श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आलेख – मोहर और गुलमोहर।)

?अभी अभी # 745 ⇒ आलेख – मोहर और गुलमोहर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

खूबसूरती की कोई कीमत नहीं होती। फिर भी जब हम किसी गुलमोहर के पेड़ को देखते हैं तो लगता है इसकी सुन्दरता प्रकृति पर अपनी मोहर लगा रही है।

इंसान जब लाल पीला होता है, तब उसकी प्रकृति बड़ी विचित्र हो जाती है और जब प्रकृति लाल पीली होती है तो कभी गुलमोहर में, तो कभी अमलतास में बहार आ जाती है।

गुलशन अगर गुलमोहर और अमलतास से गुलजार है तो हमारी दुनिया में भी अशर्फी, मोहर और स्वर्ण मुद्रा की बहार है। कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फानी। लेकिन जितने रंग इंसान बदलता है, उतने कुदरत नहीं बदलती। पतझड़, सावन, वसंत बहार से जब इंसान का मन नहीं भरा तो उसने एक मौसम प्यार का भी ढूंढ लिया। और उसकी नीयत और नियति देखिए, वह पैसे से ही प्यार करने लगा।।

आज जिसे हम पैसा कहते हैं, वही कभी स्वर्ण मुद्रा कहलाता था तो कभी अशर्फी। हमने तो मोहरें भी नहीं देखी, सोने के सिक्के तो छोड़िए, चांदी के चंद सिक्कों के लिए हमने अपना ईमान तक बेच दिया। गुलमोहर आज भी शान से खड़ा है, अशर्फी और मोहर ने घुटने टेक दिए।

स्वर्ण मुद्रा छूट जाए, अशर्फी मोहर भले ही छूट जाए, लेकिन इंसान का मोह कभी नहीं छूटे।

जो कभी मोहर थी, समय के साथ वह रबर की मोहर बन गई। कानूनी कागजातों पर हस्ताक्षर के साथ रबर की मोहर भी लगने लगी। जहां कभी टकसाल में सोने चांदी के सिक्के ढले जाते थे, उसकी जगह, अब जगह जगह रबर की मोहरों का कारखाना खुलने लगा। रबर स्टांप को वह अधिकार प्राप्त हो गया, जो कभी सोने की मोहरों को था। एक कागज के टुकड़े पर लगी मोहर, लाखों करोड़ों की अफरा तफरी करने लगी। जब जागीर ही चली गई तो कहां सोना चांदी, मोहर अशर्फी और जेवरात। वक्त वक्त की बात।।

मोहर, यानी पद और पैसे के लालच में इंसान को रबर स्टांप अथवा किसी का मोहरा बनने से कोई परहेज नहीं होता। आज हमारे आसपास मोहरे ही मोहरे हैं। कुछ रबर स्टांप तो कुछ जीते जागते शतरंज के मोहरे। राजनीति कहें अथवा सियासत यहां जितना रबर स्टांप जरूरी होता है उतना ही अपने हिसाब से चाल चलने वाला मोहरा।

एक सोने की मोहर कब पहले रबर की मोहर बनी और इंसान कब किसी का मोहरा, पता ही नहीं चला। प्रकृति नहीं बदली, अमलतास गुलमोहर नहीं बदला, लेकिन लाल, हरे, पीले, नीले नोटों ने इंसान को बदल डाला।

मोहर से किसी का मोहरा बना इंसान आगे, कब क्या बन जाए, कहना मुश्किल है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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