श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फुटपाथ।)

?अभी अभी # ७७६ ⇒ आलेख – फुटपाथ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर जो रास्ता बनाया जाता है, उसे फुटपाथ कहते हैं। गांवों में लोगों के पांवों के निशानों से ही पगडंडियां बनती जाती थी। कच्ची पक्की सड़कें तो बहुत बाद में बनती थी।

हमारे देश में पहली फुटपाथ (फिल्म) १९५३ में बनी और आखरी फुटपाथ(फिल्म) सन् २००३ में। आजकल सड़कें तो बनती हैं, लेकिन फुटपाथ के लिए जगह नहीं होती।

फुटपाथ मूलतः पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर, वहीं बनाया जाता है, जहां बाजार होता है, दुकानें होती हैं, लोगों की आवाजाही होती है। इस तरह अनौपचारिक रूप से फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा हो जाता है। पहले थोड़ा, फिर अति, इस तरह धीरे धीरे फुटपाथ पर दुकानदारों का अतिक्रमण हो जाता है और राहगीर सड़क पर आ जाता है। ।

एक समय था, जब शहर की आबादी कम थी, लोग सुबह शाम पैदल घूमने निकलते थे। सड़कों पर भी अधिकतर साइकिल और इक्के दुक्के ही वाहन देखे जा सकते थे। आदमी निश्चिंत होकर फुटपाथ पर चल सकता था। हर दुकान को निहारता हुआ, जरूरत की दुकान पर रुकता, सुस्ताता, कुछ खरीदता हुआ, अपनी राह पर चलता रहता था।

जहां फुटपाथ खत्म होता था, वहां कोई मोची बैठा मिलता था, तो कहीं हर शनिवार को कोई महिला सुबह से ही शनि महाराज को विराजमान कर देती थी।

शनिवार ही वह दिन होता था, जब सड़कों और फुटपाथों की नगर निगम द्वारा पानी से धुलाई होती थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो शहर सज रहा हो। ।

बढ़ते यातायात और बढ़ते वाहनों के कारण रास्ते एकांगी होते चले गए और इंसान व्यस्त। दुकानों की साज सज्जा बढ़ती गई, साख घटती गई। पुराने व्यवसाय खत्म से हो गए, हर मार्केट नावेल्टी मार्केट में तब्दील हो गया। रेडियो, टीवी, और फ्रिज की दुकानें कम होती गई, हर तरफ मोबाइल ही मोबाइल। बाबूजी तुम कौन सा खरीदोगे, सैमसंग, appo या vivo ?

आज का आदमी न सड़क का रहा न फुटपाथ का, वह बस भीड़ बनकर रह गया है। शहर में विकास भी हो रहा है और सौंदर्यीकरण भी। अतिक्रमण भी हट रहे हैं और स्मार्ट सिटी की अवधारणा मूर्त रूप ले रही है। और इधर आदमी है जो आदमी नहीं मशीन बनता चला जा रहा है। उसे अब फुटपाथ पर चलना नहीं, मेट्रो में दौड़ना है।

वैसे भी सड़क पर पैदल चलना तो अब घट गया है और दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। सुरक्षित रहने के लिए ऑनलाइन शॉपिंग हो रही है, Zomato पहले महाकाल की थाली भिजवाता है, फिर माफी मांगता है। अब हमारे पांव नहीं चलते, सिर्फ रास्ता चलता है। ।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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