श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सिया तो से नैना लागे रे…“।)
अभी अभी # 750 ⇒ आलेख – सिया तो से नैना लागे रे
श्री प्रदीप शर्मा
प्यार करने की, और ईश्वर स्मरण की कोई उम्र नहीं होती। प्यार तो हमने खूब किया होगा, नाम जपन क्यूं भूल गया। हम तो खैर अब प्यार करना भी भूल गए होते, अगर हमारे जीवन के ७५ वें वसंत में सिया के बाल स्वरूप का प्रवेश नहीं होता।
किसी भी भाव में और किसी भी स्थिति में अगर सियाराम से नेह लग जाए, तो समझो आपका बेड़ा पार। लोग कहते हैं, राधे राधे बोलो, चले आयेंगे बिहारी, तो हम अगर सिया सिया कहेंगे तो क्या सिया के साथ प्रभु श्रीराम नहीं चले आएंगे। हमारा तो मानना है, राम जी तो आएंगे ही, साथ ही साथ हनुमान जी भी चले आएंगे। हमने कहीं पढ़ा है ;
एकै साधे सब सधे।
सब साधे, सब जाय।।
ईश्वर का बाल स्वरूप भी होता है, और हर बाल शिशु ईश्वर स्वरूप ही होता है।
बच्चों की बाल लीला और ईश्वर की लीला में कोई भेद नहीं होता। सूरदास ने अगर प्रज्ञाचक्षु होते हुए श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का सजीव चित्रण किया तो रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने भी मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओं का अलौकिक वर्णन किया ;
ठुमक चलत
ठुमक चलत रामचंद्र
ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनियां ….।।
सीताजी की बाल लीलाओं के बारे में हमने बहुत कम पढ़ा अथवा जाना है। हां लेकिन लोकगीतों में सीताजी की भी बाल लीलाओं का वर्णन भक्तों और कवियों ने अवश्य किया होगा।।
हम ना तो मैथिलीशरण हैं और ना ही सियारामशरण, लेकिन फिर भी आज से दो वर्ष पूर्व हमारे जीवन में एक तीन माह की बालिका का प्रवेश हुआ, जिसके पालकों ने उस बच्ची का नाम सिया रख दिया। कहते रहें शेक्सपीयर, नाम में क्या रखा है, लेकिन अगर इस बच्ची का नाम सिया नहीं होता, हो शायद यह अभी अभी भी यहां नहीं होता।
हम तो नाम की महिमा से भलीभांति परिचित हैं, और इसी सिया को हमारा आज का यह अभी अभी समर्पित है।
पास के ही तो फ्लैट में सिया का जन्म हुआ था। गोद में थी, तब से उसके दादा दादी के साथ हमारे घर आती थी। वैसे सिया से नैन तो हमारे तब से ही मिल गए थे, लेकिन आज हम आपस में बहुत घुल मिल गए हैं।।
व्यावहारिक जगत में हमारे संगी साथी भी होते हैं और इष्ट मित्र भी। क्या आपका इष्ट भी आपका मित्र हो सकता है ? श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी भी थे और सखा भी। जब कि श्रीकृष्ण सुदामा के मित्र भी थे और इष्ट भी। इसी तरह सिया हमारी इष्ट भी है और मित्र भी। जहां मित्रवत व्यवहार होता है, वहां उम्र बीच में नहीं आती।
सिया को देखकर हमें बिहारी का यह दोहा याद आ गया ;
कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात।
भरे भोन में करत है
नैननु हि सब बात।।
शब्द वही हैं लेकिन यहां हमारी सिया की, कृष्ण की तरह यह बाल लीला है। चितवन शब्द हमने सिर्फ सुना ही था, लेकिन सिया हमें साक्षात् हमें उस चित्त के वन में ले गई, जिसे आप चाहें तो भुवन भी कह सकते हैं। हमारी सिया नजरें मिलाते ही नज़र फेर लेती है, क्योंकि उसकी निगाहें तो पूरी सृष्टि पर ही टिकी हुई है। बाल स्वरूप में सिया पूरे ब्रह्माण्ड को निहार रही है, और उसी बीच उसकी हम पर भी कृपा हो गई।।
आसक्ति और भक्ति का अगर मिला जुला विराट स्वरूप देखना हो तो बस किसी बाल गोपाल अथवा कन्या से एक बार आँखें चार कर लो। प्रज्ञाचक्षु सूरदास जी ने जो बंद आंखों से पाया, क्या हम आंख रहते नहीं महसूस कर सकते।
बच्चे ईश्वर का ही रूप होते हैं, यह जानते हुए भी हम यह सुअवसर खो देते हैं।
हम इतने नादान नहीं, हमारे पास अखिल ब्रह्माण्ड आज बाल रूप में, सिया बनकर उपस्थित है। यह स्वर्ण अवसर हम हाथ से कैसे जाने दे सकते हैं।
हनुमान जी के लिए सीता जी माता थी, हमारे लिए सीताजी का यह बाल रूप सिया बनकर प्रकट हुआ है। हमारे तो भाग जाग गए तो फिर हम क्यों ना कहें,
सिया तो से नैना लागे रे।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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