श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “साज और आवाज …“।)
अभी अभी # 744 ⇒ आलेख – साज और आवाज
श्री प्रदीप शर्मा
जहां साज है, वहां आवाज है, जहां वीणा है वहां तार है और जहां पायल है, वहां झंकार है। जहां भोलापन और मासूमियत है वहां बचपन है और जहां दिल है वहां धड़कन है। हमारी कर्मेंद्रियां हों अथवा ज्ञानेंद्रियां, उनका अपना भोजन होता है, जिसके रस से उनकी पुष्टि होती है।
भोजन हवा, पानी से हमारे शरीर में रस की उत्पत्ति होती है और वह स्वस्थ व पुष्ट होता रहता है। हमारी इंद्रियों को भी भोजन की आवश्यकता होती है। आँखें कुछ अच्छा देखना चाहती हैं, कान कुछ अच्छा सुनना चाहते हैं और लब कुछ अच्छा बोलने के लिए तरस जाते हैं।
जब भोजन से प्राप्त रसों से तन और मन पुष्ट और निरोग हो जाता है, तो चेहरे पे खुशी छा जाती है, आंखों में सुरूर आ जाता है। जब तुम मुझे अपना कहते हो, अपने पे गुरूर आ जाता है। लीजिए, बातों ही बातों में साहिर ने गीत भी लिख दिया, संगीतकार रवि ने उसकी धुन भी बना दी, और आशा जी ने उसे अपनी आवाज भी दे दी। एक गीत का सृजन हो गया, जो इस कायनात में अमर हो गया।।
रस का मूल स्रोत है आनंद। योगिराज श्री कृष्ण सोलह कलाओं में पारंगत थे। हमने तो उनकी एक बांसुरी का ही कमाल देखा है, और वही सुदर्शन चक्र धारी एक अंगुली में पर्वत उठाकर गिरधारी भी बन बन जाते हैं। और सूर और मीरा के भक्तिपद हमें झकझोर देते हैं, जब हमारे एक कान में लता की आवाज गूंजती है, मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो और दूसरे कान में जगजीत सिंह, भाव प्रवाह में डूबे हुए हे गोविन्द, हे गोपाल पुकारते, प्रवेश कर जाते हैं।।
शास्त्रज्ञों ने नव रस का वर्णन किया है जिसमें आश्चर्यजनक ढंग से श्रृंगार, प्रेम, शांत, हास्य, वीर और करुण रस के साथ साथ ही रौद्र, भयानक और वीभत्स रस को भी शामिल किया गया है। कला में भले ही भेद हो, लेकिन सभी कलाओं का आपस में समावेश ही ललित कला है। नाचे मोरा मन, गीत सुनते ही तन और मन क्यों सुर और ताल पर नृत्य करने लग जाते हैं। जब तक श्रृंगार रस की उत्पत्ति नहीं होती, पांवों में घुंघरू शोभा नहीं देते। मेरे पैरों में घुंघरू बंधा दे, तो फिर मेरी चाल देख ले।
संगीत हमें गंधर्व लोक की देन है। सात ही लोक हैं, और सात ही सुर। इन सात सुरों में पिछले सत्तर सालों में जो साज बजे हैं और जो आवाजें गूंजी हैं,उन्हें आज बच्चा बच्चा जानता है। सन् १९५२ की फिल्म बैजू बावरा ही ले लीजिए। एक से बढ़कर एक गीत। राग मालकौंस, मन तड़पत हरि दर्शन को आज, और राग दरबारी, ओ दुनिया के रखवाले। जरूरी नहीं कि आपको सुर ताल की समझ हो, जब सृजन आत्मा से होता है, तो वह परमात्मा का प्रसाद हो जाता है।।
बहुत लंबी फेहरिस्त है सिर्फ साज और आवाज की। क्लासिकल, सेमी क्लासिकल, गीत, गजल, कव्वाली, भजन, नात और कीर्तन। अगर गीत ही ना हो, तो कैसा गायन और कैसा वादन।
पहले गीतकार खुद गाते थे। जब सड़कों पर, चौराहों पर और कवि सम्मेलनों के मंच पर सर्वश्री वीरेंद्र मिश्र, सर्वेश्वरदयाल, दिनकर, रमानाथ अवस्थी और गोपाल दास नीरज जैसे कवि उपस्थित होते थे, तो कविता जाग उठती थी, जो सुबह तीन साढ़े तीन बजे तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किए, जगाए रखती थी। किसी मुशायरे की महफिल में साहिर, कैफ़ी आज़मी, बशीर बद्र, हसरत जयपुरी, और निदा फ़ाज़ली मौजूद हों और दाद और इरशाद का समां ना बने, ऐसा हो ही नहीं सकता।
आज सब कुछ सपना सा लगता है, जो कभी अपना सा लगता था। साज बदल गए, आवाज़ें बदल गईं। इधर अगर पुरुष गायक सहगल, तलत, रफी, मुकेश, मन्ना डे, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर और जगजीत सिंह ने मैदान छोड़ा तो उधर नूरजहां, सुरैया, शमशाद, बेगम अख्तर, और खुर्शीद के बाद सबसे पुरानी लता भी अभी अभी मुरझा गई।
न आज गीतकार पंडितों की तिकड़ी पंडित भरत व्यास, नरेंद्र शर्मा और प्रदीप ही मौजूद हैं और ना ही शैलेंद्र, हसरत, मजरूह साहिर, रवींद्र जैन, इंदीवर और आनंद बक्षी जैसे प्रतिभाशाली गीतकार।
कहां हैं आज कोई नौशाद, हुस्नलाल भगतराम, खेमचंद प्रकाश, गुलाम मोहम्मद, मदन मोहन, ओपी नय्यर, सचिन देव बर्मन, रवि, रोशन और शंकर जयकिशन।।
लगता है साज और आवाज का संसार सूना हो गया है। लेकिन आशा से आकाश थमा है। गर ये ज़मीं तेरी नहीं, वो तेरा आसमां तो है। भले ही हमारा चांद कहीं खोया है, लेकिन आसमान खुला है। रहमतों की बारिश अक्सर होती ही रहती है। फरिश्ते आते जाते ही रहते हैं। वे अपनी दुनिया बसा जाते हैं, और साथ कुछ नहीं ले जाते, अपनी धरोहर यहीं छोड़ जाते हैं और बस ढेर सारा प्यार और दुआ ले जाते हैं। साज और आवाज का मंदिर कभी खाली नहीं रहता। यहां रोज इबादत होती है, रोज सजदा होता है। इंसाफ का मंदिर है ये, भगवान का घर है।
कितनी धुनें, कितने गीत, कितनी ग़ज़ल, कितने गायक और कितने तराने, और गायकी और मौसिकी के भी अपने अपने घराने, एक बार कुबेर का खजाना खत्म हो जाएगा लेकिन साज और आवाज का यह सुहाना सफर यूं ही चलता रहेगा। चलते चलते, मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना। कभी अलविदा ना कहना ….
© श्री प्रदीप शर्मा
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