श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्यार और परवाह।)

?अभी अभी # ७६९ ⇒ आलेख – प्यार और परवाह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्यार में आह भी है और वाह भी। प्यार भले ही बेपरवाह हो, लेकिन बिना परवाह के भी कभी प्यार पनपा है, पल्लवित हुआ है। परवाह का दूसरा नाम ही प्यार है।

एक मां अपने बच्चे की देखभाल और चिंता करती है, क्या परवरिश शब्द आपको परवाह का करीबी नहीं लगता। परवाह शब्द में क्या कुछ कुछ अपनत्व, ममत्व और जिम्मेदारी का बोध नहीं होता ? प्यार में अपनापन होता है, परायापन नहीं।।

प्यार में जितनी अपेक्षा होती है, उतनी ही शिकायत भी। जहां अपेक्षा होती है, वहीं ना जाने कहां से उपेक्षा भी दबे पांव प्रवेश कर ही जाती है। प्यार उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर सकता और लापरवाही तो कतई नहीं। देखिए प्यार में शिकायत का अंदाज ;

जोगी हम तो लुट गए तेरे प्यार में

जाने तुझको खबर कब होगी …

चोरी डकैती जैसा इल्ज़ाम भी लगा दिया जाता है, जब कोई किसी का दिल लूट ले जाता है। चोर, लुटेरे, डाकू

जैसे विशेषण तो ठीक है, निष्ठुर, ज़ालिम और ना जाने क्या क्या सुनना पड़ता है, प्यार में गिरफ्त एक इंसान को ;

चोरी चोरी आग सी

दिल में लगा के चल दिए

हम तड़फते रह गए

वो मुस्कुराकर चल दिए।।

लेकिन प्यार की कोई हद नहीं होती, प्यार की कोई सीमा नहीं होती। प्यार और परवाह का मूल स्रोत एक ही जगह है। हम सब जानते हैं, महसूस करते हैं, जब हमारे ऊपर उस करुणानिधान की अहैतुक कृपा की वर्षा होती है और

हम सिर्फ इतना ही कह पाते हैं ;

तू प्यार का सागर है

तेरी एक बूंद के प्यासे हम ..

बस यही एक बूंद है जो प्यार को कभी परवाह में बदल देती है तो कभी बलिदान में। प्यार में कोई दुनिया छोड़ देता है तो कोई पूरी दुनिया को कृष्ण की तरह प्यार का संदेश देता नजर आता है। प्यार में जान ली भी जाती है, और दी भी जाती है।

मातृभूमि के लिए जान देने से बढ़कर कोई कुर्बानी नहीं। प्यार में परवाह का यह एक उत्कृष्ट तरीका है।

प्यार शब्द एक है, लेकिन इसके कई अर्थ हैं। एक प्रेमी के लिए अगर यह इश्क है तो मीरा के लिए विशुद्ध आध्यात्मिक प्रेम। प्रकृति हो या पुरुष, नर हो या नारी, सभी प्रेम के आभारी। कहीं प्रेम का स्वरूप उदात्त है तो कहीं जरूरत से अधिक विनम्र और शालीन ;

प्यार पर बस तो नहीं है मेरा

पर लेकिन फिर भी

ये बता दे के तुझे

प्यार करूं या ना करूं।।

प्यार में अगर आसक्ति है तो देहासक्ति भी, जहां भक्ति है वहीं देशभक्ति भी। जितना प्यार करना जरूरी है, उतना ही जरूरी प्यार बांटना भी। गुलजार प्यार को प्यार ही रहने देना चाहते हैं, कोई नाम नहीं देना चाहते। पर प्यार को परवाह का नाम तो आसानी से दिया जा सकता है। प्यार में बेपरवाही चल सकती है, लापरवाही नहीं। जिसने नहीं की कभी प्यार की परवाह, उसके मुंह से न कभी निकली आह, और न ही कभी वाह। आप प्यार करें या ना करें, लेकिन प्यार की परवाह अवश्य करें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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