श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख – “कीड़े मकोड़े…“।)
अभी अभी # 724 ⇒ कीड़े मकोड़े
श्री प्रदीप शर्मा
Worms & insects
आप इन्हें कीड़े मकोड़े कहें, या कीट पतंग, रेंगने वाले, उड़ने वाले, जमीन के अंदर रहने वाले, ये जीव बेचारे इस सत्य से अनभिज्ञ हैं, कि ये नर्क का जीवन भोग रहे हैं। भोग में रस होता है और इनकी भी यह भोग योनि है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच पसरी माया का भेद, एकमात्र केवल मानव ही जान पाया है, क्योंकि उसमें भेद बुद्धि है।
प्राणी मात्र में ईश्वर का वास होते हुए भी, वह ईश्वर तत्व से कोसों दूर है। मनुष्य जन्म हमें कितनी भोग योनियों के बाद प्राप्त हुआ है, विज्ञान इस सत्य को आज तक नहीं जान पाया। डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत एक अलग कहानी कहता है तो हमारे विभिन्न धर्म ग्रंथ कुछ और। कोई मनु की संतान है तो कोई adam eve और आदम हौवा की। लेकिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है और इसीलिए वह अपने आप को ईश्वर के अधिक करीब पाता है।।
सृष्टि के जन्म और प्रलय अथवा कयामत की भी कई गाथाएं हैं। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा जी को इस सृष्टि का जन्मदाता, भगवान विष्णु को पालनकर्ता और शिव को संहारकर्ता माना गया है। एक अज्ञात शक्ति है, उसे आप जितना चाहे नाम और स्वरूप दे सकते हैं। सब कुछ जानते हुए भी, इंसान के हाथ में कुछ नहीं है।
एक समझदार प्राणी होने के कारण आज इंसान विश्व की जनसंख्या को लेकर चिंतित और परेशान है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी वह इंसान को ही जिम्मेदार मानता है। सभ्यता की कीमत प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद करके ही चुकाई जा सकती है। मनुष्य को अभी और विकसित होना है, उसे मानव से महामानव और खुद से खुदा यानी इंसान से भगवान बनना है।।
वह आज भी अवतारवाद में विश्वास करता है। वो मसीहा आएगा, और हमें कल्कि अवतार की इतनी आस है कि हम हर महान इंसान में उसे ढूंढने लग जाते हैं। भक्तों के अनुसार तो कई कल्कि अवतार अभी भी इस धरा पर विचर रहे होंगे।
एक कीड़ा मकोड़ा बेचारा इन सबसे अनजान है। उसका तो जन्म ही कितने समय के लिए हुआ है, वह नहीं जानता। उसे कहीं भी कहीं भी, मक्खी और मच्छर की तरह मसल दिया जाता है। जीवः जीवस्य भोजनम्, कौन कब किसका आहार बन जाए, क्या पता।।
रेंगने वाले कीड़े अक्सर ज़मीन के अंदर ही रहते हैं, इधर दिन में बाहर आए और किसी का शिकार बने। बेचारे इसलिए रात में ही बाहर आते हैं। मक्खी मच्छर तो गंदगी में ही पनपते हैं, ईश्वर इन पर इतना मेहरबान है कि इनके जनसंख्या नियत्रण की चिंता तो इंसान भी नहीं कर पाता। ये थोक में पैदा होते हैं, और थोक में मुक्ति पाते हैं। ईश्वर जाने उनकी यात्रा कब शुरू हुई और कब तक चलेगी। कितने जन्म उन्हें और लेने पड़ेंगे, अभी इंसान बनने के लिए। क्या पता कभी बन पाएंगे भी या नहीं।
देवताओं को दुर्लभ यह मानव जन्म हमें तो मिल गया, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के बाद किसको मिलेगा, किसको नहीं मिलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इंसान एक समझदार प्राणी है, वह कीड़े मकोड़ों की तरह बच्चे पैदा करके नहीं छोड़ सकता। वह भी जानता है, बच्चे दो ही अच्छे।।
कीड़े मकोड़ों में किसी तरह के विकास की संभावना नहीं, फिर भी वे सृष्टि का एक आवश्यक अंग हैं, वे कभी प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करते, केवल मनुष्य मात्र ही ऐसा प्राणी है, जो उनका दोहन और शोषण करता है।
जिस दिन हम ईश्वर की अहैतुकी कृपा और इन कीट पतंगों और कीड़े मकोड़ों के अस्तित्व का कारण जान जाएंगे, शायद इस सृष्टि और ब्रह्मांड के रहस्य को भी पहचान पाएंगे। सुबह की इस अमृत वेला में एक कॉकरोच मुझे देखकर मुंह छुपा रहा है, और एक मैं हूं, जो उसे देख यह सोच रहा हूं, क्या इसमें भी परमेश्वर का वास है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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