श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रवि, कवि और सीसी टीवी।)

?अभी अभी # ८०० ⇒ आलेख – रवि, कवि और सीसी टीवी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

रवि और कवि की होड़ कोई नयी नहीं। जब रवि अस्त होता है, तब कवि मस्त होता है, चांद पर कविता लिखता है, रात में ही कवि सम्मेलन जवां होता है और संगीतकार रवि ही फिर उसकी धुन बनाते हैं, चौदहवीं का चांद हो, या आफताब हो। रविशंकर का सितार हो या श्रीश्री रविशंकर की सुदर्शन क्रिया, चित्त और मन को आलोकित करती है, कानों में मिश्री घोलती है।

विज्ञान मंगल तक पहुंच जाए, चांद पर चहलकदमी कर आए, लेकिन सूरज पर पांव नहीं धर सकता। इसीलिए कवि भी रवि से पंगा नहीं लेता, सूरज पर नहीं चांद पर ही कविता लिखता है। कवि प्रदीप भी सूरज के बारे में इतना ही कह पाए ;

जगत भर की रोशनी के लिए

करोड़ों की ज़िंदगी के लिए

सूरज रे जलते रहना …

सूरज की रोशनी में, दिनदहाड़े अगर कोई अपराध हो, तो भी सूरज गवाही के लिए नहीं आ सकता। कानून आंख वाला गवाह मांगता है जिसे अंग्रेजी में eye witness कहते हैं। एक कवि जहां उस पर केवल कविता लिखकर दाद बटोर सकता है केवल एक कैमरे की आंख ही उसकी गवाही बन सकती है अगर किसी ने उस घटना को अपने कैमरे में उतार लिया हो।

साइबर क्राइम के चलते तस्वीरें भी आजकल सुरक्षित नहीं रही। तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ के चलते अदालत इन्हें पुख्ता साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। ऐसे में जहां आज तक न कवि पहुंच पाया न रवि, वहां सीसी टीवी ज़रूर पहुंच गया है। हर चौराहे, बगीचे, मकान, बैंक दफ्तर और दुकान में आजकल सीसी टीवी कैमरे लगे है। बेचारे चोरों और अपराधियों की शामत आ गई है।।

पहले लोग कहते थे, भगवान से डरो ! अब भगवान का डर खत्म हो गया। भगवान के सामने अपराध होता है, और वह चुपचाप देखा करता है। वैसे अगर भगवान गवाही देने आ भी जाए तो बिना आधार कार्ड के उसकी नागरिकता तो गई दीये का घी लेने, अदालत कहीं उसे कोई एलियन ही ना समझ बैठे। ऐसी परिस्थिति में केवल सीसी टीवी फुटेज ही एकमात्र गवाही होती है, जो अदालत में मान्य होती है। और अदालत उस फुटेज को बिना गीता की शपथ दिलाए सच मान लेती है।

कवि और रवि की अपनी विवशताएं हैं, मजबूरियां हैं।

कवि कोई समाज सुधारक नहीं। वह सिर्फ तुकबंदी कर सकता है नोटबंदी नहीं। सूरज बेचारा सुबह समय पर आता है, दिन भर ड्यूटी बजाता है, शाम को अस्ताचल में चला जाता है। वह एक ऐसा गवाह है, जिसकी आंखों के सामने, अच्छा बुरा, सब कुछ घटता रहता है, और वह मजबूर, अपनी ही आग में जलता रहता है। वह जगत के कल्याण के लिए प्रकाशित होता है, सबको जीवन देता है, लेकिन उसकी ही रोशनी में जब कु – कृत्य होते हैं, तो वह गुस्से से जल भुन जाता है। ऐसे में केवल सीसी टीवी फुटेज एक आशा की किरण बनकर आता है। लेकिन जब मान्यताएं ही ध्वस्त हो जाएं, तो क्या प्रत्यक्ष और क्या प्रमाण ! कानून की आंख है, कोई संजय की दिव्य दृष्टि नहीं। क्या पता किसको दण्डित कर दे, किसको बरी कर दे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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