श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपना हाथ जगन्नाथ…“।)
अभी अभी # ७८१ ⇒ आलेख – अपना हाथ जगन्नाथ
श्री प्रदीप शर्मा
अपनी मदद खुद ही करना, पूरी तरह से स्वावलंबी होना, अपना काम अपने हाथों से करना, अथवा आत्म निर्भर होना, शायद यही मतलब होता होगा, अपना हाथ जगन्नाथ का।
ईश्वर उनकी मदद करता है, जो अपनी मदद आप करते हैं। हिम्मते मर्दा, मददे खुदा ! ये सब जगन्नाथ परिवार के ही लगते हैं। जगत का नाथ तो एक जगन्नाथ ही है। काम तो सब वो ही करता है। अगर काम का श्रेय आपको लेना है, तो शौक से लीजिए।।
एक संत मलूकदास हुए हैं जो कह गए हैं ;
अजगर करे न चाकरी,
पंछी करे ना काम।
दास मलूका कह गए
सबके दाता राम।।
वहीं एक दर्शन यह भी कहता है ;
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुखे मृगा: !
कर्म, अकर्म की, पुरुषार्थ और निकम्मेपन की , पक्ष और विपक्ष में कई दलीलें दी जा सकती हैं, ईश्वर को कर्ता मानकर कर्म करना, और ईश्वर के भरोसे सब कुछ छोड़ देने में बहुत फर्क है। ईश्वर चींटी को भी पाल रहा है और हम अपनी छोटी मोटी उपलब्धियां गिना कर पुरुषार्थ और आत्म निर्भर होने की डींगें हांक रहे हैं। जो हाथ कभी अपना हाथ जगन्नाथ था, आज वह स्वदेशी और विदेशी हाथ हो गया है। सौ चूहे खाकर हज करना, और सौ देशों की विदेशी यात्राओं के बाद स्वदेशी और आत्म निर्भर बनना , एक ही बात है।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गुलामी के माहौल में आजाद हिन्द फौज की स्थापना की, और अपने देश की आज़ादी की खातिर बाहरी हाथ का भी सहारा लिया। एनी बेसेंट और सिस्टर निवेदिता विदेशी मूल की थी, लेकिन उनका उद्देश्य पवित्र था। अच्छे कामों में जो हाथ बंटाए, वह कभी पराया नहीं होता। अक्सर होता तो यही है, अपने तो घुटने टेक देते हैं, और पराए ही काम में हाथ बंटाते हैं।।
चलिए, मान लिया, अपना हाथ जगन्नाथ ! न इसका साथ, न उसका साथ। बहुत रह लिए भगवान भरोसे। अब तो हमें अपने हाथों और पुरुषार्थ पर ही भरोसा है। और अचानक एक दिन स्नानागार में पांव फिसलता है, और आप एक तोता पाल लेते हो। वही हाथ, जिसके भरोसे आप थे, वहां प्लास्टर चढ़ जाता है, आपकी हड्डी टूट जाती है। अब तो जो आपकी मदद करे, वही जगन्नाथ।
संसार में कितने ही ऐसे लोग हैं, जो या तो पोलियो ग्रस्त हैं, अथवा किसी दुर्घटना में उनका अंग भंग होकर, वे दिव्यांग हो गए हैं। लेकिन वे भी अपना काम स्वयं ही करते हैं। कई कर विहीन, पांव से वे सभी कर्म कर लेते हैं, जो हम हाथ होते हुए भी नौकरों से करवाते हैं। हमारे अगर हाथ हैं, तो उनके साथ जगन्नाथ हैं।।
आपके हाथ सलामत रहें। आपके हाथ के साथ अगर जगन्नाथ भी हों, तो आपका कर्म ईश्वर का कर्म हो जाएगा। गीता में जिस निष्काम कर्म की बात श्रीकृष्ण करते हैं, वहां वे ही कर्ता होते हैं, अर्जुन का तो सिर्फ बाण होता है।
हाथ को कर भी इसीलिए कहते हैं क्योंकि यह सिर्फ़ करता है। इसको आदेश तो कोई और ही देता है। हाथ आपका है, आपका ही रहेगा, अगर साथ जगन्नाथ हों,
तो संसार की कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो आप चाहें, और आपके हाथ ना लगे। है न अपना हाथ जगन्नाथ।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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