान मर्यादा सब छोड़ दी। संतों के साथ बैठ बैठकर लोक लाज तक तज दी। अपने पति को पति नहीं, जाके सर मोर मुकुट, मेरो पति सोई, ऐलान कर दिया। समाज ने उसे पवित्रता सिखाने के लिए दंडित भी किया लेकिन बात नहीं बनी।
लोग हंसते हैं, कुंती पुत्र कर्ण की तरह द्रौपदी पर, जो केवल कुंती के कहने पर पांच पांडवों की पत्नी बन गई ! वही कुंती, जो सूर्य पुत्र कर्ण को अपना बेटा घोषित नहीं कर पाई। और उसी द्रौपदी के बारे में यह कहा गया कि उसके जैसी कोई सती स्त्री नहीं। कृष्ण की पत्नी न होते हुए भी सभी प्रेम से राधे कृष्ण कहते हैं, सीता राम की तरह रुक्मणि कृष्ण नहीं।।
जिस तरह पारस लोहे को सोना बना देता है, अपवित्र को पवित्र करने का शॉर्ट कट भी है, यह मंत्र ;
ॐ अपवित्र: पवित्रो
वा सर्वा वस्थां गतोपि वा।
बाहर भीतर की पवित्रता का शर्तिया नुस्खा। इसी तरह एक तुलसी पत्र यानी तुलसी का पत्ता अपवित्र को पवित्र कर देता है। पूजा, आरती के पश्चात् जब पंडित जी पवित्र जल का भक्तजनों पर छिड़काव करते हैं, तो यह भाव जरूर मन में आता है, कि उस पवित्र जल का एक छींटा हम पर भी पड़ ही जावे।
चित्त की निर्मलता और आचरण की शुद्धता ही हमारे चरित्र का निर्माण करती है। फिर भी किसी को पवित्र अथवा अपवित्र घोषित करने का अधिकार ईश्वर ने मनुष्य को नहीं दिया। वह सबमें व्याप्त है। जिन समाज के ठेकेदारों में खुद ही चरित्र ना हो, वे किसी भी लाचार को चरित्रहीन घोषित कर सकते हैं। ऐसे चरित्र प्रमाण पत्र बांटने वालों से सावधान रहें। विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा जैसी जीवनी रचकर ‘ चरित्रहीन ‘ शरदचंद्र को अमर कर दिया।।
निष्ठा, त्याग, समर्पण और नि :स्वार्थ प्रेम ही पवित्रता की सच्ची पहचान है। यही ईश्वरीय प्रेम है। जो इन गुणों से युक्त हो, प्राणी मात्र से प्रेम करता है, है, वह सर्वगुण संपन्न होकर, मानव कहलाने की योग्यता रखता है …!!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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