श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सोचने की आज़ादी…“।)
अभी अभी # ७८५ ⇒ आलेख – सोचने की आज़ादी
श्री प्रदीप शर्मा
हमारी अभिव्यक्ति हमारे सोच का ही परिणाम होती है। जो हम बोलते हैं अथवा लिखते हैं, वे या तो हमारे विचार हो सकते हैं अथवा किसी और से प्रभावित विचार। इसमें हमारी शिक्षा, संस्कार, परिवेश और लोगों की संगति भी शामिल होती है।
जितना हम सोचते हैं, क्या हम उतना व्यक्त कर पाते हैं। अभिव्यक्ति पर सबसे पहला अंकुश हमारा स्वयं का होता है। हमें सोच समझकर अपने विचार प्रकट करने पड़ते हैं। जल्दबाजी में अथवा आवेश व आक्रोश में अक्सर ऐसा कुछ हमारे द्वारा कह दिया जाता है, जिसके लिए हमें बाद में पछतावा भी हो सकता है। इसीलिए तौल मोल कर बोलने की सलाह दी जाती है।।
अभिव्यक्ति वही होती है, जो प्रकट होती है। वे ही कालांतर में शब्द, विचार, दर्शन एवं कथा, प्रवचन, भाषण अथवा उपदेश बन जाते हैं। वैसे तो बिना सोचे विचारे कुछ भी कहा अथवा लिखा नहीं जा सकता, फिर भी अगर कुछ ऐसा प्रकट हो जाता है तो वह असंतुलित, अमर्यादित अथवा ऊटपटांग की श्रेणी में आता है। होश में कही बात ही अभिव्यक्ति कहलाती है।
कई बार अभिव्यक्ति पर अंकुश लगे हैं। कुछ आरोपों प्रत्यारोपों पर मानहानि तक बात पहुंची है। कई पुस्तकें, फिल्में प्रतिबंधित हुई हैं। हमारे देश में तो आपातकाल का काला अध्याय भी लिखा जा चुका है। समझदार उसमें भी बहुत कुछ व्यक्त कर जाते हैं। आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप एक साथ प्रभावी हुई थी। विरोध न लिखकर किया जा सकता था न बोलकर। ऐसे में नईदुनिया के संपादक श्री राजेन्द्र माथुर ने संपादकीय का पन्ना खाली ही छोड़ दिया। केवल काली स्याही ही विरोध का प्रतीक बन गई। एक ऐतिहासिक अभिव्यक्ति जो जन जन तक, विरोध प्रकट करने का माध्यम बन गई।।
आज अभिव्यक्ति की आजादी अपने चरम पर है। सोशल मीडिया एवं डिजिटल इंडिया जितना मुखर आज है, इसके पहले कभी नहीं रहा। सामाजिक अन्याय, अपराध जगत और ड्रग माफिया के खिलाफ जंग और समाज में जागरूकता लाने का काम तो सनसनी, सी आई डी, सावधान इंडिया जैसे टीवी सीरियल अरसे से करते आ रहे हैं लेकिन अब तो टीवी न्यूज वाले चैनल भी 24 x 7 (कमर्शियल ब्रेक को छोड़कर) एक ही मुद्दा स्पेशल डिश की तरह परोस रहे हैं। कहीं इनका प्रभाव भी पड़ रहा है और कहीं दवाब भी। परिणाम अथवा दुष्परिणाम आपकी सोच पर आधारित है।
सोचने की आजादी अभिव्यक्ति की आज़ादी से बहुत बड़ी है, विस्तृत है, विशाल है। उस पर किसी तरह की बंदिश अथवा सेंसरशिप लगाना संभव नहीं। अगर आपका चिंतन मौलिक है तो सार्थक है और अगर केवल दूसरों के विचारों को ही अपने सोच का आधार बनाते हैं, तो मौलिक चिंतन की संभावनाएं क्षीण हो सकती हैं।।
चिंतन, मनन दो ऐसे शब्द हैं, जो गंभीर किस्म के सोच से जुड़े हुए हैं। इसमें, अभ्यास, अध्ययन और स्वाध्याय तीनों का समावेश होता है। जो परिश्रम एवं पीड़ा से प्रकट होता है, उसे सृजन कहते हैं। सृजन में पीड़ा भी है और सुख भी। ऐसा कहा जाता है, यह स्वाभाविक होता है। पुरुष मां नहीं बन सकता। लेकिन वह किसी पर प्यार लुटा सकता है, किसी पर कुर्बान तो हो सकता है।
यों तो हमारा मस्तिष्क एक वर्कशॉप की तरह रात दिन काम करता रहता है। काम भी चलता रहता है और सोच विचार भी। घर बैठे बैठे जिसके बारे में सोचा, वहीं पहुंच गए। जब कोई कहता है, कहां खो गए हैं आप, तब आप विचारों के आकाश से ज़मीन पर उतर आते हैं। जागते हुए चेतन मन, और सोते हुए अवचेतन मन को चैन कहां आराम कहां।।
हमारा सोच ही हमें इंसान बनाता है। क्या सोच भी घटिया हो सकता है ! जब हमारे विचारों पर राग, द्वेष, क्रोध, लालच, अहंकार और स्वार्थ हावी हो जाता है तो हमारी सोच भी वैसी ही हो जाती है। अतः सात्विक सोच ही हमारे विचारों पर नकेल है। कोई दूसरा आपको क्यों अनुशासित करे, क्या आप स्वयं सक्षम नहीं।
दुनिया में अच्छा बुरा सब मौजूद है। आपमें इतनी समझ आ गई कि आप गीला और सूखे कचरे में भेद करने लगे। लेकिन कभी कचरे को आपने सहेजा नहीं।
सुबह होते ही कचरा पेटी का रास्ता दिखा दिया। कुछ विचार भी कचरा हो सकते हैं उन्हें मन से बाहर निकालना होगा। सफाई मन से शुरू होती है तब मानवता तक उसकी पहुंच होती है।
अच्छी सोच, अच्छी अभिव्यक्ति। अच्छे विचार। प्रेम, मुस्कुराहट और थोड़ी करुणा का मिक्सड अचार, सुविचार। सुप्रभात !
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





