श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक भारतीय आत्मा…“।)
अभी अभी # 723 ⇒ एक भारतीय आत्मा
श्री प्रदीप शर्मा
जिक्र होता है जब एक भारतीय आत्मा का, दद्दा माखनलाल चतुर्वेदी की बात होती है। दद्दा का जन्म 1889 ईसवी में होशंगाबाद जिले के बाबई ग्राम में हुआ था। वैसे हमारा पैतृक निवास भी बाबई और सेमरी हरचंद ही है। हमारे बाप दादा भी वहीं पैदा हुए। देखिए, हमारी आत्मा भी कितनी भारतीय है। वैसे देखा जाए तो आज देश की सभी १४० करोड़ आत्माएं भी भारतीय ही हैं। भारत का रहनेवाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं।
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, की तर्ज पर अगर आत्मा से पूछा जाए कि आत्मा रे आत्मा तेरा स्वरूप कैसा, तो शायद वह भी यही कहे, जिस जीव में विद्यमान, उस जैसा। आत्मा के बारे में गीता से अधिक ज्ञान कहां से मिल सकता है। बात सीधी नैनं छिन्दंति शस्त्राणि, नैनं दहति पावक: तक पहुंच जाती है। संक्षेप में हमारे जन्म के साथ ही आत्मा का प्राण के साथ हमारे शरीर में प्रवेश हो जाता है और जब प्राण पखेरू उड़ जाते हैं तो आत्मा भी परमात्मा में विलीन हो जाती है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। ।
लेकिन जब तक यह आत्मा हमारे शरीर में रहती है, इसे मन के अधीन रहना होता है और सारे सांसारिक प्रपंचों का साक्षी बनना पड़ता है। अगर हमारी आत्मा भारतीय है तो दुनिया के हर देशवासी की आत्मा भी उसी देश की वासी होगी। यथा An American Soul, A British Soul अथवा A Chinese Soul. एक देशसेवक फौजी जब अपने देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाता है तो उसका शरीर और आत्मा एकरूप हो जाते हैं। आत्मा की तरह वह भी अमर हो जाता है।
जो अपने वतन अथवा मानवता के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देते हैं, उनकी आत्मा उनसे अलग नहीं होती और वे जन्म मरण के बंधन से सदा सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।
यह तो स्पष्ट है कि हमारे शरीर में कहीं न कहीं आत्मा है जरूर और उसी आत्मा में परमात्मा का भी वास है। उंगली में अंगूठी, अंगूठी में नगीना ! लेकिन काम, क्रोध, लोभ और मोह का आवरण हमें शुद्ध आत्मा तक नहीं पहुंचने देता। हम तो कम परेशान हैं, बेचारी आत्मा बहुत दुखी और परेशान है। सब गीता ज्ञान धरा रह जाता है, जब हमारी आत्मा दुखी सुखी होती है। हम कलेजे को ही आत्मा समझ बैठते हैं।
किसी आत्मा को अच्छी आत्मा और किसी आत्मा को दुष्टात्मा समझ बैठते हैं। ।
हमारी आत्मा कब कर्ता बनकर दुआ और बद्दुआ देने लगती है, हमें पता ही नहीं चलता। तुमने हमारी आत्मा को कष्ट पहुंचाया, ईश्वर तुम्हें देख लेगा। जब हमसे कुछ नहीं बन पड़ा, तो ईश्वर की धौंस दे दी। वाह रे मानुस की जात ?
जात पात तो हमसे छूटती नहीं, बड़े आत्मा परमात्मा की बात करते हैं। बात एक भारतीय आत्मा से शुरू हुई थी, ज्यादा दूर तलक नहीं गई। आत्मा का अपना दायरा है। आत्मा को भारतीय ही रहने दें चलेगा। देखा जाए तो बस वही परम सत्य और सनातन है। कम से कम इसे तो धर्म और राजनीति से दूर रखें। बड़ी मुश्किल होगी, अगर आत्मा भी कांग्रेस बीजेपी अथवा हिंदू मुसलमान हो गई। ।
कबीर बार बार जिस चादर की बात करते हैं और हमारे साहिर साहब जिस चुनरी के दाग के लिए फिक्रमंद हैं, क्या यह वही आत्मा तो नहीं। ओढ़ने की चुनरी हो या चादर, बात तो एक ही है।
आत्मा का क्या है, वह तो नित्य, शुद्ध और मुक्त है। वह तो काया का पिंजरा छोड़ परमात्मा में विलीन हो जाएगी और चित्रगुप्त अपने बही खाते खोलकर बैठे होंगे और घर में गरुड़ पुराण का पाठ चल रहा होगा। करते रहो दान पुण्य मृतात्मा की शांति और मुक्ति के लिए। लागा चुनरी में दाग, छुपा लो, छुपा सको तो।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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